Congo Ebola Crisis: अफ्रीका एक बार फिर ऐसी स्वास्थ्य आपदा का सामना कर रहा है, जिसने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो (डीआर कांगो) में इबोला वायरस का संक्रमण इतनी तेज़ी से फैल रहा है कि स्वास्थ्य एजेंसियां इसे हाल के वर्षों का सबसे गंभीर और सबसे तेज़ फैलने वाला प्रकोप मान रही हैं. हालात इतने खराब हैं कि अस्पतालों में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, स्वास्थ्यकर्मियों के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं और कई प्रभावित इलाकों तक राहत टीमें भी सुरक्षित तरीके से नहीं पहुंच पा रही हैं. संघर्ष, संसाधनों की कमी और स्थानीय स्तर पर विरोध ने इस संकट को और अधिक गंभीर बना दिया है.
एक हजार से अधिक मौतों ने बढ़ाई चिंता
अफ्रीका सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (Africa CDC) के महानिदेशक डॉ. जीन कासेया ने घाना में आयोजित एक स्वास्थ्य सम्मेलन के दौरान बताया कि कांगो में इबोला संक्रमण से अब तक 1,031 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि हालात बेहद गंभीर हैं क्योंकि मरीजों के इलाज के लिए पर्याप्त दवाइयां, वैक्सीन और आर्थिक संसाधन उपलब्ध नहीं हैं. उनके मुताबिक, कई लोगों की मौत केवल इसलिए हो रही है क्योंकि स्वास्थ्य व्यवस्था इस तेजी से फैलते संक्रमण का सामना करने की स्थिति में नहीं है. अंतरराष्ट्रीय सहयोग की कमी भी इस संकट को और गहरा कर रही है.
तेजी से बढ़ रहे हैं संक्रमण के मामले
कांगो के स्वास्थ्य मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, सोमवार तक इबोला संक्रमण के 2,473 नए मामलों की पुष्टि की जा चुकी थी. इनमें से कम से कम 737 मरीज अस्पतालों या आइसोलेशन केंद्रों में इलाज करा रहे हैं. स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि यह वायरस जिस गति से फैल रहा है, उससे संक्रमण को नियंत्रित करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है. कई नए मामले उन इलाकों से सामने आ रहे हैं, जहां पहले संक्रमण की कोई जानकारी नहीं थी.
क्यों अलग है यह इबोला वैरिएंट?
15 मई को स्वास्थ्य अधिकारियों ने जिस नए वैरिएंट की पुष्टि की, वह बुन्डिबुग्यो (Bundibugyo) स्ट्रेन से जुड़ा हुआ है. यह वैरिएंट पहले सामने आए इबोला वायरस से अलग माना जा रहा है क्योंकि फिलहाल इसके लिए कोई स्वीकृत वैक्सीन या प्रभावी दवा उपलब्ध नहीं है. यही वजह है कि संक्रमित मरीजों के इलाज में बड़ी चुनौती सामने आ रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द प्रभावी उपचार उपलब्ध नहीं हुआ तो संक्रमण की रफ्तार और अधिक बढ़ सकती है.
पुराने रिकॉर्ड भी टूटते आ रहे नजर
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा प्रकोप ने संक्रमण फैलने की गति के मामले में पुराने रिकॉर्ड भी पीछे छोड़ दिए हैं. वर्ष 2013 से 2016 के बीच पश्चिमी अफ्रीका में फैले इबोला प्रकोप को अब तक सबसे भयावह माना जाता था. उस दौरान करीब 28 हजार लोग संक्रमित हुए थे और 11 हजार से अधिक लोगों की मौत हुई थी. हालांकि उस महामारी में एक हजार मौतों का आंकड़ा पार करने में लगभग आठ महीने का समय लगा था, जबकि मौजूदा प्रकोप में यह संख्या कहीं अधिक तेजी से सामने आई है. यही वजह है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे इतिहास के सबसे खतरनाक इबोला प्रकोपों में शामिल कर रहे हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का मानना है कि आधिकारिक आंकड़े इस महामारी की पूरी तस्वीर नहीं दिखाते. संगठन के अनुसार, वास्तविक संक्रमितों और मौतों की संख्या सरकारी रिकॉर्ड से दो से चार गुना तक अधिक हो सकती है. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि कई प्रभावित इलाके ऐसे हैं, जहां विद्रोही गतिविधियों और हिंसा की वजह से स्वास्थ्य टीमें पहुंच ही नहीं पा रही हैं. ऐसे क्षेत्रों में न तो जांच हो पा रही है और न ही मरीजों का सही रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है.
कैसे फैलता है इबोला वायरस?
इबोला एक अत्यंत संक्रामक और गंभीर वायरल बीमारी है, जो संक्रमित व्यक्ति के शारीरिक तरल पदार्थों जैसे खून, उल्टी, पसीना, वीर्य या अन्य द्रवों के सीधे संपर्क में आने से फैलती है. यह संक्रमण शरीर के कई अंगों को प्रभावित करता है और समय पर इलाज नहीं मिलने पर जानलेवा साबित हो सकता है. यही कारण है कि संक्रमित मरीजों को तुरंत अलग रखना और उनके संपर्क में आए लोगों की पहचान करना बेहद जरूरी माना जाता है.
स्वास्थ्य एजेंसियों के लिए नई चुनौती
स्वास्थ्य अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि लगभग 80 प्रतिशत नए मामले ऐसे इलाकों से सामने आ रहे हैं, जिन्हें पहले संक्रमण का केंद्र नहीं माना गया था. इसका मतलब है कि वायरस अब स्वास्थ्य विभाग की निगरानी से भी अधिक तेजी से नए क्षेत्रों में फैल रहा है. इसी कारण स्वास्थ्य टीमें इतुरी प्रांत समेत उन चार अन्य प्रांतों में अपनी निगरानी और राहत कार्य बढ़ा रही हैं, जहां संक्रमण के नए मामले लगातार सामने आ रहे हैं.
अंतिम संस्कार बना संक्रमण की बड़ी वजह
इबोला नियंत्रण में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक मृतकों का अंतिम संस्कार भी बन गया है. कई स्थानीय समुदाय सुरक्षित तरीके से शव दफनाने वाली मेडिकल टीमों का विरोध कर रहे हैं क्योंकि वे अपनी पारंपरिक धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार करना चाहते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि संक्रमित शव के सीधे संपर्क में आने से वायरस के फैलने का खतरा काफी बढ़ जाता है. इसलिए सुरक्षित दफन प्रक्रिया संक्रमण रोकने का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है.
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