Trump Greenland: वेनेजुएला के बाद अब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नजर सीधे ग्रीनलैंड पर टिक गई है. ट्रंप कई बार सार्वजनिक रूप से यह साफ कर चुके हैं कि अमेरिका को हर हाल में ग्रीनलैंड चाहिए, चाहे वहां की जनता सहमत हो या नहीं. हाल ही में व्हाइट हाउस में तेल कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों के साथ बातचीत के दौरान ट्रंप ने दो टूक शब्दों में कहा कि अगर अमेरिका पीछे हटता है तो रूस या चीन ग्रीनलैंड पर कब्जा कर सकते हैं, और यह स्थिति वॉशिंगटन को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं है.
ट्रंप के इस आक्रामक रुख के बाद डेनमार्क भी सतर्क हो गया है. ग्रीनलैंड भले ही एक स्वायत्त क्षेत्र हो, लेकिन उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी तरह डेनमार्क के पास है. डेनिश रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि किसी भी तरह की सैन्य घुसपैठ का जवाब तुरंत हथियारों से दिया जाएगा. इसके लिए आज भी “पहले गोली, बाद में सवाल” वाला आदेश लागू है, जो मूल रूप से 1940 में नाजी हमले के बाद तैयार किया गया था और 1952 से प्रभावी माना जाता है.
ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए इतना अहम क्यों है?
ग्रीनलैंड की आबादी भले ही केवल करीब 57 हजार हो, लेकिन इसका रणनीतिक महत्व बेहद बड़ा है. यह द्वीप आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है, जिसे आने वाले समय में वैश्विक शक्ति संघर्ष का नया केंद्र माना जा रहा है. बर्फ के तेजी से पिघलने के कारण यहां नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं और जमीन के नीचे छिपे खनिज संसाधनों तक पहुंच आसान होती जा रही है.
आर्कटिक में शिपिंग रूट्स, तेल, गैस और दुर्लभ खनिजों पर नियंत्रण भविष्य की आर्थिक और सैन्य बढ़त तय कर सकता है. इसी वजह से अमेरिका, रूस और चीन, तीनों की नजर इस इलाके पर है.
ग्रीनलैंड में पहले से ही अमेरिका की सैन्य मौजूदगी है, लेकिन ट्रंप का मानना है कि मौजूदा समझौते इसकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं हैं. रूस पहले ही आर्कटिक में अपनी सैन्य गतिविधियां तेज कर चुका है, जबकि चीन खुद को “नियर-आर्कटिक पावर” घोषित कर चुका है.
ग्रीनलैंड में स्थित अमेरिका का पिटुफिक स्पेस बेस बेहद अहम है. यहां से मिसाइल अर्ली वार्निंग सिस्टम और अंतरिक्ष निगरानी की जाती है. यह बेस NORAD (नॉर्थ अमेरिकन एयरोस्पेस डिफेंस कमांड) का महत्वपूर्ण हिस्सा है. ट्रंप इसी आधार पर तर्क दे रहे हैं कि ग्रीनलैंड पर पूरा नियंत्रण अमेरिका के हाथ में होना चाहिए.
डेनमार्क की सैन्य ताकत और ग्रीनलैंड में मौजूदगी
डेनमार्क की सेना आकार में छोटी जरूर है, लेकिन तकनीकी रूप से आधुनिक मानी जाती है. ग्लोबल फायरपावर 2025 रैंकिंग के अनुसार डेनमार्क दुनिया की 145 सेनाओं में 45वें स्थान पर है. देश के पास कुल मिलाकर करीब 85 हजार सैनिक हैं, जिनमें सक्रिय सैनिक, रिजर्व फोर्स और होम गार्ड शामिल हैं.
डेनमार्क की वायुसेना के पास एफ-35A स्टेल्थ फाइटर जेट्स हैं, जबकि उसकी नौसेना को आर्कटिक पेट्रोलिंग में विशेषज्ञ माना जाता है. ग्रीनलैंड में डेनमार्क की सैन्य मौजूदगी जॉइंट आर्कटिक कमांड के जरिए होती है, जिसका मुख्यालय राजधानी नूक में है.
यह कमांड क्षेत्र की निगरानी, संप्रभुता की रक्षा, सर्च एंड रेस्क्यू और नाटो के साथ समन्वय की जिम्मेदारी निभाता है. खास बात यह है कि आज भी सिरीयस डॉग स्लेज पेट्रोल जैसे विशेष दस्ते कुत्तों की स्लेज के जरिए बर्फीले इलाकों में गश्त करते हैं, जो दुनिया की सबसे कठिन सैन्य गश्तों में गिने जाते हैं.
अमेरिका के मुकाबले डेनमार्क कहां खड़ा है?
अगर सीधी तुलना की जाए तो अमेरिका और डेनमार्क के बीच सैन्य ताकत का अंतर बहुत बड़ा है. अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है, जिसके पास लाखों सैनिक, सैकड़ों लड़ाकू विमान, विशाल नौसेना और अंतरिक्ष तक फैली सैन्य क्षमताएं हैं.
वहीं डेनमार्क की सेना मुख्य रूप से राष्ट्रीय रक्षा और नाटो के भीतर अपनी जिम्मेदारियों के लिए तैयार की गई है, न कि किसी महाशक्ति से सीधी लड़ाई के लिए. यही कारण है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर ग्रीनलैंड को लेकर कोई टकराव होता है, तो यह केवल डेनमार्क बनाम अमेरिका की लड़ाई नहीं होगी, बल्कि इसका असर पूरे नाटो गठबंधन पर पड़ेगा.
नाटो और यूरोप की बढ़ती चिंता
अमेरिका और डेनमार्क दोनों नाटो के सदस्य हैं और सामूहिक सुरक्षा समझौते से बंधे हुए हैं. ऐसे में अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड पर जबरन नियंत्रण की कोशिश नाटो की एकता को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है.
कई यूरोपीय नेताओं ने इस विचार पर चिंता जाहिर की है, क्योंकि इससे नाटो के भीतर विश्वास और सहयोग कमजोर हो सकता है. हालांकि अब तक इस मुद्दे पर कोई ठोस और साझा रणनीति सामने नहीं आई है.
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