Hormuz Oil tanker Blast: होर्मुज जलडमरूमध्य में एक तेल टैंकर के धमाके ने दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान की ओर से तय किए गए नेविगेशन रूट से हटने के बाद एक तेल टैंकर समुद्र में बिछी नेवल माइंस से टकरा गया, जिसके बाद उसमें विस्फोट हो गया.
ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह टैंकर ईरान के बताए रास्ते का पालन नहीं कर रहा था. हालांकि, अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि टैंकर किस देश का था और वह किस जगह के लिए तेल लेकर जा रहा था. इस घटना के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य अब कितना सुरक्षित है.
समुद्र में कैसे बिछाई गई माइंस?
रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए समुद्र के अंदर माइंस बिछा दी थीं. ये माइंस समुद्र में छिपी रहती हैं और जब कोई जहाज उनसे टकराता है तो उनमें विस्फोट हो जाता है. ईरान ने पहले ही चेतावनी दी थी कि अगर कोई जहाज उसके बताए रास्ते से हटकर आगे बढ़ता है तो इसके लिए वह खुद जिम्मेदार होगा.
क्या है सुरक्षित रास्ता?
अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष विराम की बात हुई थी, जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य से माइंस हटाने का मुद्दा भी शामिल था. लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक, माइंस अभी तक पूरी तरह नहीं हटाई गई हैं.
माना जा रहा है कि अब ईरान उन्हीं जहाजों को सुरक्षित रास्ते से गुजरने की अनुमति दे रहा है, जो उसे एक तरह का शुल्क देते हैं. इसके बदले में जहाजों को सुरक्षित मार्ग बताया जाता है. लेकिन इस घटना के बाद यह सवाल उठ रहा है कि अगर कोई जहाज इस बताए गए रास्ते से बाहर जाता है तो उसके लिए खतरा बढ़ सकता है.
ईरान को शुल्क देने में क्यों है परेशानी?
कई देशों के लिए ईरान को शुल्क देना आसान नहीं है. इसकी वजह अमेरिका की चेतावनी है. अमेरिका ने कहा है कि जो जहाज ईरान को पैसा देंगे, उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है. इसी डर के कारण कई देश ईरान को भुगतान करने से बच रहे हैं. माना जा रहा है कि इसी वजह से कुछ जहाज बिना शुल्क दिए होर्मुज पार करने की कोशिश कर रहे हैं.
बढ़ा तेल-गैस सप्लाई पर खतरा
इस घटना ने एक बार फिर दिखा दिया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरना अब पहले से ज्यादा जोखिम भरा हो गया है. दुनिया के बड़े हिस्से की तेल और गैस सप्लाई इसी रास्ते से होती है. अगर यहां तनाव बढ़ता है तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार और ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ सकता है.
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