प्लास्टिक के नोट से फेक करेंसी पर कैसे लगेगी लगाम, क्या होंगे इसके फायदे? यहां जानिए सबकुछ

भारत में जल्द ही जेब में रखे नोटों के जल्दी फटने, भीगने और गंदे होने की परेशानी कम हो सकती है. केंद्र सरकार ने ₹10 और ₹20 के पॉलीमर यानी प्लास्टिक बैंक नोटों के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दे दी है.

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नई दिल्ली: भारत में जल्द ही जेब में रखे नोटों के जल्दी फटने, भीगने और गंदे होने की परेशानी कम हो सकती है. केंद्र सरकार ने ₹10 और ₹20 के पॉलीमर यानी प्लास्टिक बैंक नोटों के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दे दी है. दोनों मूल्यवर्ग के 100-100 करोड़ पॉलीमर नोट परीक्षण के तौर पर जारी किए जाएंगे. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राज्यसभा में लिखित जवाब के जरिए इसकी जानकारी दी है. अगर प्रयोग सफल रहता है तो आने वाले समय में भारतीय करेंसी के स्वरूप में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.

कागज नहीं, खास प्लास्टिक से तैयार होंगे नोट

पारंपरिक भारतीय करेंसी नोटों में कपास और विशेष तरह के पेपर का इस्तेमाल होता है, जबकि पॉलीमर नोटों के लिए मजबूत सिंथेटिक सामग्री का उपयोग किया जाता है. प्रस्तावित नोटों में बायएक्सियली ओरिएंटेड पॉलीप्रोपाइलीन यानी BOPP का इस्तेमाल किया जाएगा. यह करीब 90 माइक्रोन मोटी मजबूत और पारदर्शी प्लास्टिक शीट होती है. इसी पर नोट का डिजाइन, सीरियल नंबर और अलग-अलग सुरक्षा फीचर्स तैयार किए जाते हैं, जिससे करेंसी को टिकाऊ बनाने के साथ उसकी सुरक्षा भी मजबूत की जा सके.

बारिश और पसीने में भी नहीं गलेंगे नोट

पॉलीमर करेंसी की सबसे बड़ी खासियत इसकी मजबूती मानी जाती है. रोजमर्रा के इस्तेमाल में कागजी नोट जेब में मुड़ने, पसीने, पानी और दूसरी वजहों से जल्दी खराब हो जाते हैं. इसके मुकाबले पॉलीमर नोट पानी और नमी के प्रति काफी ज्यादा प्रतिरोधी होते हैं. इनकी सतह को आसानी से साफ भी किया जा सकता है. लंबे समय तक चलने की क्षमता के कारण इन नोटों को बार-बार बदलने की जरूरत कम हो सकती है, जिससे पुराने और खराब नोटों को वापस लेकर नष्ट करने की प्रक्रिया पर होने वाला खर्च भी घट सकता है.

नकली नोटों के खिलाफ भी मिलेगी अतिरिक्त सुरक्षा

पॉलीमर नोटों में ऐसे सुरक्षा फीचर्स शामिल किए जा सकते हैं, जिनकी सामान्य प्रिंटर या स्कैनर से नकल करना मुश्किल होता है. इनमें पारदर्शी विंडो एक महत्वपूर्ण सुरक्षा विशेषता है. नोट की प्लास्टिक संरचना और जटिल डिजाइन को मिलाकर ऐसी करेंसी तैयार की जाती है, जिसकी हूबहू कॉपी बनाना आसान नहीं होता. इससे नकली नोटों के प्रसार पर अंकुश लगाने में मदद मिलने की उम्मीद है. हालांकि, फील्ड ट्रायल के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि भारत में इन नोटों की सुरक्षा और टिकाऊपन व्यवहारिक इस्तेमाल में कितना प्रभावी रहता है.

कई देशों में पहले से इस्तेमाल हो रही पॉलीमर करेंसी

प्लास्टिक बैंक नोट भारत के लिए भले ही नई शुरुआत हो, लेकिन दुनिया के कई देशों में इनका इस्तेमाल पहले से हो रहा है. ऑस्ट्रेलिया ने 1988 में 10 डॉलर का स्मारक पॉलीमर नोट जारी कर इस दिशा में शुरुआत की थी. ब्रिटेन ने 2016 से अपने बैंक नोटों को पॉलीमर में बदलना शुरू किया, जबकि कनाडा में भी लंबे समय से इस तरह की करेंसी चलन में है. न्यूजीलैंड ने अपनी पूरी करेंसी को पॉलीमर नोटों में बदल दिया है. रोमानिया भी 1999 में यूरोप के शुरुआती देशों में शामिल रहा, जिसने प्लास्टिक बैंक नोट अपनाए.

फील्ड ट्रायल के बाद तय होगी आगे की तस्वीर

₹10 और ₹20 के 100-100 करोड़ पॉलीमर नोटों का फील्ड ट्रायल भारत में करेंसी के भविष्य को लेकर अहम प्रयोग माना जा रहा है. इसका उद्देश्य सिर्फ नोटों की उम्र बढ़ाना नहीं, बल्कि उनके रखरखाव, सुरक्षा और इस्तेमाल की व्यावहारिकता को भी परखना होगा. अगर परीक्षण के दौरान इन नोटों का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक रहा, तो भविष्य में दूसरे मूल्यवर्ग के नोटों को भी पॉलीमर में बदलने पर विचार किया जा सकता है. फिलहाल आम लोगों की नजर इस बात पर रहेगी कि नए नोट कब बाजार में आते हैं और रोजमर्रा के इस्तेमाल में उनका अनुभव कैसा रहता है.

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