राजनीतिक दलों को महिलाओं की सुरक्षा से छूट? जानिए POSH एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

POSH Act: भारत में कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाला POSH एक्ट अब देश के सबसे प्रभावशाली संस्थानों, राजनीतिक दलों पर लागू नहीं होगा. सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम याचिका को खारिज करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि राजनीतिक दलों को "कार्यस्थल" की परिभाषा में शामिल नहीं किया जा सकता.

Are political parties exempted from women  safety Supreme Court decision regarding POSH Act
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POSH Act: भारत में कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाला POSH एक्ट अब देश के सबसे प्रभावशाली संस्थानों, राजनीतिक दलों पर लागू नहीं होगा. सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम याचिका को खारिज करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि राजनीतिक दलों को "कार्यस्थल" की परिभाषा में शामिल नहीं किया जा सकता. यह फैसला जहां एक ओर कानूनी व्याख्या पर आधारित है, वहीं दूसरी ओर यह उन महिलाओं के लिए निराशाजनक साबित हुआ है जो राजनीतिक क्षेत्र में यौन उत्पीड़न जैसी गंभीर समस्याओं का सामना कर रही हैं.

सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की पीठ (चीफ जस्टिस बी.आर. गवई, जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस अतुल चंदुरकर) ने सोमवार को कहा कि राजनीतिक दल और उनके कार्यकर्ता "नियोक्ता और कर्मचारी" के पारंपरिक रिश्ते में नहीं आते, इसलिए उन पर POSH कानून लागू नहीं किया जा सकता. इससे पहले केरल हाई कोर्ट ने मार्च 2022 में भी यही कहा था, और सुप्रीम कोर्ट ने उसी निर्णय को बरकरार रखते हुए याचिका को खारिज कर दिया.

क्या POSH एक्ट अब सीमित हो गया है?

POSH एक्ट 2013 को सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक "विशाखा बनाम राजस्थान राज्य" केस के बाद लागू किया गया था, ताकि हर महिला को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से सुरक्षा मिल सके. याचिकाकर्ता का तर्क था कि "कार्यस्थल", "कर्मचारी", और "नियोक्ता" जैसी परिभाषाएं इस कानून में जानबूझकर व्यापक रखी गई थीं, ताकि फिल्म, मीडिया, राजनीति जैसे "गैर-पारंपरिक कार्यक्षेत्र" में भी महिलाएं सुरक्षित रहें.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा फैसला कानूनी व्याख्या के नाम पर सामाजिक वास्तविकताओं को नज़रअंदाज़ करता हुआ प्रतीत होता है.

राजनीतिक दलों में महिलाओं की स्थिति: हक़ या भ्रम?

राजनीति जैसे क्षेत्र में महिलाएं अक्सर बिना संविदा, बिना अधिकार, और बिना सुरक्षा के काम करती हैं. उनके पास न तो कोई तयशुदा औपचारिक तंत्र होता है शिकायत दर्ज कराने का, न ही सुरक्षा की कोई गारंटी. ऐसे में जब शीर्ष अदालत कहती है कि राजनीतिक दल “कार्यस्थल” नहीं हैं, तो क्या यह उस वास्तविकता से मुंह मोड़ना नहीं है, जिसमें महिलाएं पूरी मेहनत से सक्रिय राजनीति का हिस्सा बन रही हैं?

संविधान की भावना के खिलाफ?

याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (लिंग के आधार पर भेदभाव निषेध), अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यवसाय/कार्य करने की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) का उल्लंघन है. महिलाओं के अधिकारों की बात करने वाली राजनीति अगर खुद अपने भीतर सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाती, तो यह एक गंभीर नैतिक विरोधाभास बन जाता है.

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