मॉस्को/नई दिल्ली: रूस के पहले फिफ्थ जनरेशन स्टील्थ फाइटर Sukhoi Su-57 को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है. रूस ने इसे अमेरिका के F-22 रैप्टर और F-35 लाइटनिंग II के मुकाबले खड़ा करने की कोशिश की थी, लेकिन दुनिया भर में इसे वैसी स्वीकार्यता नहीं मिल पाई. अब सवाल उठता है—क्या भारत इस "कम रुचि" झेल चुके फाइटर पर दोबारा दांव लगाएगा?
उम्मीदों से कम, पर संभावनाओं से खाली नहीं
रूस ने Su-57 के एक्सपोर्ट वर्जन (Su-57E) को 2018 में पेश किया था, और माना जा रहा था कि एंटी-वेस्ट या रूस समर्थक देश इसे खरीदने में रुचि दिखाएंगे. लेकिन अब तक सिर्फ अल्जीरिया ने 14 विमानों की डील की है.
इसके विपरीत, अमेरिकी F-35 अब तक 15 से ज्यादा देशों की वायु सेनाओं में शामिल हो चुका है, और चीन के J-20 और J-35 भी तेजी से अपना नेटवर्क फैला रहे हैं.
टेक्नोलॉजी को लेकर उठे सवाल
पश्चिमी डिफेंस विशेषज्ञों का मानना है कि Su-57 की स्टील्थ प्रोफाइल उतनी उन्नत नहीं है जितनी आज के फिफ्थ जनरेशन जेट से अपेक्षित होती है. कुछ रिपोर्टों के अनुसार, इसका रडार क्रॉस सेक्शन एक चौथी पीढ़ी के विमान जैसा ही है.
वहीं, कुछ विश्लेषकों का कहना है कि Su-57 के कई कंपोनेंट जैसे कि नया इंजन और एडवांस्ड रडार अभी भी पूरी तरह विकसित नहीं हैं. सुपरक्रूज़, नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर और इंटीग्रेटेड स्टील्थ टेक्नोलॉजी जैसी क्षमताओं में यह अब भी F-35 से पीछे माना जाता है.
भारत की रणनीतिक सोच: दांव या दूरी?
भारत पहले FGFA (Fifth Generation Fighter Aircraft) प्रोजेक्ट के तहत Su-57 में शामिल था. लेकिन तकनीकी पारदर्शिता, लागत, और स्टील्थ क्षमता को लेकर असंतोष के चलते भारत ने इससे 2018 में खुद को अलग कर लिया.
अब रूस एक बार फिर भारत को आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है- टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, सोर्स कोड एक्सेस और AMCA में सहयोग जैसे ऑफर्स के साथ. लेकिन भारत की प्राथमिकता अब अपने घरेलू AMCA प्रोजेक्ट को पूरा करना है, जिसकी पहली उड़ान 2030 तक प्रस्तावित है.
यूक्रेन युद्ध में भी नहीं छा पाया Su-57
यूक्रेन युद्ध में रूस के पास Su-57 को एक प्रभावशाली भूमिका में पेश करने का मौका था, लेकिन अब तक इसकी ऑपरेशनल भागीदारी सीमित रही है. इसके मुकाबले अमेरिकी F-35 पहले ही दर्जनों युद्ध अभियानों में खुद को साबित कर चुका है.
रूस ने अभी तक Su-57 के 30-35 यूनिट ही बनाए हैं, जिनमें से भी अधिकतर प्री-प्रोडक्शन स्टेज में हैं. इसके उत्पादन में सप्लाई चेन बाधाएं, आर्थिक प्रतिबंध और फंड की कमी बाधा बन रहे हैं.
कीमत में प्रतिस्पर्धा, तकनीक में नहीं?
Su-57 की अनुमानित कीमत 35 से 40 मिलियन डॉलर प्रति यूनिट बताई जाती है, जो कि F-35 (80–110 मिलियन डॉलर) से काफी सस्ती है. लेकिन सस्ती कीमत तकनीक की भरपाई नहीं कर सकती, खासकर जब खरीदार हाई-एंड टेक्नोलॉजी और प्रूव्ड परफॉर्मेंस पर ज़ोर देते हों.
क्या भारत को फिर सोचना चाहिए?
भारत के पास अब दो रास्ते हैं:
रूस के साथ अब भी मजबूत रक्षा संबंध हैं और Su-57 को राफेल जैसे किसी "गेमचेंजर" पार्टनर की ज़रूरत है. लेकिन क्या भारत यह जोखिम उठाएगा, या फिर अपने ही कार्ड्स खेलने की रणनीति अपनाएगा, यह आने वाला वक्त बताएगा.
ये भी पढ़ें- अब डबल होगी भारत के राफेल फाइटर जेट की ताकत, इजरायल से मिलेगा मिसाइल हमले से बचाने वाला डिकॉय सिस्टम