Election Code of Conduct: बिहार में विधानसभा चुनावों की घोषणा होते ही राज्य की सियासत गर्मा गई है. चुनाव आयोग ने बताया कि दो चरणों में चुनाव 6 और 11 नवंबर को होंगे और नतीजे 14 नवंबर को घोषित किए जाएंगे. इसके साथ ही राज्य में आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू हो गई है, जो अब चुनावी प्रक्रिया पूरी होने तक प्रभावी रहेगी. यानी लगभग 40 दिनों तक बिहार में चुनावी गतिविधियां पूरी तरह नियमबद्ध रहेंगी.
चुनाव आयोग द्वारा तय किए गए ऐसे नियम, जिनका पालन हर राजनीतिक दल, उम्मीदवार और संबंधित सरकारी एजेंसियों को करना होता है, उन्हें ही आचार संहिता कहा जाता है. इसका उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी बनाना है. यह नियम किसी भी पार्टी या उम्मीदवार को चुनावी लाभ उठाने से रोकते हैं.
चुनाव के दौरान सरकार क्या नहीं कर सकती
जैसे ही आचार संहिता लागू होती है, सरकार किसी नई योजना की घोषणा नहीं कर सकती. किसी भी परियोजना का उद्घाटन, शिलान्यास या लोकार्पण नहीं किया जा सकता. सरकारी इमारतों और वाहनों का चुनावी उपयोग रोक दिया जाता है. सरकारी प्रचार सामग्री हटानी पड़ती है और सरकारी संसाधनों से किसी भी प्रकार के प्रचार पर रोक लग जाती है. मुख्यमंत्री, मंत्री या प्रधानमंत्री की तस्वीरें सरकारी विज्ञापनों या इमारतों में नहीं दिखाई जा सकतीं.
सोशल मीडिया पर भी सख्त नियम
इस बार सोशल मीडिया पर भी चुनाव आयोग की कड़ी निगरानी है. कोई भी भड़काऊ पोस्ट, फर्जी खबर या जातीय, धार्मिक टिप्पणी चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन मानी जाएगी. सिर्फ एक गलत पोस्ट किसी को जेल तक पहुंचा सकती है. इसलिए चुनाव के दौरान सोशल मीडिया का इस्तेमाल सोच-समझकर करना बेहद ज़रूरी है.
सिर्फ नेता नहीं, आम लोग भी आचार संहिता के दायरे में
यह केवल नेताओं के लिए नहीं, बल्कि आम नागरिकों पर भी लागू होती है. अगर आप किसी राजनीतिक प्रचार में हिस्सा ले रहे हैं और किसी नियम का उल्लंघन करते हैं, तो आपके खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है. अगर कोई नेता या कार्यकर्ता आपको नियम तोड़ने के लिए कहता है, तो आप उसे रोक सकते हैं और इसकी सूचना चुनाव आयोग को दे सकते हैं. नियम तोड़ने पर हिरासत में लिया जाना या एफआईआर दर्ज होना आम बात है.
प्रचार के लिए अनुमति ज़रूरी
किसी भी राजनीतिक दल या उम्मीदवार को सभा, रैली या जुलूस निकालने से पहले चुनाव आयोग से अनुमति लेनी होती है. साथ ही, इसकी सूचना स्थानीय पुलिस को भी देनी होती है. प्रचार का स्थान, समय और तरीके भी पहले से तय करने होते हैं, ताकि शांति व्यवस्था बनी रहे.
भाषाई और सांप्रदायिक बयानबाज़ी पर सख्ती
कोई भी दल या उम्मीदवार ऐसे बयान नहीं दे सकता जिससे जाति, धर्म या भाषा के नाम पर नफरत फैले या समुदायों के बीच मतभेद बढ़े. ऐसा करना कानूनन अपराध है और इसकी सज़ा कड़ी हो सकती है. व्यक्तिगत हमले, अपशब्द या झूठे आरोप भी आचार संहिता के तहत वर्जित हैं.
दीवारों पर पोस्टर भी बिना इजाज़त नहीं
चुनाव प्रचार के लिए किसी की दीवार, जमीन या दुकान पर पोस्टर चिपकाना या बैनर लगाना बिना अनुमति के अवैध है. इसके अलावा मतदान केंद्र से सौ मीटर की दूरी तक किसी भी प्रकार का प्रचार पूरी तरह से बैन होता है. मतदान के एक दिन पहले चुनावी सभाएं भी नहीं की जा सकतीं.
सरकारी नौकरियों और लोकलुभावन वादों पर रोक
चुनाव के दौरान किसी भी प्रकार की सरकारी भर्ती प्रक्रिया रोक दी जाती है. यह माना जाता है कि ऐसी घोषणाएं मतदाताओं को प्रभावित कर सकती हैं. इसी तरह, सत्ताधारी पार्टी कोई भी लोकलुभावन घोषणा नहीं कर सकती, जो चुनावी फायदे के इरादे से की गई हो.
नियम तोड़ने पर क्या हो सकता है?
चुनाव आयोग आचार संहिता के उल्लंघन को गंभीरता से लेता है. दोषी पाए जाने पर उम्मीदवार की उम्मीदवारी रद्द की जा सकती है, उस पर एफआईआर दर्ज हो सकती है और गंभीर मामलों में जेल तक भेजा जा सकता है. यहां तक कि पार्टी के खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है.
लोकतंत्र की गरिमा का सवाल
चुनाव केवल सत्ता पाने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा हैं. आचार संहिता का उद्देश्य यही है कि सभी राजनीतिक दल और उम्मीदवार बराबरी के आधार पर चुनाव लड़ें और मतदाता किसी दबाव या लालच के बिना अपनी स्वतंत्र राय से मतदान कर सकें. ऐसे में यह हम सबकी जिम्मेदारी है कि नियमों का पालन करें, चाहे हम नेता हों या आम नागरिक.
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