फेल हुआ कावेरी फाइटर जेट इंजन, अब फ्रांस के Safran से होगी डील, क्या तकनीक के जाल में फंस रहा भारत?

विमानों की दुनिया में इंजन सिर्फ एक यंत्र नहीं, बल्कि किसी भी लड़ाकू विमान का “हृदय” होता है. यह तय करता है कि विमान कितनी ऊंचाई तक उड़ सकता है, कितनी गति से हमला कर सकता है और कितना समय हवा में रह सकता है.

India fighter jet engine deal will be with France Safran
प्रतिकात्मक तस्वीर/ Social Media

विमानों की दुनिया में इंजन सिर्फ एक यंत्र नहीं, बल्कि किसी भी लड़ाकू विमान का “हृदय” होता है. यह तय करता है कि विमान कितनी ऊंचाई तक उड़ सकता है, कितनी गति से हमला कर सकता है और कितना समय हवा में रह सकता है. यही कारण है कि दुनिया की केवल कुछ ही चुनिंदा महाशक्तियों अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन के पास आज भी जेट इंजन तकनीक का पूर्ण स्वामित्व है.

भारत, जो आज दुनिया की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक है और लगातार रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने का लक्ष्य रखता है, एयरो इंजन जैसे बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र में अब भी विदेशी कंपनियों पर निर्भर है.

विदेशी इंजनों पर अब भी निर्भर भारत

भारत ने अपने स्वदेशी लड़ाकू विमानों के लिए अब तक खुद का कोई फुल-स्पेक्ट्रम इंजन सफलतापूर्वक विकसित नहीं किया है. आज भी हमारे सबसे महत्वपूर्ण फाइटर जेट्स में इस्तेमाल हो रहे इंजन विदेशों से आते हैं:

  • सुखोई-30MKI में रूसी AL-31FP इंजन
  • तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (LCA) में अमेरिकी GE-F404 इंजन
  • आगामी AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) के लिए GE-F414 का प्रस्ताव

लेकिन सवाल यह है कि जब भारत अपने खुद के मिसाइल बना सकता है, सैटेलाइट भेज सकता है, तो फिर लड़ाकू विमान का इंजन क्यों नहीं?

कावेरी इंजन: भारत की पहली कोशिश और विफलता

प्रोजेक्ट की शुरुआत और उम्मीदें

1986 में भारत ने कावेरी इंजन परियोजना की शुरुआत की. उद्देश्य था कि स्वदेशी LCA तेजस के लिए भारत खुद का इंजन बनाए. इसके लिए DRDO की प्रयोगशाला GTRE (Gas Turbine Research Establishment) को जिम्मेदारी दी गई.

शुरुआती बजट था महज ₹382 करोड़ एक मामूली रकम, जबकि लड़ाकू इंजन विकास में आमतौर पर अरबों डॉलर लगते हैं. बाद में यह खर्च बढ़कर भी केवल ₹2,000 करोड़ तक ही पहुंचा, जो कि एक राफेल विमान की कीमत से भी कम है.

विफलता के कारण

कावेरी इंजन कभी सफलतापूर्वक तेजस में फिट नहीं हो सका. इसके पीछे कई अहम कारण रहे:

  • उच्च थ्रस्ट (90 kN ) देने की तकनीक का अभाव
  • डिजाइन में खामियां
  • भारत में उपयुक्त टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का न होना
  • टर्बाइन और सुपरअलॉय मटेरियल की चुनौती
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग की कमी और फंडिंग की धीमी गति

कुल मिलाकर, भारत तकनीकी रूप से तैयार नहीं था, और इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में वैश्विक सप्लायर्स ने खुलकर तकनीक साझा नहीं की.

कावेरी से मिली सीख और डेरिवेटिव प्रयास

कावेरी इंजन भले ही तेजस के लिए उपयुक्त न हो पाया, लेकिन इससे मिली जानकारी को पूरी तरह बेकार नहीं जाने दिया गया.

डेरिवेटिव इंजन- UAV और ड्रोन प्रोजेक्ट्स के लिए

GTRE और DRDO ने कावेरी पर आधारित हल्के इंजन बनाने की योजना बनाई, जो छोटे UAV, क्रूज मिसाइल, और स्टेल्थ ड्रोन (UCAV) जैसे प्रोजेक्ट्स में इस्तेमाल हो सकें.

"घातक" UCAV प्रोग्राम के लिए कावेरी का 52 kN नॉन-आफ्टरबर्निंग संस्करण चुना गया है. यह भारत के भविष्य के स्टेल्थ ड्रोन कार्यक्रम के लिए बेहद अहम हो सकता है.

