Sixth Gen Fighter Jet: दुनिया में सैन्य तकनीक की दौड़ तेजी से आगे बढ़ रही है और आधुनिक युद्ध में फाइटर जेट्स की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है. वर्तमान समय में अधिकांश देश अभी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान विकसित करने या उन्हें ऑपरेशनल बनाने की प्रक्रिया में ही लगे हुए हैं. अमेरिका, चीन और रूस जैसे कुछ ही देशों के पास पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स मौजूद हैं, जबकि कई देश अभी भी इस स्तर की तकनीक हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं.
इसी बीच भारत से एक अहम तकनीकी उपलब्धि की खबर सामने आई है. भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने अगली पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर जेट्स के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीक विकसित की है, जिसे भविष्य में पांचवीं और छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों में इस्तेमाल किया जा सकता है. यह उपलब्धि भारत के रक्षा विमानन क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है.
भारत की मौजूदा स्थिति
फिलहाल भारत चौथी और 4.5 पीढ़ी के फाइटर जेट्स की तकनीक पर काम कर रहा है. भारतीय वायुसेना के लिए विकसित किए जा रहे तेजस मार्क-2 को 4.5 पीढ़ी का फाइटर जेट माना जाता है और इसका प्रोटोटाइप विकसित करने की प्रक्रिया जारी है.
इसके साथ ही भारत पांचवीं पीढ़ी के उन्नत स्टेल्थ फाइटर जेट प्रोजेक्ट AMCA (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) पर भी काम कर रहा है. हालांकि इन परियोजनाओं को पूरी तरह परिपक्व होने और सेवा में आने में अभी समय लग सकता है.
दूसरी ओर भारत फ्रांस से 4.5 पीढ़ी के उन्नत लड़ाकू विमान राफेल भी खरीद रहा है. भारतीय वायुसेना में भविष्य में 114 अतिरिक्त राफेल विमानों को शामिल करने की योजना पर भी चर्चा चल रही है, जिससे वायुसेना की ताकत और बढ़ेगी.
छठी पीढ़ी के फाइटर जेट्स की अवधारणा
छठी पीढ़ी के फाइटर जेट्स को भविष्य के युद्ध का सबसे उन्नत प्लेटफॉर्म माना जा रहा है. दुनिया के कई बड़े देश इस तकनीक पर काम कर रहे हैं, जिनमें अमेरिका, चीन, जापान और यूरोप के कुछ देश शामिल हैं. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में अभी सबसे ज्यादा सक्रियता अमेरिका और चीन की ओर से दिखाई दे रही है.
छठी पीढ़ी के फाइटर जेट्स में कई अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल होने की संभावना है. इनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, उन्नत स्टेल्थ तकनीक, नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर और मानवयुक्त विमान के साथ काम करने वाले ड्रोन शामिल हो सकते हैं.
इन विमानों को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वे युद्ध के दौरान अन्य ड्रोन और फाइटर जेट्स के साथ मिलकर एक टीम की तरह काम कर सकें. कई विशेषज्ञ इसे एक उड़ते हुए कमांड सेंटर या “फ्लाइंग वार रूम” के रूप में भी देखते हैं.
भारत की नई तकनीकी उपलब्धि
भारत में फाइटर जेट्स के डिजाइन और विकास की जिम्मेदारी एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) संभालती है. इसी संस्था के वैज्ञानिकों ने स्टेल्थ फाइटर जेट्स के लिए एयर इनटेक सिस्टम के एयरोडायनामिक डिजाइन में एक महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है.
फरवरी 2026 में प्रकाशित ‘जर्नल ऑफ एयरोस्पेस साइंसेज एंड टेक्नोलॉजीज’ में इस शोध के बारे में जानकारी दी गई है. इस अध्ययन में बताया गया है कि कैसे स्टेल्थ विमान की डिजाइन को बनाए रखते हुए इंजन की उच्च क्षमता को बरकरार रखा जा सकता है.
यह तकनीकी उपलब्धि न केवल भारत के पांचवीं पीढ़ी के AMCA प्रोजेक्ट के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, बल्कि भविष्य में विकसित होने वाले छठी पीढ़ी के टेललेस फाइटर जेट्स के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है.
एस-डक्ट इनटेक की चुनौती
स्टेल्थ फाइटर जेट्स की डिजाइन में सबसे बड़ी चुनौती उनके इंजन को रडार से छिपाना होती है. फाइटर जेट के इंजन में मौजूद कंप्रेसर ब्लेड्स रडार तरंगों को बहुत अधिक परावर्तित करते हैं, जिससे विमान का पता लगाना आसान हो सकता है.
इस समस्या से बचने के लिए विमान डिजाइनर विशेष प्रकार के एयर इनटेक का उपयोग करते हैं, जिसे सेर्पेंटाइन या एस-डक्ट इनटेक कहा जाता है. यह इनटेक टेढ़े-मेढ़े रास्ते से होकर हवा को इंजन तक पहुंचाता है, जिससे इंजन रडार की सीधी नजर से छिपा रहता है.
हालांकि इस डिजाइन के साथ एक और समस्या सामने आती है. घुमावदार रास्ते से गुजरने वाली हवा अक्सर अशांत हो जाती है, जिससे इंजन की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है. यदि यह विकृत हवा सीधे इंजन तक पहुंच जाए तो इससे इंजन की ताकत कम हो सकती है और गंभीर तकनीकी समस्याएं पैदा हो सकती हैं.
भारतीय वैज्ञानिकों का समाधान
एडीए के इंजीनियर आर. अबिलाशनिनी और विल्लिआम्माई सोमासुंदरम ने इस चुनौती का समाधान खोजने के लिए विंड टनल परीक्षण और कंप्यूटेशनल फ्लूइड डायनामिक्स जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया.
इन प्रयोगों के आधार पर उन्होंने एक नई इनटेक ज्योमेट्री विकसित की, जिससे हवा का प्रवाह अधिक संतुलित रहता है और इंजन की कार्यक्षमता प्रभावित नहीं होती. इस तकनीक के परिणाम काफी प्रभावशाली बताए जा रहे हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपलब्धि भारत के स्वदेशी स्टेल्थ फाइटर जेट कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण आधार बन सकती है.
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