कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का ऐतिहासिक प्रदर्शन, 39 मेडल जीतकर दुनिया में बजाया डंका

Commonwealth Games 2026: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 का पर्दा गिर चुका है, लेकिन भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन लंबे समय तक याद रखा जाएगा.

india-commonwealth-games-2026-fourth-place-boxing-dominance-analysis
Image Source: Social Media

Commonwealth Games 2026: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 का पर्दा गिर चुका है, लेकिन भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन लंबे समय तक याद रखा जाएगा. इस बार परिस्थितियां भारत के लिए आसान नहीं थीं. जिन खेलों में देश परंपरागत रूप से सबसे ज्यादा पदक जीतता रहा है, वे इस संस्करण का हिस्सा ही नहीं थे. इसके बावजूद भारतीय दल ने जिस आत्मविश्वास, जुझारूपन और निरंतरता के साथ प्रदर्शन किया, उसने साबित कर दिया कि भारत का खेल अब कुछ चुनिंदा स्पर्धाओं तक सीमित नहीं रह गया है. 39 पदकों के साथ पदक तालिका में चौथा स्थान हासिल करना केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि भारतीय खेलों की बदलती तस्वीर का संकेत है. मुक्केबाजी से लेकर जूडो और पैरा स्पोर्ट्स तक कई ऐसे प्रदर्शन देखने को मिले, जिन्होंने आने वाले वर्षों के लिए उम्मीदें और मजबूत कर दी हैं.

भारत ने रचा सफलता का नया अध्याय

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में केवल 10 खेलों को शामिल किया गया था. कुश्ती, निशानेबाजी, बैडमिंटन और हॉकी जैसे वे खेल इसमें नहीं थे, जिनमें भारत का दबदबा लंबे समय से रहा है. ऐसे में शुरुआती अनुमान यही था कि भारत के लिए पदक तालिका में शीर्ष पांच देशों के बीच जगह बनाना भी मुश्किल हो सकता है. लेकिन 122 सदस्यीय भारतीय दल ने इन सभी आशंकाओं को गलत साबित कर दिया. भारत ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य पदक जीतकर कुल 39 मेडल अपने नाम किए और चौथे स्थान पर कब्जा जमाया. यह प्रदर्शन बताता है कि भारतीय खिलाड़ियों ने उपलब्ध अवसरों का भरपूर फायदा उठाया और हर चुनौती का मजबूती से सामना किया.

मुक्केबाजी बनी भारत की सबसे बड़ी ताकत

इस संस्करण में भारतीय मुक्केबाजों ने इतिहास रच दिया. भारत ने मुक्केबाजी में रिकॉर्ड सात स्वर्ण पदक जीतते हुए कुल 10 पदक हासिल किए, जो राष्ट्रमंडल खेलों में उसका अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है.

महिला मुक्केबाजों ने अपनी मजबूत परंपरा को कायम रखते हुए शानदार खेल दिखाया, वहीं पुरुष मुक्केबाजों ने भी उम्मीदों से बढ़कर प्रदर्शन किया. हालांकि यह भी सच है कि कई मजबूत यूरोपीय और एशियाई देशों की अनुपस्थिति के कारण प्रतियोगिता का स्तर ओलंपिक या विश्व चैंपियनशिप जैसा नहीं था. फिर भी बड़े मंच पर दबाव झेलते हुए लगातार पदक जीतना किसी भी टीम की गुणवत्ता को दर्शाता है और भारतीय मुक्केबाजों ने यही साबित किया.

जूडो में दिखी नई उम्मीद

जूडो भारत के लिए इस बार सबसे सुखद आश्चर्य साबित हुआ. लंबे समय तक चर्चा से दूर रहने वाले इस खेल में भारतीय खिलाड़ियों ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और यह संकेत दिया कि अब इस खेल में भी भारत लगातार आगे बढ़ रहा है.

अस्मिता डे ने अपने पिता के निधन के कुछ महीनों बाद स्वर्ण पदक जीतकर भावनात्मक और प्रेरणादायक कहानी लिखी. वहीं हर्ष सिंह ने भी स्वर्ण पदक जीतकर भारतीय जूडो को नई पहचान दिलाई. इन दोनों खिलाड़ियों की सफलता यह दिखाती है कि देश में जूडो का स्तर लगातार बेहतर हो रहा है.

