China In Indian Ocean: चीन ने जिबूती में अपने सैन्य अड्डे को बड़े स्तर पर अपग्रेड किया है. इसमें सर्विलांस के लिए इस्तेमाल होने वाले कई कम्युनिकेशन सिस्टम लगाए गए हैं. इस अपग्रेडेशन के बाद चीन की सिग्नल इंटेलिजेंस जुटाने की क्षमता बढ़ने की संभावना जताई जा रही है. इससे चीनी सेना जिबूती के साथ-साथ मध्य पूर्व में होने वाली विदेशी सैन्य गतिविधियों पर भी नजर रख सकती है.
मध्य पूर्व रणनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद अहम क्षेत्र है. ऐसे में चीन यहां होने वाली गतिविधियों की जानकारी जुटाकर अपने हितों को मजबूत करना चाहता है. जिबूती में मौजूद अपने अड्डे से चीन लाल सागर से लेकर स्वेज नहर तक समुद्री गतिविधियों पर नजर रख सकता है. इसके अलावा अरब सागर और फारस की खाड़ी तक भी निगरानी की क्षमता बढ़ सकती है.
जिबूती में चीन के सैन्य अड्डे का अपग्रेडेशन अहम क्यों?
सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज यानी सीएसआईएस के मुताबिक, चीन का सैन्य अड्डा अमेरिका, फ्रांस, इटली और जापान के सैन्य ठिकानों से करीब 16 किलोमीटर के दायरे में है. यह काफी असामान्य स्थिति है, क्योंकि इतने कम इलाके में कई देशों की सेनाएं एक-दूसरे के इतने करीब काम कर रही हैं.
चीन ने 2017 में जिबूती में अपने सैन्य अड्डे की शुरुआत की थी. उस समय इसे नौसैनिक सुरक्षा, शांतिरक्षा और मानवीय अभियानों के लिए सहायक अड्डे के तौर पर बताया गया था. इसके बाद से यह अदन की खाड़ी और लाल सागर में चीन के नौसैनिक अभियानों का एक अहम केंद्र बन गया है.
अमेरिका और जापान की गतिविधियों पर रख सकता है नजर
चीन की बढ़ी हुई निगरानी क्षमता को अमेरिका के लिए खास तौर पर अहम माना जा रहा है. अमेरिका जिबूती के बेली एयरफील्ड से पूर्वी अफ्रीका में सशस्त्र खुफिया, निगरानी और टोही मिशनों के लिए ड्रोन संचालित करता है. ऐसे में चीन के नए कम्युनिकेशन सिस्टम से अमेरिकी सैन्य गतिविधियों की जानकारी जुटाने की क्षमता बढ़ सकती है.
जापान भी जिबूती में अपने सैन्य अड्डे का इस्तेमाल करता है. जापानी सेना यहां से समुद्री डकैती विरोधी अभियानों और मध्य पूर्व से जुड़ी जानकारी जुटाने के लिए P-1 समुद्री गश्ती विमान उड़ाती है. ऐसे में चीन की निगरानी क्षमता बढ़ने से जापान की गतिविधियां भी उसकी नजर में आ सकती हैं.
चीन ने जिबूती सैन्य अड्डे को कैसे किया अपग्रेड?
सीएसआईएस ने गुरुवार को सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण के आधार पर बताया कि 2024 के मध्य से चीनी सैन्य अड्डे पर दो नए कम्युनिकेशन कंपाउंड बनाए गए हैं. बड़े परिसर में करीब 30 मीटर ऊंचे तीन हाई-फ्रीक्वेंसी यानी HF एंटीना, दो VHF/UHF एंटीना और तीन सैटेलाइट डिश लगाए गए हैं.
इसके अलावा वहां चार संभावित 5G एरे और एक अज्ञात सिस्टम को ढकने वाली रेडोम संरचना भी दिखाई देती है. छोटे परिसर में दो और HF एंटीना के साथ एक दूसरा रेडोम मौजूद है.
चीन क्या पता लगा सकता है?
सीएसआईएस के मुताबिक, रेडियो उपकरण आसपास मौजूद सिग्नल को पकड़कर यह पता लगाने में मदद कर सकते हैं कि वे किस दिशा से आ रहे हैं. वहीं, सैटेलाइट डिश के जरिए सैटेलाइट से आने वाले डाउनलिंक को इंटरसेप्ट किया जा सकता है.
हालांकि, अभी इस बात की पुष्टि नहीं हुई है कि इन उपकरणों से वास्तव में किसी सिग्नल को हासिल किया गया है. साथ ही, यह भी जरूरी नहीं कि वहां लगाए गए सभी सिस्टम खुफिया जानकारी जुटाने के लिए ही इस्तेमाल हों. सीएसआईएस के अनुसार, किसी एक रेडोम में मौसम से जुड़ा रडार हो सकता है, जबकि संभावित 5G सिस्टम के जरिए डेटा जुटाए जाने की संभावना कम मानी जा रही है.
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