लेकिन इस प्रोजेक्ट को अभी तक सरकारी मंजूरी नहीं मिली, और इसकी प्रगति भी बेहद धीमी है. विशेषज्ञों के अनुसार, इस ड्रोन को उड़ान भरने में कम से कम 8 साल और लग सकते हैं.

AMCA इंजन डील: फ्रांस के साथ नई साझेदारी

भारत अब पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट AMCA के लिए नया इंजन विकसित करने की दिशा में फ्रांसीसी कंपनी Safran के साथ साझेदारी की दिशा में आगे बढ़ रहा है.

यह डील बहुत अहम है, क्योंकि यह भारत के लिए सिर्फ एक इंजन नहीं, बल्कि रणनीतिक आत्मनिर्भरता का द्वार खोल सकती है. लेकिन इसके साथ ही यह भारत को फिर एक बार विदेशी तकनीक पर निर्भरता के खतरे में भी डाल सकती है, अगर कुछ जरूरी सावधानियां न बरती जाएं.

डील में भारत को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

1. गहन तकनीकी ट्रांसफर सुनिश्चित करना

केवल असेंबली लाइन या कलपुर्जों की सप्लाई नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग डिजाइन, सोर्स कोड, टेस्ट मैथडोलॉजी और प्रोडक्शन तकनीक का ट्रांसफर अनिवार्य है.

डील में टाइम-बाउंड माइलस्टोन और Verification of Technology (VoT) क्लॉज शामिल होने चाहिए.

2. Intellectual Property Rights (IPR) का स्वामित्व भारत को मिले

भारत को इंजन डिज़ाइन पर पूर्ण अधिकार होने चाहिए ताकि भविष्य में वह उस तकनीक का संशोधन, उपयोग और निर्यात कर सके.

किसी तीसरे देश के कंपोनेंट या कानून की वजह से निर्यात पर रोक न लग पाए.

3. हॉट-सेक्शन और कोर टेक्नोलॉजी तक पहुंच

टर्बाइन ब्लेड, सुपरअलॉय, ब्रेजिंग और कूलिंग टेक्नोलॉजी जैसी क्रिटिकल तकनीकों पर भी भारत की पकड़ होनी चाहिए.

सिर्फ डिजाइन नहीं, प्रोडक्शन क्षमता और मटेरियल प्रोसेसिंग तकनीक भी साझा होनी चाहिए.

4. स्थानीय सप्लाई चेन और MRO इकोसिस्टम

डील में इंडिजेनाइजेशन लक्ष्य, मैन्युफैक्चरिंग प्लान और निवेश शामिल हों.

भारत में ही MRO (Maintenance, Repair, Overhaul) क्षमताएं विकसित की जाएं.

5. दीर्घकालिक सर्विस और सपोर्ट क्लॉज

रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स, मेंटेनेंस मैनुअल और सपोर्ट टूल्स की सुनिश्चितता जरूरी है.

भविष्य में अमेरिकी या अन्य देशों की भौगोलिक नीतियों से इंजन प्रभावित न हो, इसकी गारंटी हो.

6. मॉड्यूलर डिज़ाइन, भविष्य के लिए तैयार

इंजन ऐसा डिज़ाइन हो जो AMCA के अलावा भविष्य के अन्य विमानों के लिए भी उपयोग हो सके.

कॉमन कोर, अपग्रेडेबल FADEC सिस्टम और स्केलेबल थ्रस्ट क्षमता इसमें शामिल होनी चाहिए.

7. भविष्य की रणनीतिक सुरक्षा

जियो-पॉलिटिकल परिवर्तन का असर तकनीकी साझेदारी पर न हो.

भारत पहले GE इंजन और जर्मन टैंक इंजन प्रोजेक्ट्स में ऐसे संकट झेल चुका है, इसलिए अब कोई समझौता नहीं.

क्या भारत फाइटर इंजन बनाना सीख पाएगा?

भारत ने हल्के हेलिकॉप्टरों के लिए "शक्ति इंजन" जैसे प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक Safran के साथ मिलकर बनाए हैं. यह एक अच्छा उदाहरण है कि यदि तकनीकी साझेदारी पारदर्शी और रणनीतिक हो, तो सफलता संभव है.

अब भारत का लक्ष्य है 90-120 kN थ्रस्ट वाला इंजन, जो पूरी तरह से फाइटर जेट के योग्य हो. Safran की क्रिस्टल ब्लेड टेक्नोलॉजी जैसी क्षमताएं, यदि भारत को ट्रांसफर होती हैं, तो यह गेमचेंजर साबित हो सकता है.

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