मॉस्को/नई दिल्ली: भारत और रूस मिलकर दुनिया की सबसे खतरनाक क्रूज मिसाइलों में शुमार ब्रह्मोस को एक नई ऊंचाई पर ले जाने की तैयारी कर रहे हैं. इस मिसाइल को अब सुपरसोनिक से आगे बढ़ाकर हाइपरसोनिक श्रेणी में लाने पर काम चल रहा है. रूस की प्रमुख मिसाइल निर्माता कंपनी NPO माशिनोस्ट्रोयेनिया के डायरेक्टर जनरल और मुख्य डिजाइनर अलेक्जेंडर लियोनोव ने इस दिशा में हो रहे संयुक्त प्रयासों की पुष्टि की है.
लियोनोव ने मॉस्को में कहा कि भारत और रूस ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम के निरंतर आधुनिकीकरण पर काम कर रहे हैं, जिसमें इसकी गति, मारक क्षमता और तकनीकी दक्षता को और बेहतर बनाया जाएगा. उनका कहना था कि ब्रह्मोस प्रोजेक्ट के तहत कॉम्पैक्ट मिसाइल डिज़ाइन और हाइपरसोनिक हथियारों के विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है.
ब्रह्मोस: पहले से ही घातक, अब और खतरनाक
ब्रह्मोस मिसाइल पहले ही दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में शामिल है. इसकी मौजूदा रफ्तार मैक 2.8 से अधिक है, जिसे इंटरसेप्ट करना आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम के लिए भी बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है. भारत की थलसेना, नौसेना और वायुसेना तीनों इस मिसाइल को अपने बेड़े में शामिल कर चुकी हैं.
यह मिसाइल वास्तविक परिस्थितियों में भी अपनी क्षमता साबित कर चुकी है और दुश्मन के लिए एक प्रभावी प्रतिरोधक हथियार के रूप में देखी जाती है.
ब्रह्मोस-2: हाइपरसोनिक युग की शुरुआत
हाइपरसोनिक संस्करण को ब्रह्मोस-2 कहा जा रहा है. यह अगली पीढ़ी की मिसाइल होगी, जिसकी संभावित गति मैक 5 से मैक 7 के बीच हो सकती है. इतनी तेज रफ्तार पर उड़ने वाली मिसाइल को मौजूदा या निकट भविष्य के एयर डिफेंस सिस्टम के लिए रोक पाना लगभग असंभव माना जाता है.
🚨🇮🇳🇷🇺 India and Russia are advancing hypersonic BrahMos tech: Russia's leading rocket manufacturer, NPO Mashinostroyenia pic.twitter.com/rzQMl0px8O
— Sputnik India (@Sputnik_India) January 30, 2026
ब्रह्मोस एयरोस्पेस के पूर्व निदेशक और डीआरडीओ के वरिष्ठ वैज्ञानिक अतुल दिनकर राणे पहले ही संकेत दे चुके हैं कि आने वाले 5 से 7 वर्षों तक दुनिया का कोई भी एयर डिफेंस सिस्टम ब्रह्मोस जैसी मिसाइल को पूरी तरह रोकने में सक्षम नहीं होगा. उन्होंने यह भी पुष्टि की थी कि हाइपरसोनिक ब्रह्मोस के विकास पर काम जारी है.
स्क्रैमजेट तकनीक से मिलेगी रफ्तार
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ब्रह्मोस-2 में स्क्रैमजेट इंजन के इस्तेमाल की संभावना है. यह एक अत्याधुनिक एयर-ब्रीदिंग इंजन तकनीक है, जो मिसाइल को लंबे समय तक हाइपरसोनिक गति बनाए रखने में सक्षम बनाती है.
इस संयुक्त परियोजना का उद्देश्य लगभग 1500 किलोमीटर तक मार करने वाली हाइपरसोनिक मिसाइल विकसित करना है, जो दुश्मन के गहरे इलाकों में स्थित अहम सैन्य ठिकानों को भी निशाना बना सके.
रूस का अनुभव, भारत को बड़ा फायदा
रूस को हाइपरसोनिक हथियारों के क्षेत्र में व्यापक अनुभव है. उसने पहले ही जिरकॉन हाइपरसोनिक मिसाइल, ओनिक्स क्रूज मिसाइल और बैस्टियन कोस्टल डिफेंस सिस्टम जैसे अत्याधुनिक हथियार विकसित किए हैं. NPO माशिनोस्ट्रोयेनिया बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम और निगरानी रडार सैटेलाइट्स के क्षेत्र में भी विशेषज्ञ मानी जाती है.
भारत इस अनुभव का लाभ उठाकर एडवांस्ड प्रोपल्शन सिस्टम, एयरोडायनामिक डिज़ाइन, हाई-टेम्परेचर मटीरियल और अत्याधुनिक गाइडेंस सिस्टम जैसी जटिल तकनीकों में महारत हासिल कर सकता है.
कब तक सेना में होगी तैनाती?
अनुमान है कि यदि विकास कार्य योजना के अनुसार आगे बढ़ता है, तो 2031 तक भारतीय सशस्त्र बलों की तीनों शाखाओं में ब्रह्मोस-2 का इंटीग्रेशन शुरू किया जा सकता है. हालांकि, हाइपरसोनिक तकनीक अत्यंत जटिल होती है और इसकी पूर्ण ऑपरेशनल क्षमता हासिल करने के लिए बार-बार परीक्षण, अपग्रेड और तकनीकी सुधार जरूरी होते हैं.
चीन के लिए क्यों है बड़ी चुनौती?
अगर भारत ब्रह्मोस-2 के विकास में सफल होता है, तो यह चीन के लिए एक गंभीर रणनीतिक चुनौती बन सकता है. मौजूदा चीनी एयर डिफेंस सिस्टम पहले ही ब्रह्मोस को रोकने में सक्षम नहीं हैं, हालांकि चीन भविष्य में ऐसे सिस्टम विकसित करने की कोशिश कर रहा है.
हाइपरसोनिक ब्रह्मोस के आने से तिब्बत और पश्चिमी चीन के कई सैन्य ठिकाने सीधे इसकी जद में आ जाएंगे. यह मिसाइल चीन के वेस्टर्न थिएटर कमांड और उसकी रॉकेट फोर्स रणनीति के लिए एक प्रभावी जवाब साबित हो सकती है.
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