आर्मेनिया की राजधानी येरेवान में 28 मई को आयोजित सैन्य परेड ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खासा ध्यान आकर्षित किया. 2016 के बाद पहली बार देश ने भारी हथियारों और आधुनिक सैन्य प्रणालियों के साथ बड़े पैमाने पर शक्ति प्रदर्शन किया. यह आयोजन ऐसे समय में हुआ जब देश में संसदीय चुनाव नजदीक हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं.
इस परेड की एक बड़ी खासियत भारतीय रक्षा प्रणालियों की मौजूदगी रही, जिसने भारत और आर्मेनिया के बढ़ते रक्षा सहयोग को दुनिया के सामने उजागर किया.
परेड में दिखीं भारत में विकसित आधुनिक सैन्य प्रणालियां
येरेवान के केंद्रीय चौक से गुजरते सैन्य काफिले में भारत में निर्मित कई अत्याधुनिक हथियार और रक्षा उपकरण शामिल थे. इससे साफ संकेत मिला कि आर्मेनिया अब अपनी रक्षा जरूरतों के लिए भारत पर पहले से अधिक भरोसा कर रहा है.
आकाश वायु रक्षा प्रणाली
आकाश एक मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली है. इसे भारत में विकसित किया गया है और इसका उद्देश्य दुश्मन के हवाई खतरों से सुरक्षा प्रदान करना है.
एटीएजीएस 155 मिमी तोप
यह भारत की प्रमुख स्वदेशी तोप परियोजनाओं में से एक है. आधुनिक तकनीक से लैस यह तोप लंबी दूरी तक सटीक मार करने और तेजी से तैनात होने की क्षमता रखती है.
पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर
पिनाका प्रणाली एक साथ कई रॉकेट दागने में सक्षम है. यह दुश्मन के ठिकानों पर तेज और प्रभावी हमले के लिए जानी जाती है.
स्वाति हथियार लोकेटिंग रडार
यह रडार दुश्मन की ओर से दागे गए तोप के गोले, रॉकेट और मोर्टार की दिशा का पता लगाने में मदद करता है, जिससे जवाबी कार्रवाई अधिक प्रभावी बनती है.
एएलएस-50 लॉइटरिंग म्यूनिशन
इसे आम भाषा में आत्मघाती ड्रोन भी कहा जाता है. यह लक्ष्य मिलने तक हवा में मंडराता रहता है और सही अवसर मिलने पर सटीक हमला कर सकता है.
भारत से हथियार खरीदने की ओर क्यों बढ़ा आर्मेनिया?
कई दशकों तक आर्मेनिया की रक्षा व्यवस्था मुख्य रूप से रूसी हथियारों पर निर्भर रही. लेकिन 2020 में नागोर्नो-काराबाख संघर्ष के दौरान सामने आई चुनौतियों ने उसकी सैन्य रणनीति को बदल दिया.
उस युद्ध में अजरबैजान द्वारा ड्रोन, मिसाइल और आधुनिक तोपखाने के व्यापक उपयोग ने आर्मेनिया की वायु रक्षा और निगरानी प्रणाली की कमजोरियों को उजागर कर दिया. इसके बाद देश ने अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने के लिए नए विकल्प तलाशने शुरू किए, जिसमें भारतीय प्रणालियां महत्वपूर्ण साबित हुईं.
रूस और आर्मेनिया के रिश्तों में क्यों आई खटास?
आर्मेनिया लंबे समय से रूस का करीबी सहयोगी रहा है और रूस के नेतृत्व वाले आर्थिक समूहों का सदस्य भी है. देश में रूसी सैन्य ठिकाने भी मौजूद हैं.
हालांकि प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान के नेतृत्व में आर्मेनिया ने हाल के वर्षों में यूरोपीय देशों और पश्चिमी संस्थाओं के साथ अपने संबंध मजबूत किए हैं. इस बदलती विदेश नीति को लेकर मॉस्को ने कई बार नाराजगी जाहिर की है.
रूस ने संकेत दिया है कि यदि आर्मेनिया पश्चिमी संस्थाओं के साथ और अधिक नजदीकी बढ़ाता है, तो उसे ऊर्जा और व्यापार से जुड़े लाभों में कटौती का सामना करना पड़ सकता है.
तुर्की और पाकिस्तान पर भी पड़ सकता है असर
भारत और आर्मेनिया के बीच मजबूत होते रक्षा संबंधों को क्षेत्रीय राजनीति के नजरिए से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
नागोर्नो-काराबाख संघर्ष के दौरान तुर्की ने अजरबैजान को सैन्य समर्थन दिया था, जबकि पाकिस्तान ने भी खुलकर अजरबैजान का पक्ष लिया था. ऐसे में कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत और आर्मेनिया की बढ़ती रक्षा साझेदारी क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में नई भूमिका निभा सकती है.
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