पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार को हिला दिया है. 28 फरवरी से इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष ने तेल सप्लाई को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है. ऐसे हालात में भारत जैसे देश के लिए जोखिम और भी बड़ा हो जाता है, क्योंकि देश अपनी लगभग 88 प्रतिशत तेल जरूरत आयात के जरिए पूरा करता है.
हर बार जब वैश्विक स्तर पर तेल सप्लाई प्रभावित होती है, तो भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों और उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ जाती है. लेकिन इस बार भारत सरकार की रणनीति और रिफाइनरियों की तैयारी ने देश को बड़े संकट से बचा लिया.
होर्मुज जलडमरूमध्य पर असर
ईरान और ओमान के बीच स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है. वैश्विक स्तर पर करीब 20 प्रतिशत तेल इसी रास्ते से गुजरता है.
मार्च की शुरुआत से ही इस मार्ग पर जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई, जिससे खाड़ी देशों से तेल की सप्लाई पर बड़ा असर पड़ा. इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत जैसे प्रमुख सप्लायर देशों से भारत आने वाले कच्चे तेल में भारी गिरावट दर्ज की गई.
डेटा के अनुसार, मार्च में इराक से आयात करीब 69 प्रतिशत और यूएई से लगभग 73 प्रतिशत तक गिर गया. वहीं सऊदी अरब और कुवैत से आने वाली सप्लाई भी लगभग आधी रह गई.
रूस से आयात में रिकॉर्ड बढ़ोतरी
इस चुनौतीपूर्ण समय में भारत ने तेजी से अपनी रणनीति बदली और रूस की ओर रुख किया. पश्चिम एशिया से कम हो रही सप्लाई की भरपाई के लिए रूस से तेल आयात में बड़ा इजाफा किया गया.
1 से 25 मार्च के बीच रूस से आने वाला तेल 82 प्रतिशत से ज्यादा बढ़कर करीब 1.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया. फरवरी में जहां भारत के कुल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत थी, वहीं अब यह बढ़कर 45 प्रतिशत से ज्यादा हो गई है.
भारतीय रिफाइनरियों ने दूरदर्शिता दिखाते हुए अप्रैल तक की जरूरत के लिए करीब 60 मिलियन बैरल रूसी तेल पहले ही खरीद लिया है. यही वजह है कि वैश्विक संकट के बावजूद देश में तेल उत्पादन और सप्लाई पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा.
कूटनीति में भी भारत की बड़ी जीत
इस पूरे घटनाक्रम में भारत ने कूटनीतिक स्तर पर भी मजबूती दिखाई है. पहले अमेरिका भारत पर रूस से तेल न खरीदने का दबाव बना रहा था, लेकिन हालात बदलने के बाद उसका रुख भी बदल गया.
होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावट और वैश्विक तेल कीमतों के बढ़ने के खतरे को देखते हुए अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने की विशेष छूट दे दी. यह दिखाता है कि भारत अब अपनी ऊर्जा जरूरतों के मामले में स्वतंत्र फैसले लेने की स्थिति में है.
क्या पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ेंगी?
मौजूदा हालात में आम लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पेट्रोल और डीजल महंगा होगा. फिलहाल राहत की बात यह है कि भारत का घरेलू सिस्टम मजबूत बना हुआ है.
हालांकि जनवरी-फरवरी के मुकाबले कुल आयात में करीब 8 लाख बैरल प्रतिदिन की कमी आई है, लेकिन भारतीय तेल कंपनियों ने अपने सुरक्षित भंडार का सही इस्तेमाल किया है. इससे रिफाइनरियों का काम बिना रुकावट जारी है.
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का ऊर्जा सिस्टम काफी लचीला है और फिलहाल देश में ईंधन की कोई कमी या बड़ा संकट नहीं है.
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