What Is Anti-Drag System: दिल्ली मेट्रो में जल्दबाजी में चढ़ते या उतरते समय यात्रियों के कपड़े, बैग या दुपट्टे के दरवाजे में फंसने से होने वाली दर्दनाक घटनाओं को अब इतिहास बनाने की तैयारी शुरू हो चुकी है. दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) ने यात्रियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एंटी ड्रैग सिस्टम लागू करने की दिशा में बड़ी पहल की है.
DMRC ने सबसे पहले रेड लाइन की एक ट्रेन के सभी आठ कोचों में एंटी ड्रैग सिस्टम को इंस्टॉल कर लिया है और इसका ट्रायल शुरू कर दिया गया है। जल्द ही रेड और ब्लू लाइन की चार अन्य ट्रेनों में भी यह तकनीक लगाई जाएगी. ट्रायल सफल होने के बाद इस सिस्टम को पुराने सभी कॉरिडोर्स की ट्रेनों में चरणबद्ध तरीके से लगाया जाएगा.
क्यों पड़ी इसकी ज़रूरत?
मौजूदा मेट्रो ट्रेनों में लगे सेंसर 15 मिमी तक की वस्तु को पहचानते हैं और दरवाजे बंद नहीं होते, लेकिन इससे पतली चीजें, जैसे साड़ी, दुपट्टा, बैग की स्ट्रिप आदि दरवाजे में फंस सकती हैं.
14 दिसंबर 2023 को रेड लाइन पर एक दर्दनाक हादसा हुआ था, जब इंद्रलोक स्टेशन पर एक महिला की साड़ी दरवाजे में फंस गई थी. ट्रेन के चलने पर महिला प्लेटफॉर्म पर घसीटती चली गई और गंभीर रूप से घायल हो गई, जिसके बाद उसकी मौत हो गई थी. इस घटना ने मेट्रो की सुरक्षा व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए थे.
क्या है एंटी ड्रैग सिस्टम?
यह एक स्मार्ट सेफ्टी मैकेनिज्म है जो दरवाजों में फंसी 0.8 मिमी जितनी पतली वस्तु को भी पहचान लेता है. फंसने की स्थिति में यह सिस्टम तुरंत इमरजेंसी ब्रेक को सक्रिय करता है. ट्रेन रुक जाती है और आगे नहीं बढ़ती, जिससे हादसे को टाला जा सके.
किन लाइनों पर लगेगा यह सिस्टम?
DMRC ने तय किया है कि रेड, ब्लू, येलो, वायलेट और ग्रीन लाइन की सभी ट्रेनों में यह सिस्टम लगाया जाएगा. जबकि पिंक, मजेंटा और एयरपोर्ट एक्सप्रेस लाइन के स्टेशनों पर पहले से प्लेटफॉर्म स्क्रीन डोर्स (PSD) लगे हुए हैं, इसलिए वहां इसकी विशेष जरूरत नहीं है.
सुरक्षा गार्ड भी बढ़े
इंद्रलोक जैसी घटनाओं के बाद अब DMRC ने कई मेट्रो स्टेशनों पर अतिरिक्त सुरक्षा गार्ड तैनात किए हैं. ये गार्ड ट्रेनों के खुलने से पहले यात्रियों के चढ़ने-उतरने की निगरानी करते हैं और सिग्नल देने के बाद ही ट्रेन को रवाना किया जाता है.
भविष्य की तैयारी
2023 में सीएमआरएस (मेट्रो रेल संरक्षा आयुक्त) और केंद्रीय शहरी कार्य मंत्रालय की सिफारिशों के बाद ₹3 करोड़ की लागत से यह योजना शुरू की गई थी. यह एक ऐसा कदम है जो सिर्फ तकनीकी नहीं, मानवीय दृष्टिकोण से भी बेहद अहम है.
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