होर्मुज के बाद अब बाब-अल-मंदेब... दो बड़े समुद्री रास्तों पर संकट, हूतियों ने बढ़ाई दुनिया की टेंशन

पश्चिम एशिया में चल रही जंग का असर अब सिर्फ तेल की सप्लाई तक सीमित नहीं रह गया है. दुनिया के दो बड़े समुद्री रास्तों पर एक साथ संकट खड़ा हो गया है.

After Hormuz now Bab-el-Mandeb crisis over two major maritime routes
प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

Bab-el-Mandeb: पश्चिम एशिया में चल रही जंग का असर अब सिर्फ तेल की सप्लाई तक सीमित नहीं रह गया है. दुनिया के दो बड़े समुद्री रास्तों पर एक साथ संकट खड़ा हो गया है. ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के कारण होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही काफी घट गई है. 10 सितंबर को यहां से सिर्फ 7 जहाज गुजरे, जबकि युद्ध से पहले हर दिन करीब 125 कमर्शियल जहाज इस रास्ते का इस्तेमाल करते थे. दूसरी तरफ यमन के हूती लड़ाकों ने बाब-अल-मंदेब के पास अपनी पकड़ मजबूत कर ली है. हूतियों ने रणनीतिक रूप से अहम पेरिम द्वीप यानी मायून द्वीप पर कब्जा कर लिया है. यह द्वीप बाब-अल-मंदेब के बीच बेहद महत्वपूर्ण जगह पर मौजूद है और समुद्री रास्ते को दो हिस्सों में बांटता है.

मायून द्वीप पर कब्जे से बढ़ी चिंता

मायून द्वीप पर कब्जे के बाद हूतियों को बाब-अल-मंदेब के पास एक अहम रणनीतिक ठिकाना मिल गया है. इससे इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ गई है. हालांकि हूती प्रवक्ता का कहना है कि सऊदी अरब को छोड़कर दूसरे देशों के जहाजों को इस स्ट्रेट से गुजरने की अनुमति है. इससे एक दिन पहले सऊदी अरब ने अमेरिका से हूती ठिकानों पर हमला करने की अपील की थी, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इससे इनकार कर दिया.

इससे पहले हूती लड़ाकों ने मोचा पोर्ट पर भी नियंत्रण हासिल किया था. उन्होंने यमन के पूरे पश्चिमी तट पर कब्जे का दावा किया है. इसके बाद हूती लड़ाके दक्षिण की ओर लहज प्रांत की तरफ भी आगे बढ़े हैं.

बाब-अल-मंदेब इतना जरूरी क्यों है?

बाब-अल-मंदेब लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे अरब सागर से जोड़ने वाला अहम समुद्री रास्ता है. इसकी चौड़ाई करीब 32 किलोमीटर है. एशिया से यूरोप जाने वाले जहाजों के लिए यह रास्ता बेहद महत्वपूर्ण है. इसी के जरिए जहाज लाल सागर में पहुंचते हैं और फिर मिस्र की स्वेज नहर से होकर भूमध्य सागर तक जाते हैं. इस वजह से इसे एशिया और यूरोप के समुद्री व्यापार का एक प्रमुख गेटवे माना जाता है.

दुनिया का करीब 10 से 12 फीसदी व्यापार और लगभग 30 फीसदी कंटेनर ट्रैफिक इस कॉरिडोर से गुजरता है. Kpler के जून 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, बाब-अल-मंदेब से हर दिन करीब 74 लाख बैरल पेट्रोलियम प्रोडक्ट गुजरे. यह दुनिया के कुल तेल उत्पादन का करीब 7 फीसदी है. अमेरिकी एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन यानी EIA के मुताबिक, 2026 की दूसरी तिमाही में इस रास्ते से कुल ऑयल फ्लो करीब 81 लाख बैरल प्रतिदिन रहा. इसमें करीब 61 लाख बैरल कच्चा तेल और 20 लाख बैरल पेट्रोलियम प्रोडक्ट शामिल थे.

दोनों समुद्री रास्ते बंद हुए तो क्या होगा?

सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर होर्मुज और बाब-अल-मंदेब दोनों लंबे समय तक असुरक्षित या बंद रहे, तो दुनिया की करीब एक-चौथाई तेल और गैस सप्लाई प्रभावित हो सकती है. ऐसी स्थिति में एशिया और यूरोप के बीच चलने वाले जहाजों को स्वेज नहर के बजाय अफ्रीका के दक्षिणी छोर यानी केप ऑफ गुड होप के रास्ते जाना पड़ेगा.

इससे एक यात्रा में करीब 10 से 14 दिन अतिरिक्त लग सकते हैं. जहाजों को ज्यादा ईंधन की जरूरत होगी और माल ढुलाई का खर्च भी बढ़ेगा. उदाहरण के तौर पर मुंबई से नीदरलैंड के रॉटरडैम तक जाने वाले जहाजों को पहले के मुकाबले काफी लंबा रास्ता तय करना पड़ सकता है.

इस संकट का असर तेल बाजार में भी नजर आने लगा है. 11 सितंबर को ब्रेंट क्रूड करीब 104.61 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ और पूरे सप्ताह इसकी कीमत में 8 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई. IEA ने 2026 में ग्लोबल ऑयल सप्लाई में करीब 57 लाख बैरल प्रतिदिन यानी लगभग 6 फीसदी की गिरावट का अनुमान लगाया है. वहीं सऊदी अरब का तेल उत्पादन 30 साल से ज्यादा समय के सबसे निचले स्तर, करीब 60 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया है.

भारत के लिए खतरा कितना बड़ा?

भारत के लिए यह स्थिति इसलिए ज्यादा चिंता वाली है क्योंकि देश समुद्री व्यापार और आयातित ऊर्जा पर काफी निर्भर है. यूरोप के साथ भारत के करीब 80 फीसदी माल व्यापार का सामान्य रास्ता लाल सागर से होकर जाता है. यह कारोबार हर महीने करीब 14 अरब डॉलर का है. इंजीनियरिंग सामान, दवाएं, केमिकल, टेक्सटाइल, ऑटोमोबाइल और दूसरे तैयार उत्पाद इसी समुद्री रास्ते से यूरोप पहुंचते हैं. अगर जहाजों को अफ्रीका के चक्कर लगाकर जाना पड़ा तो भारतीय कंपनियों का समय और शिपिंग खर्च दोनों बढ़ जाएंगे.

भारत के लिए दूसरी बड़ी चिंता कच्चे तेल, LNG और LPG को लेकर है. देश अपनी जरूरत का करीब 88-89 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है. सरकार के मुताबिक, भारत अपनी LPG खपत का करीब 60 फीसदी आयात करता है और इसमें लगभग 90 फीसदी आयात होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते आता रहा है.

भारत यूरोप को डीजल भी भेज रहा

इस संकट का एक और अहम पहलू यह है कि भारत इस समय यूरोप को डीजल सप्लाई करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है. अगस्त 2026 में बाब-अल-मंदेब के रास्ते यूरोप जाने वाले करीब 2 लाख बैरल प्रतिदिन डीजल में भारत की हिस्सेदारी लगभग 60 फीसदी रही. ऐसे में अगर बाब-अल-मंदेब में लंबे समय तक रुकावट आती है तो भारत के लिए परेशानी सिर्फ ऊर्जा आयात तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उसके निर्यात पर भी असर पड़ सकता है.

यानी खतरा सिर्फ दो समुद्री रास्तों तक सीमित नहीं है. होर्मुज स्ट्रेट तेल की सप्लाई के लिए बेहद अहम है, जबकि बाब-अल-मंदेब तेल, गैस, कंटेनर और भारत-यूरोप के पूरे व्यापारिक रास्ते को प्रभावित करता है. अगर दोनों रास्ते लंबे समय तक सामान्य नहीं हुए तो इसका असर पेट्रोल-डीजल, LPG, शिपिंग खर्च और आयातित सामान की कीमतों पर पड़ सकता है. आखिरकार इसका असर आम लोगों की जेब और महंगाई पर भी दिखाई दे सकता है.