हांगकांग में एक निर्माण परियोजना के दौरान उस वक्त हड़कंप मच गया, जब ज़मीन की खुदाई करते समय मजदूरों को एक विशाल और खतरनाक बम मिला. यह बम लगभग 100 साल पुराना बताया जा रहा है और द्वितीय विश्व युद्ध के दौर का है. करीब 1.5 मीटर लंबा और 450 किलोग्राम वजनी यह बम जमीन के नीचे दबा हुआ था और अब भी सक्रिय अवस्था में था.
बम मिलने की सूचना मिलते ही स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां तुरंत हरकत में आईं. पूरे इलाके को घेरकर खाली कराया गया और लगभग 6,000 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया. आसपास की 18 इमारतों को एहतियातन खाली कराया गया. हांगकांग पुलिस ने घर-घर जाकर जांच की ताकि कोई व्यक्ति इलाके में न छूट जाए.
बम डिफ्यूज करने में लगी स्पेशल टीम
हांगकांग पुलिस की बम निरोधक टीम ने इसे “बेहद संवेदनशील और खतरनाक” करार देते हुए तुरंत डिस्पोजल ऑपरेशन शुरू किया. अधिकारियों के अनुसार, इस तरह के पुराने बम को निष्क्रिय करना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि समय के साथ इनकी स्थिति अस्थिर हो जाती है और थोड़ा भी गलत कदम बड़ा विस्फोट कर सकता है.
इतिहास दोहराया: 2018 में भी मिला था बम
यह कोई पहला मामला नहीं है. वर्ष 2018 में वान चाई इलाके में भी एक इसी प्रकार का बम मिला था, जिसकी वजह से करीब 1,200 लोगों को हटाया गया था और बम को निष्क्रिय करने में पूरी 20 घंटे की मशक्कत लगी थी.
WWII बम एक वैश्विक खतरा
द्वितीय विश्व युद्ध खत्म हुए दशकों बीत चुके हैं, लेकिन उससे जुड़ा खतरा आज भी दुनिया के कई हिस्सों में बना हुआ है. जर्मनी में जून 2025 में ऐसे ही तीन अमेरिकी बम पाए गए, जिसके कारण 20,000 लोगों की निकासी करनी पड़ी. वियतनाम, लाओस, गाजा और यूक्रेन जैसे देशों में भी जमीन के नीचे दबे ऐसे बम लगातार जान का जोखिम बने हुए हैं. जर्मनी की डॉयचे वेले की एक रिपोर्ट के अनुसार, World War-II के अनएक्सप्लोडेड बम (UXBs) आज भी यूरोप और एशिया के कई हिस्सों में एक बड़ी सुरक्षा चुनौती हैं.
प्रशासन की सतर्कता और चुनौतियां
हांगकांग पुलिस का कहना है कि जब तक बम पूरी तरह निष्क्रिय नहीं हो जाता, तब तक वह एक चलती-फिरती आफत की तरह होता है. डिस्पोजल ऑपरेशन में अत्यधिक धैर्य, तकनीकी दक्षता और सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन जरूरी होता है. एक छोटी सी गलती जानलेवा साबित हो सकती है.
द्वितीय विश्व युद्ध: एक संक्षिप्त जानकारी
शुरुआत: 1 सितंबर 1939 (जर्मनी द्वारा पोलैंड पर हमला) समाप्ति: 2 सितंबर 1945 (जापान द्वारा आत्मसमर्पण) इस युद्ध में दुनियाभर में करोड़ों लोगों की जानें गईं और कई देशों को बर्बादी झेलनी पड़ी. बमों का वह कहर आज भी ज़मीन के नीचे सो रहा है कभी भी जाग सकता है.
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