न्यूयॉर्क/नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र (UN) की स्थापना के 80 वर्ष पूरे होने पर भारत ने दुनिया को साफ संदेश दिया है, "सब कुछ ठीक नहीं है". विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने न्यूयॉर्क में आयोजित विशेष कार्यक्रम में कहा कि संयुक्त राष्ट्र अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों को निभाने में असफल साबित हो रहा है. उन्होंने कहा कि वर्तमान वैश्विक हालात, बढ़ते संघर्ष, अविश्वास, आतंकवाद और असमानताओं के बीच शांति की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र उस भूमिका को निभाने में विफल रहा है जिसके लिए उसकी स्थापना की गई थी.
जयशंकर ने अपनी बात की शुरुआत स्पष्ट शब्दों में की, "All is not well with the UN," यानी "संयुक्त राष्ट्र में सबकुछ ठीक नहीं है."
उन्होंने कहा कि वैश्विक संस्थानों में लिए जा रहे निर्णय अब ध्रुवीकृत (polarised) हो चुके हैं और वे दुनिया की वास्तविक आवश्यकताओं या भू-राजनीतिक संतुलन को नहीं दर्शाते. विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि अगर संयुक्त राष्ट्र को प्रासंगिक बने रहना है, तो उसे जल्द ही गंभीर सुधारों (structural reforms) की दिशा में कदम उठाने होंगे.
आतंकवाद पर वैश्विक पाखंड पर भारत का प्रहार
भारत लंबे समय से आतंकवाद के मुद्दे पर दोहरे मानदंडों की आलोचना करता रहा है. जयशंकर ने कहा कि दुनिया में अब भी ऐसे देश हैं जो आतंकवाद के पीड़ितों और अपराधियों को एक समान मानते हैं, जबकि ऐसा करना अंतरराष्ट्रीय शांति के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात है.
Speaking at the UN@80 celebrations New Delhi.
— Dr. S. Jaishankar (@DrSJaishankar) October 24, 2025
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उन्होंने तीखे शब्दों में कहा, "जब आत्मघोषित आतंकवादियों को प्रतिबंधित करने की प्रक्रिया से बचाया जाता है, तो यह सवाल उठता है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में ईमानदारी कहां है?"
यह टिप्पणी साफ तौर पर चीन और पाकिस्तान की ओर इशारा करती थी. बीते वर्षों में चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों- जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के सरगनाओं पर प्रतिबंध लगाने वाले प्रस्तावों को बार-बार तकनीकी कारणों से रोक दिया था. भारत का कहना है कि यह रवैया न केवल अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता को भी कमजोर करता है.
पहलगाम आतंकी हमले का संदर्भ
जयशंकर ने अपने संबोधन में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम आतंकी हमले का जिक्र करते हुए कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सुरक्षा परिषद के कुछ स्थायी सदस्य खुले तौर पर ऐसे संगठनों का बचाव करते हैं जो इन हमलों की जिम्मेदारी लेते हैं.
उनका इशारा फिर से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी समूहों की ओर था, जिन्हें कुछ देशों से अप्रत्यक्ष समर्थन या संरक्षण मिलता है. जयशंकर ने कहा कि अगर विश्व शांति के मंच पर बैठे देश ही आतंकवाद पर दोहरा रवैया अपनाएंगे, तो वैश्विक सुरक्षा का पूरा ढांचा कमजोर पड़ जाएगा.
सुरक्षा परिषद के ढांचे में सुधार की मांग
विदेश मंत्री ने कहा कि आज भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना 1945 की विश्व व्यवस्था पर आधारित है, जबकि दुनिया अब पूरी तरह बदल चुकी है. उन्होंने कहा कि अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और भारत जैसे क्षेत्रों को अब भी स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं मिला है, जबकि वैश्विक अर्थव्यवस्था, जनसंख्या और रणनीतिक संतुलन में इन क्षेत्रों की भूमिका लगातार बढ़ रही है.
जयशंकर ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के अंदर सुधार की प्रक्रिया को जानबूझकर रोका जा रहा है, और इस संगठन का इस्तेमाल ही उस सुधार को टालने के लिए किया जा रहा है. उन्होंने कहा, "अगर संयुक्त राष्ट्र को 21वीं सदी में प्रासंगिक रहना है, तो उसे दुनिया की आज की हकीकत को स्वीकार करना होगा, न कि 80 साल पुरानी ताकतों की सोच को."
पश्चिमी देशों की नीति पर अप्रत्यक्ष आलोचना
जयशंकर ने अपने भाषण में अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों का नाम लिए बिना कहा कि कई बार “वैश्विक निर्णय वास्तविक आवश्यकताओं के बजाय राजनीतिक हितों पर आधारित होते हैं.” उन्होंने यह भी जोड़ा कि जो देश खुद को “लोकतंत्र और मानवाधिकारों के संरक्षक” बताते हैं, वे अक्सर उन मूल्यों को भूल जाते हैं जब मामला उनके रणनीतिक साझेदारों से जुड़ा होता है.
भारत की ओर से यह बयान इस बात का संकेत है कि नई दिल्ली अब किसी भी अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर केवल “राजनयिक शालीनता” तक सीमित नहीं रहना चाहती. वह सीधे और सशक्त रूप से अपनी स्थिति रख रही है.
वैश्विक दक्षिण की आवाज को शामिल करने की जरूरत
जयशंकर ने कहा कि भारत संयुक्त राष्ट्र का हमेशा समर्थक रहा है, लेकिन अब यह संगठन विकासशील देशों की आवाज को भी समान महत्व दे. उन्होंने कहा कि “Global South” यानी एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को नजरअंदाज करके वैश्विक शांति और आर्थिक स्थिरता की बात करना व्यर्थ है.
उनके अनुसार, “भारत ने हमेशा एक समावेशी, न्यायपूर्ण और पारदर्शी बहुपक्षीय व्यवस्था का समर्थन किया है. अगर संयुक्त राष्ट्र को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखनी है, तो उसे समान प्रतिनिधित्व, निष्पक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी.”
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