Israel West Bank: इजरायल की नेसेट (संसद) ने कब्जे वाले पश्चिमी तट पर अपनी संप्रभुता लागू करने वाले दो विवादित कानूनों को प्रारंभिक मंजूरी दे दी है, जिससे मध्य-पूर्व में सियासी हलचल तेज हो गई है. खासकर खाड़ी के महत्वपूर्ण देश जैसे सऊदी अरब, कतर और यूएई ने इस कदम को न केवल कठोर शब्दों में खारिज किया है बल्कि इसे "रेड लाइन" भी बताया है.
ये देश इस बात से गहरा असंतोष जता रहे हैं कि इजरायल की यह नई विस्तारवादी नीति अब्राहम समझौते जैसी क्षेत्रीय शांति पहल को गंभीर संकट में डाल सकती है. यह समझौता मुस्लिम देशों और इजरायल के बीच रिश्तों को सामान्य करने की एक ऐतिहासिक पहल थी, जिसका अब भविष्य अनिश्चित हो गया है.
फिलिस्तीन के अधिकारों पर सवाल
कतर और सऊदी अरब ने इस नए कानून को फिलिस्तीनी लोगों के मूल अधिकारों के लिए सीधा हमला बताते हुए अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करार दिया है. कतर के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि यह कदम फिलिस्तीनी इतिहास और न्याय के साथ खिलवाड़ है. कतर ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से अपील की है कि वे इजरायल को इस विस्तारवादी नीति से रोकें.
सऊदी अरब ने भी स्पष्ट किया कि वह किसी भी तरह के कब्जे और बस्ती निर्माण को अस्वीकार करता है और फिलिस्तीनी लोगों के 1967 की सीमाओं के भीतर अपने स्वतंत्र राज्य की स्थापना के अधिकार का समर्थन करता है.
यूएई की चेतावनी और संतुलन की मांग
संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति के राजनयिक सलाहकार अनवर गरगाश ने इस मुद्दे को लेकर सख्त रुख अपनाया है. गरगाश ने इसे एक ‘रेड लाइन’ बताते हुए कहा कि इजरायल को अपनी सुरक्षा और एक व्यवहार्य फिलिस्तीनी राज्य के बीच संतुलन बनाना होगा. उनका मानना है कि वर्तमान कदम से क्षेत्रीय तनाव और बढ़ सकता है.
विधेयक की राजनीतिक अहमियत और भविष्य
इजरायली संसद में 120 सीटों में से 25-24 के संकरे मत अंतर से पास हुए ये कानून फिलिस्तीनी क्षेत्रों पर इजरायली संप्रभुता थोपने का प्रयास है. यह अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ माना जाता है और फिलिस्तीन संघर्ष को और जटिल बना सकता है. यह बस पहला चरण है, आगे इसे पूर्ण रूप देने के लिए और प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी.
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