पैरा खिलाड़ियों ने फिर साबित की अपनी क्षमता

भारतीय पैरा खिलाड़ियों का प्रदर्शन भी इस प्रतियोगिता की बड़ी उपलब्धियों में शामिल रहा. पावरलिफ्टिंग, एथलेटिक्स और अन्य स्पर्धाओं में भारतीय खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कई पदक अपने नाम किए.

पिछले कुछ वर्षों में पैरालंपिक खेलों में भारत की सफलता को अब लगातार दोहराया जा रहा है. कॉमनवेल्थ गेम्स में मिले पदकों ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय पैरा खेल अब विश्व स्तर पर मजबूती से अपनी पहचान बना चुके हैं और भविष्य में इनसे और बड़ी सफलताओं की उम्मीद की जा सकती है.

एथलेटिक्स में उम्मीदें और चुनौतियां दोनों रहीं

एथलेटिक्स में भारत का प्रदर्शन मिला-जुला रहा. चोट से वापसी कर रहे ओलंपिक चैंपियन नीरज चोपड़ा स्वर्ण नहीं जीत सके और उन्हें रजत पदक से संतोष करना पड़ा. कुछ अन्य खिलाड़ियों से भी ज्यादा उम्मीदें थीं, लेकिन वे अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाए.

इसके बावजूद कई खिलाड़ियों ने अपनी छाप छोड़ी. तेजस्विन शंकर ने घुटने की गंभीर चोट से वापसी करते हुए डेकाथलॉन में पदक जीता. गुलवीर सिंह लंबी दूरी की दौड़ में शानदार प्रदर्शन करते हुए दो पदक जीतने वाले भारत के एकमात्र खिलाड़ी बने. वहीं लंबे समय तक चोट से बाहर रहने के बाद मुरली श्रीशंकर ने वापसी करते हुए फिर से रजत पदक जीतकर अपनी गुणवत्ता साबित की.

भारोत्तोलन में पदक तो मिले, लेकिन स्वर्ण की कमी खली

भारतीय भारोत्तोलकों ने कुल आठ पदक जीतकर अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन इस बार स्वर्ण पदकों की संख्या काफी कम रही. चार साल पहले बर्मिंघम में भारत ने तीन स्वर्ण सहित 10 पदक जीते थे, जबकि इस बार केवल एक स्वर्ण पदक भारत के खाते में आया.

यह एकमात्र गोल्ड स्टार वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने दिलाया. बाकी खिलाड़ियों ने पदक तो जीते, लेकिन शीर्ष स्थान हासिल करने में सफल नहीं हो सके. इससे साफ है कि इस खेल में भारत को अगले चार वर्षों में और मजबूत तैयारी की जरूरत होगी.

कुछ खेलों में निराशा भी रही

जहां कई खेलों ने खुशियां दीं, वहीं कुछ स्पर्धाओं में भारत उम्मीदों के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाया. लॉन बाउल्स में बर्मिंघम में मिले ऐतिहासिक स्वर्ण और रजत पदकों की सफलता इस बार दोहराई नहीं जा सकी.

साइकिलिंग और तैराकी में भी भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन औसत रहा. इन खेलों में अभी भी विश्व स्तर की प्रतिस्पर्धा तक पहुंचने के लिए लंबा सफर तय करना बाकी है. एथलेटिक्स में भी भारत के पास और अधिक पदक जीतने का अवसर था, लेकिन कई संभावित दावेदार अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन से दूर रहे.

2030 की मेजबानी से बढ़ेंगी नई उम्मीदें

कॉमनवेल्थ गेम्स 2030 भारत के लिए बेहद खास होंगे क्योंकि उसी वर्ष इन खेलों के 100 वर्ष पूरे होंगे और भारत इसकी मेजबानी करेगा. घरेलू मैदान पर खेलने का फायदा भारतीय खिलाड़ियों को मिल सकता है और देश के पास अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का शानदार अवसर होगा.

ये भी पढ़ें: इस भारतीय मूल के क्रिकेटर पर लगा 8 साल का बैन, जानें ICC ने क्यों उठाया ये कदम