Political Popcorn: राहुल गांधी विदेश रवाना, खरगे को रिजिजू की चिट्ठी... पढ़ें सत्ता के गलियारों की 5 बड़ी खबरें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संभावित कैबिनेट विस्तार को परिसीमन और महिला आरक्षण विधेयकों के लिए जरूरी बहुमत के गणित से जोड़कर देखा जा रहा है. Political Popcorn में पढ़ें देश-दुनिया की सियासत से जुड़ी 5 बड़ी खबरों का पूरा विश्लेषण.

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राहुल गांधी के अचानक वियतनाम दौरे से लेकर भाजपा के तंज तक, राजनीति में हलचल तेज है. महिला आरक्षण और परिसीमन के मुद्दे पर किरेन रिजिजू ने मल्लिकार्जुन खरगे को चिट्ठी लिखकर कांग्रेस पर सवाल उठाए हैं. वहीं, रक्षा सचिव आरके सिंह के कार्यकाल विस्तार को लेकर नौकरशाही में चर्चाएं तेज हैं. दूसरी ओर, फ्रांस, स्पेन, इटली समेत छह यूरोपीय देशों में पढ़ाई, बेरोजगारी और महंगाई के खिलाफ युवाओं का आक्रोश सड़कों पर दिखाई दे रहा है. इधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संभावित कैबिनेट विस्तार को परिसीमन और महिला आरक्षण विधेयकों के लिए जरूरी बहुमत के गणित से जोड़कर देखा जा रहा है. Political Popcorn में पढ़ें देश-दुनिया की सियासत से जुड़ी 5 बड़ी खबरों का पूरा विश्लेषण. 

1. दिल्ली में सियासी तकरार, नेताजी वियतनाम की सैर पर सवार!

एक हफ्ते के वियतनाम दौरे पर उड़े राहुल गांधी!

घरेलू सियासत में जब बयानों के तीर और सांगठनिक रस्साकशी चरम पर है, तभी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सोमवार दोपहर की फ्लाइट पकड़कर सीधे एक हफ्ते के वियतनाम दौरे पर रवाना हो गए हैं. तय कार्यक्रम के मुताबिक वे छह दिन के प्रवास के बाद ही स्वदेश लौटेंगे. अलबत्ता जब भी देश में चुनावी सरगर्मियां या सियासी पारा चढ़ता है, राहुल गांधी की अचानक विदेशी उड़ानों पर भाजपा तंज कसने का कोई मौका नहीं छोड़ती. राजनीतिक प्रेक्षक इस दौरे को उनका निजी अवकाश और रणनीतिक ब्रेक मान रहे हैं, वहीं कांग्रेस खेमा इसे स्वाभाविक यात्रा बताकर विवाद से दूर रहने की कोशिश कर रहा है. सचमुच जब-जब राजधानी में सियासी महाभारत छिड़ती है, नेताजी का यूं विदेश प्रस्थान चर्चाओं के बाजार को गर्म कर ही देता है. अब सत्ता के गलियारों में यक्ष प्रश्न यही गूंज रहा है कि छह दिन बाद जब वे लौटेंगे, तो विपक्ष के ढीले पड़े मोर्चों को नई धार दे पाएंगे या यह दौरा विरोधियों के लिए नया सियासी हथियार साबित होगा?

2. काम करने की नीयत नहीं, बस बैठकों का बहाना!

किरेन रिजिजू ने चिट्ठी लिखकर खरगे को दिखाया आईना!

​ऐतिहासिक महिला आरक्षण और महत्वपूर्ण परिसीमन जैसे बड़े राष्ट्रहित के मुद्दों पर भी कांग्रेस का टालमटोल वाला रवैया खुलकर सामने आ गया है. केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को खत लिखकर साफ आईना दिखाया कि सरकार लगातार विपक्ष के संपर्क में है और वे खुद राहुल गांधी से मिलकर रचनात्मक सहयोग की अपील कर चुके हैं. इसके बावजूद खरगे द्वारा बार-बार महज समय काटने के लिए 'सर्वदलीय बैठक' की रट लगाने पर रिजिजू ने दो-टूक कहा कि बात-बात पर ऐसी मांगें करना केवल प्रक्रिया को लटकाने का बहाना है, साथ ही सत्रावसान में देरी को गैर-संवैधानिक बताने के कांग्रेस के खोखले दावों को भी खारिज कर दिया. अलबत्ता राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि कांग्रेस की पुरानी कार्यशैली रही है कि जब भी महिलाओं के हक या बड़े सुधारों की बारी आती है, वह तकनीकी पेंच फंसाकर भागने का रास्ता तलाशने लगती है. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि सरकार ने परिपक्वता दिखाते हुए गेंद विपक्ष के पाले में डाल दी है, जिससे कांग्रेस के दोहरे मापदंड बेनकाब हो चुके हैं. सचमुच जब शीर्ष नेतृत्व व्यक्तिगत स्तर पर संवाद कर चुका हो, तब भी बैठक-बैठक का खेल खेलना सिर्फ सुर्खियों में रहने की बेतुकी कोशिश ही नजर आता है. अब देश के सामने यक्ष प्रश्न यही है कि क्या खरगे और उनकी पार्टी महिला सशक्तिकरण और सुधारों के इस बड़े कदम में देशहित के साथ खड़ी होगी या फिर आदतन केवल रोड़ा अटकाने की राजनीति ही करती रहेगी?

3. ब्यूरोक्रेसी में सेवा विस्तार की सुगबुगाहट!

