नई दिल्ली: संसद के उच्च सदन में एक बार फिर सहमति की तस्वीर देखने को मिली, जब हरिवंश नारायण सिंह को लगातार तीसरी बार राज्यसभा का उपसभापति चुना गया. खास बात यह रही कि इस बार भी उनका चयन बिना किसी मुकाबले के हुआ, क्योंकि विपक्ष की ओर से कोई उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा गया. इस अहम मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सदन में मौजूद रहे, जिससे इस चुनाव का महत्व और बढ़ गया.
निर्विरोध चुनाव ने दिया राजनीतिक संकेत
संसदीय राजनीति में अक्सर सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी टकराहट देखने को मिलती है, लेकिन कुछ मौके ऐसे भी आते हैं जब सहमति की झलक दिखाई देती है. उपसभापति पद का यह चुनाव ऐसा ही एक उदाहरण रहा. विपक्ष द्वारा उम्मीदवार न उतारे जाने से यह साफ हो गया कि इस पद को लेकर व्यापक सहमति या रणनीतिक निर्णय लिया गया.
बिना किसी प्रतिद्वंद्वी के चुनाव जीतना न केवल प्रक्रिया को आसान बनाता है, बल्कि यह सदन के भीतर राजनीतिक समीकरणों और सत्ता पक्ष की मजबूती का संकेत भी देता है.
तीसरी बार संभाली जिम्मेदारी
हरिवंश नारायण सिंह इससे पहले 2018 में पहली बार उपसभापति बने थे और 2020 में उन्हें दूसरी बार यह जिम्मेदारी मिली थी. अब तीसरी बार इस पद पर उनका चयन उनके अनुभव, कार्यशैली और विभिन्न दलों के बीच उनकी स्वीकार्यता को दर्शाता है.
इस चुनाव के लिए कुल पांच प्रस्ताव पेश किए गए थे, जिनमें जगत प्रकाश नड्डा, निर्मला सीतारमण समेत कई वरिष्ठ नेताओं ने उनका नाम आगे बढ़ाया. इन प्रस्तावों को विभिन्न दलों का समर्थन मिला, जिससे उनकी उम्मीदवारी को मजबूत आधार मिला.
संसदीय प्रक्रिया के तहत इन प्रस्तावों को सदन में पेश कर वॉइस वोट के जरिए मंजूरी दी जाती है. एक प्रस्ताव के पारित होते ही बाकी प्रस्ताव स्वतः निरस्त हो जाते हैं, जिससे यह प्रक्रिया औपचारिक बन जाती है, लेकिन इसकी राजनीतिक अहमियत बनी रहती है.
राज्यसभा सदस्य के रूप में नया कार्यकाल
हरिवंश नारायण सिंह हाल ही में एक बार फिर राज्यसभा के सदस्य बने हैं. उन्होंने शुक्रवार को सांसद के रूप में शपथ ली. यह उनका तीसरा कार्यकाल है, जो वर्ष 2032 तक चलेगा.
उनका मनोनयन भारत के राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा किया गया है. संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वे साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष योगदान देने वाले 12 सदस्यों को राज्यसभा में नामित कर सकें.
हरिवंश नारायण सिंह एक प्रख्यात पत्रकार भी रहे हैं और लंबे समय से संसदीय कार्यवाही का हिस्सा हैं, जिससे उन्हें सदन की कार्यप्रणाली की गहरी समझ है.
खाली सीट के बाद हुआ मनोनयन
हाल ही में पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के राज्यसभा से सेवानिवृत्त होने के बाद एक सीट खाली हुई थी. इसी सीट पर हरिवंश को मनोनीत किया गया.
उनका पिछला कार्यकाल 9 अप्रैल को समाप्त हो गया था, जबकि 10 अप्रैल से उनका नया कार्यकाल शुरू हुआ है.
राजनीतिक सफर और जेडीयू से जुड़ाव
हरिवंश नारायण सिंह को पहली बार अप्रैल 2014 में बिहार से राज्यसभा भेजा गया था, जब नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) ने उन्हें उम्मीदवार बनाया था. हालांकि इस बार उन्हें पार्टी की ओर से टिकट नहीं मिला, बल्कि राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किया गया.
इस अवसर पर राज्यसभा में कई प्रमुख नेता मौजूद रहे, जिनमें केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, कांग्रेस नेता जयराम रमेश सहित विभिन्न दलों के सदस्य शामिल थे.
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