देश के शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों में गिने जाने वाले IIT कानपुर को लेकर बीते कुछ समय से जो खबरें सामने आईं, उन्होंने पूरे शिक्षा जगत को सोचने पर मजबूर कर दिया. लगातार सामने आई छात्र आत्महत्या की घटनाओं ने यह साफ कर दिया कि सिर्फ अकादमिक उत्कृष्टता ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर ध्यान देना जरूरी है. इन्हीं हालातों को देखते हुए अब IIT कानपुर प्रशासन ने एक ऐसा फैसला लिया है, जिसे छात्र कल्याण की दिशा में बड़ा और दूरगामी कदम माना जा रहा है.
संस्थान ने तय किया है कि अब हर छात्र की मेंटल हेल्थ की गहन जांच, यानी मानसिक स्थिति की नियमित पड़ताल की जाएगी. इस पहल का मकसद किसी भी छात्र को टूटने से पहले समझना और समय रहते मदद पहुंचाना है.
मेंटल स्कैनिंग आखिर होती क्या है
मेंटल स्कैनिंग सुनने में भले ही किसी मेडिकल टेस्ट जैसी लगे, लेकिन असल में यह मशीनों या स्कैन से जुड़ी प्रक्रिया नहीं है. यह एक मानवीय और संवेदनशील तरीका है, जिसमें प्रशिक्षित मनोचिकित्सक और काउंसलर छात्रों से सीधे संवाद करते हैं. बातचीत के दौरान यह समझने की कोशिश की जाती है कि छात्र किन हालातों से गुजर रहा है, क्या वह पढ़ाई के दबाव, अकेलेपन, असफलता के डर या भविष्य की चिंता से जूझ रहा है. इस प्रक्रिया का उद्देश्य छात्रों पर कोई ठप्पा लगाना नहीं, बल्कि उनके मन की स्थिति को बिना जज किए समझना है, ताकि जरूरत पड़ने पर उन्हें सही मार्गदर्शन और सहायता मिल सके.
IIT कानपुर की नई रणनीति
संस्थान के निदेशक प्रोफेसर मणिंद्र अग्रवाल की अगुवाई में हुई अहम बैठकों के बाद यह फैसला लिया गया कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अब कोई भी लापरवाही नहीं बरती जाएगी. इसके तहत आने वाले छह महीने से एक साल के भीतर काउंसलिंग टीम हर छात्र से व्यक्तिगत रूप से बातचीत करेगी. खास बात यह है कि यह टीम सिर्फ अपने केबिन तक सीमित नहीं रहेगी. काउंसलर हॉस्टल, क्लासरूम, लैब और लाइब्रेरी जैसे स्थानों पर भी मौजूद रहेंगे, ताकि छात्र बिना झिझक अपनी बात रख सकें. इसके साथ ही कैंपस में ‘सेंटर फॉर मेंटल हेल्थ एंड वेलबीइंग’ को और मजबूत किया गया है, जो चौबीसों घंटे छात्रों की मदद के लिए उपलब्ध रहेगा.
अनुभवी विशेषज्ञों की देखरेख
इस पूरे अभियान की जिम्मेदारी जाने-माने मनोचिकित्सक डॉ. आलोक बाजपेई और उनकी टीम को सौंपी गई है, जो पिछले दो दशकों से IIT सिस्टम से जुड़े रहे हैं. उनकी विशेषज्ञता और अनुभव के चलते इस पहल को काफी भरोसेमंद माना जा रहा है.
क्यों जरूरी था यह फैसला
अक्सर देखा जाता है कि छात्र बाहर से सामान्य और आत्मविश्वासी नजर आते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर भारी मानसिक दबाव झेल रहे होते हैं. प्रतिस्पर्धा, अपेक्षाएं और भविष्य की अनिश्चितता उन्हें धीरे-धीरे अकेला कर देती है. कई बार वे मदद मांगने से भी कतराते हैं. मेंटल स्कैनिंग जैसी पहल से ऐसे छात्रों की पहचान समय रहते हो सकेगी, जिन्हें काउंसलिंग या चिकित्सकीय सहयोग की जरूरत है. यह कदम न सिर्फ आत्महत्या जैसी घटनाओं को रोकने में मदद करेगा, बल्कि छात्रों को यह भरोसा भी देगा कि संस्थान सिर्फ उनकी पढ़ाई ही नहीं, बल्कि उनके मन और जीवन की भी उतनी ही परवाह करता है.
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