नई दिल्ली: जब किसी दूसरे देश में युद्ध, गृहयुद्ध, प्राकृतिक आपदा या कोई बड़ा संकट आता है, तो वहां फंसे भारतीय नागरिकों को सुरक्षित वापस लाना सरकार की बड़ी जिम्मेदारी होती है. इसके लिए भारत सरकार विशेष निकासी अभियान चलाती है.
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने यूक्रेन, अफगानिस्तान, सूडान, इजराइल, ईरान और अन्य संकटग्रस्त देशों से हजारों भारतीयों को सुरक्षित बाहर निकाला है. केंद्र सरकार के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में भारत ने ऐसे निकासी अभियानों पर करीब 216 करोड़ रुपये खर्च किए हैं और 32 हजार से ज्यादा भारतीय नागरिकों को वापस देश लाया गया है.
भारत के बड़े निकासी अभियान
साल 2021 में अफगानिस्तान में बिगड़े हालात के दौरान भारत ने ऑपरेशन देवी शक्ति शुरू किया था. इस अभियान के तहत 669 लोगों को सुरक्षित भारत लाया गया.
इसके बाद 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ऑपरेशन गंगा चलाया गया. यह भारत का सबसे बड़ा निकासी अभियान था. इसके जरिए यूक्रेन में फंसे 18 हजार से ज्यादा भारतीय नागरिकों को वापस लाया गया.
साल 2023 में सूडान में गृहयुद्ध जैसे हालात के बीच ऑपरेशन कावेरी शुरू किया गया. इस अभियान में 4 हजार से ज्यादा लोगों को सुरक्षित निकाला गया.
इजराइल-हमास संघर्ष के दौरान भारत ने ऑपरेशन अजय के जरिए भारतीय नागरिकों को वापस लाया. वहीं, ईरान संकट के दौरान ऑपरेशन सिंधु चलाया गया, जिसके तहत हजारों भारतीय नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकाला गया.
इसके अलावा, पश्चिम एशिया में संकट के समय भारतीय दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों ने बड़ी संख्या में भारतीयों की घर वापसी में मदद की. इसमें यात्रा दस्तावेज, रहने की व्यवस्था, स्थानीय परिवहन और उड़ानों की मंजूरी जैसी सहायता शामिल रही.
नागरिकों को वापस लाने का फैसला कौन करता है?
किसी दूसरे देश में भारतीय नागरिक संकट में फंसते हैं तो उन्हें वापस लाने का फैसला केंद्र सरकार करती है. इस पूरी प्रक्रिया में कई मंत्रालय मिलकर काम करते हैं, लेकिन सबसे बड़ी जिम्मेदारी विदेश मंत्रालय की होती है.
सबसे पहले विदेश मंत्रालय वहां मौजूद भारतीय दूतावास से जानकारी लेता है. यह पता किया जाता है कि कितने भारतीय फंसे हुए हैं, उनकी स्थिति क्या है और उन्हें निकालने में क्या चुनौतियां आ सकती हैं.
अगर मामला बड़ा हो, जैसे युद्ध की स्थिति, तो प्रधानमंत्री कार्यालय और सरकार के वरिष्ठ अधिकारी मिलकर आगे की रणनीति तय करते हैं. इसके बाद अभियान की पूरी योजना बनाई जाती है और मंजूरी मिलने के बाद रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया जाता है.
सेना और अन्य मंत्रालयों की भूमिका
कई बार हालात इतने गंभीर होते हैं कि सामान्य उड़ानों से लोगों को निकालना संभव नहीं होता. ऐसे समय में रक्षा मंत्रालय और भारतीय सशस्त्र बलों की मदद ली जाती है.
जरूरत पड़ने पर भारतीय वायुसेना के विमान और नौसेना के जहाजों को अभियान में लगाया जाता है. वहीं, नागरिक उड्डयन मंत्रालय विशेष विमानों और चार्टर फ्लाइट की व्यवस्था करता है.
युद्ध क्षेत्र में फंसे लोगों तक कैसे पहुंचती है सरकार?
युद्ध वाले इलाके से लोगों को निकालना आसान नहीं होता. वहां लगातार खतरा बना रहता है, इसलिए हर कदम बेहद सावधानी से उठाया जाता है. सबसे पहले भारतीय दूतावास वहां मौजूद नागरिकों से संपर्क करता है. फोन, ईमेल, हेल्पलाइन और सोशल मीडिया के जरिए लोगों की जानकारी जुटाई जाती है.
इसके बाद सुरक्षित जगह तय की जाती है, जहां सभी नागरिकों को पहुंचने के लिए कहा जाता है. कई बार लोगों को खुद भी कई किलोमीटर का सफर तय करके इन सुरक्षित स्थानों तक पहुंचना पड़ता है.
सुरक्षित रास्ता बनाकर होती है वापसी
जब लोगों को निकालना होता है तो भारत सरकार संबंधित देश की सरकार, सेना या अन्य पक्षों से सुरक्षित रास्ते की अनुमति मांगती है. कई बार संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों की मदद भी ली जाती है.
सुरक्षित रास्ता मिलने के बाद लोगों को बसों या दूसरे वाहनों से सीमा या एयरपोर्ट तक पहुंचाया जाता है.
अगर किसी देश का एयरपोर्ट बंद होता है तो नागरिकों को पहले पड़ोसी देश की सीमा तक ले जाया जाता है. वहां से भारतीय वायुसेना या विशेष विमानों के जरिए उन्हें भारत वापस लाया जाता है.
यूक्रेन में दिखी थी ऐसी व्यवस्था
2022 में यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने इसी तरह का अभियान चलाया था. भारतीय छात्रों और नागरिकों को बसों के जरिए पोलैंड, रोमानिया, हंगरी और स्लोवाकिया की सीमाओं तक पहुंचाया गया. इसके बाद विशेष विमानों से उन्हें सुरक्षित भारत वापस लाया गया.
विदेशों में संकट के समय भारतीय नागरिकों की सुरक्षा के लिए सरकार, दूतावास, सेना और कई एजेंसियां मिलकर काम करती हैं. यही तालमेल किसी भी बड़े निकासी अभियान को सफल बनाता है.
ये भी पढ़ें- ब्रह्मोस, अग्नि-5 और K4... भारत की वो तीन मिसाइलें, जिनसे खौफ में रहते हैं दुश्मन! जानें इनकी ताकत