नई दिल्ली: भारत और चीन के बीच सीमा विवाद एक बार फिर चर्चा में है. विदेश मंत्रालय की मीडिया ब्रीफिंग में भारतीय प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने चीन को साफ शब्दों में भारत का रुख बता दिया. भारत ने कहा है कि दोनों देशों के रिश्तों में सुधार तभी संभव है, जब सीमा पर शांति और स्थिरता बनी रहे. भारत ने साफ कर दिया कि वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी से जुड़े मुद्दों को नजरअंदाज करके रिश्तों को सामान्य नहीं किया जा सकता.
भारत की ओर से यह बयान ऐसे समय आया है, जब अरुणाचल प्रदेश के 27 भौगोलिक स्थानों के आधिकारिक नाम दर्ज किए जाने पर चीन ने कड़ा विरोध जताया है. बीजिंग ने भारत के इस कदम को मानने से इनकार किया है और एक बार फिर अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा दोहराया है.
‘सीमा पर शांति जरूरी’, भारत ने चीन को समझाया
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मीडिया से बातचीत में भारत की स्थिति स्पष्ट कर दी. उन्होंने कहा कि सीमा पर हालात दोनों देशों के रिश्तों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं. जब तक सीमा वाले इलाकों में शांति और स्थिरता नहीं होगी, तब तक भारत और चीन के संबंध सामान्य नहीं हो सकते.
भारत ने दोनों देशों के बीच किसी भी गलतफहमी या गलत आकलन से बचने पर भी जोर दिया है. जायसवाल ने कहा कि सीमा से जुड़े मामलों पर बातचीत के लिए दोनों देशों के बीच मौजूद सभी माध्यमों का इस्तेमाल किया जाएगा.
भारत का लगातार यही कहना रहा है कि विवादों का हल बातचीत से ही निकाला जा सकता है. लेकिन बातचीत के लिए सीमा पर शांति जरूरी है. अगर सीमा पर तनाव बना रहेगा तो दोनों देशों के बीच रिश्तों को आगे बढ़ाना मुश्किल होगा.
अरुणाचल के 27 स्थानों के नाम पर क्यों भड़का चीन?
विवाद तब और बढ़ गया जब भारत ने अरुणाचल प्रदेश में 27 महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थानों के आधिकारिक नाम दर्ज किए. सर्वेक्षण विभाग की ओर से इन स्थानों के मानक नाम आधिकारिक नक्शों में शामिल किए गए हैं.
इन 27 स्थानों में चार प्रमुख पहाड़ी दर्रे, एक ऊंचाई पर स्थित झील, कई महत्वपूर्ण पहाड़ी और मैदानी इलाके और एक ऐतिहासिक युद्ध स्मारक शामिल हैं.
भारत के इस कदम का उद्देश्य अपने क्षेत्र के भौगोलिक स्थानों की सही पहचान को आधिकारिक रूप देना है. साथ ही इससे लोगों को इन इलाकों के महत्व के बारे में जानकारी देने में भी मदद मिलेगी. इसे चीन की ओर से भारतीय इलाकों के नाम बदलने की कोशिशों के जवाब के तौर पर भी देखा जा रहा है.
चीन ने फिर अलापा ‘अवैध’ वाला राग
भारत के इस फैसले के सामने आते ही चीन ने इसका विरोध शुरू कर दिया. चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने भारत के कदम पर आपत्ति जताई.
चीन ने एक बार फिर अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा मानने से इनकार किया. बीजिंग ने भारत की ओर से तय किए गए नामों को ‘अवैध’ और ‘अमान्य’ बताया.
चीन अरुणाचल प्रदेश को ‘जांगनान’ या ‘दक्षिणी तिब्बत’ बताकर उस पर अपना दावा करता रहा है. चीन का कहना है कि भारत की ओर से एकतरफा तरीके से नाम बदलने से इस इलाके की स्थिति नहीं बदल सकती. बीजिंग का यह भी कहना है कि ऐसे कदम दोनों देशों के बीच चल रही सीमा वार्ता को और मुश्किल बना सकते हैं.
भारत हालांकि चीन के इस दावे को पहले ही कई बार खारिज कर चुका है.
WMCC की बैठक के बाद ही बढ़ा तनाव
खास बात यह है कि भारत की ओर से इन स्थानों के आधिकारिक नाम दर्ज किए जाने का फैसला दोनों देशों के बीच एक अहम बैठक के बाद सामने आया. भारत और चीन के बीच सीमा मामलों पर बातचीत के लिए बने कार्यकारी तंत्र यानी डब्ल्यूएमसीसी की 36वीं बैठक नई दिल्ली में हुई थी.
इस बैठक में दोनों देशों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति बनाए रखने और बातचीत के जरिए आगे बढ़ने पर सहमति जताई थी. लेकिन बैठक के तुरंत बाद अरुणाचल प्रदेश को लेकर भारत के इस कदम पर चीन की ओर से बयान आने लगे.
चीन के सरकारी मीडिया और वहां के कुछ सुरक्षा विशेषज्ञों ने भी भारत के फैसले पर सवाल उठाए. चीनी विशेषज्ञों ने इसे दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने की कोशिशों के खिलाफ बताया.
अरुणाचल के नाम बदलने का चीन का पुराना खेल
भारत का यह कदम चीन की कई साल पुरानी नीति के जवाब के तौर पर भी देखा जा रहा है. चीन 2017 से अरुणाचल प्रदेश के अलग-अलग इलाकों के चीनी और तिब्बती नामों की सूची जारी करता रहा है.
अब तक चीन अरुणाचल प्रदेश की 100 से ज्यादा जगहों के अपने मनमाने नाम जारी कर चुका है. बीजिंग का मानना है कि इस तरह नक्शों और सरकारी दस्तावेजों में नाम दर्ज करने से वह इन इलाकों पर अपना दावा मजबूत कर सकता है.
भारत ने हर बार चीन की इस कोशिश को खारिज किया है. नई दिल्ली का साफ कहना है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है और किसी दूसरे देश की ओर से किसी जगह का नाम बदल देने से उसकी जमीन पर स्थिति नहीं बदल जाती.
भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का था, भारत का है और भारत का ही रहेगा. ऐसे में चीन की ओर से नए नाम रखने या पुराने दावे दोहराने से जमीनी सच्चाई पर कोई असर नहीं पड़ता.
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