31 अक्टूबर को पूरा हो रहा रक्षा सचिव का कार्यकाल.. क्या आरके सिंह तोड़ेंगे परंपरा या संजय मित्रा जैसी मिलेगी राहत?

​सत्ता गलियारों में इन दिनों सबसे बड़ा कौतूहल रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह (आरके सिंह) के सेवा विस्तार को लेकर बना हुआ है, जिनका दो साल का तय कार्यकाल आगामी 31 अक्टूबर को समाप्त हो रहा है. 30 नवंबर 2024 को पदभार संभालने वाले 1989 बैच के इस वरिष्ठ आईएएस अधिकारी को लेकर नौकरशाही के भीतर चर्चाओं का बाजार बेहद गर्म है. अलबत्ता रक्षा मंत्रालय के शीर्ष पद पर एक्सटेंशन देने की परिपाटी काफी सीमित और अपवाद स्वरूप ही रही है, हालांकि जानकार पूर्व रक्षा सचिव संजय मित्रा को मिले तीन महीने के विस्तार की मिसाल जरूर याद दिला रहे हैं. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि मौजूदा वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, रक्षा सौदों की निरंतरता और आंतरिक सुरक्षा के संवेदनशील समीकरण आरके सिंह के पक्ष में झुक सकते हैं. सचमुच जब प्रशासनिक निरंतरता और कड़े नीतिगत फैसले तराजू के एक पलड़े पर हों तो पारंपरिक नियमों का दायरा अक्सर लचीला हो जाता है. अब रायसीना हिल्स के गलियारों में यक्ष प्रश्न यही गूंज रहा है कि क्या केंद्र सरकार परंपरा से हटकर उन्हें कार्यकाल विस्तार का तोहफा देगी?

4. यूरोप के 'फर्स्ट वर्ल्ड' में थर्ड क्लास व्यवस्था का तमाशा!

पढ़ाई, नौकरी और छत के लाले.. 6 यूरोपीय मुल्कों में सड़कों पर भड़का युवाओं का महाआक्रोश!

तथाकथित विकसित यूरोप का चकाचौंध भरा पर्दा अब पूरी तरह बेनकाब हो चुका है, जहां पढ़ाई, बेरोजगारी और आसमान छूती महंगाई को लेकर फ्रांस, स्पेन, इटली, ग्रीस, अल्बानिया और बेल्जियम की सड़कों पर छात्रों, कर्मचारियों और युवाओं का उग्र सैलाब उतर आया है. फ्रांस के 140 शहरों में 8 लाख लोग आगजनी और तोड़फोड़ पर उतर आए हैं, स्पेन में घर का किराया न भर पाने के चलते लोग सड़कों पर टेंट लगाकर डेरा डाले हैं, तो वहीं इटली में छात्रों ने स्कूलों पर कब्जे कर लिए हैं, ग्रीस में 96% युवाओं को हॉस्टल नसीब नहीं है, अल्बानिया में पीएम के इस्तीफे की मांग तेज है और बेल्जियम में शिक्षा बजट कटने पर हिंसक झड़पें हो रही हैं. अलबत्ता, दुनिया भर को बेहतर जीवन स्तर का ज्ञान बांटने वाली इन पश्चिमी सरकारों की सांसें अपनी ही जनता के आक्रोश के आगे फूलती नजर आ रही हैं. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि अंधाधुंध महंगाई और सरकारी सेवाओं में कटौती की नीति का यह स्वाभाविक व विस्फोटक नतीजा है. सचमुच, जब उच्च शिक्षा के बावजूद युवा छत और रोटी के लिए मोहताज हो जाएं, तो व्यवस्था की कलई खुलना तय है. अब वैश्विक पटल पर यक्ष प्रश्न यही गूंज रहा है कि दूसरों को नसीहतें देने वाले ये यूरोपीय हुक्मरान क्या अपने ही नौजवानों के गुस्से की आग बुझा पाएंगे या यह असंतोष पूरे महाद्वीप की सत्ता को हिलाकर रख देगा?

5. पहले परिसीमन का नंबर गेम, फिर बंटेगी लाल बत्ती!

मंत्रिमंडल फेरबदल की चाबी और दो-तिहाई बहुमत की दरकार!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में लंबे समय से प्रतीक्षित फेरबदल अब परिसीमन और महिला आरक्षण कानून में संशोधन जैसे विधेयकों को संसद से पास कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत जुटाने के गणित से सीधा जुड़ चुका है. सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि इस ऐतिहासिक विधायी आंकड़े को साधने के लिए ही कैबिनेट विस्तार को रणनीतिक औजार बनाया जा रहा है, जहां तमिलनाडु के नए समीकरणों के बीच डीएमके के 22 सांसदों के दम पर उसे चार मंत्री पद देने, तृणमूल से टूटकर बनी एनसीपीआई के सांसदों के भाजपा में विलय या समर्थन के एवज में तीन पद, 13 सांसदों वाली शिंदे गुट की शिवसेना से श्रीकांत शिंदे समेत दो नए चेहरे शामिल करने और जदयू द्वारा संजय झा के लिए एक मंत्री पद मांगने जैसे समीकरणों से सहयोगियों की मांग ही कम से कम 10 लाल बत्ती तक पहुंच गई है. अलबत्ता, शीर्ष नेतृत्व के सामने सबसे बड़ा सिरदर्द यह है कि परिसीमन बिल से पहले अगर कैबिनेट का ताला खुला तो जितने संतुष्ट होंगे उससे ज्यादा नाराज हो जाएंगे, और सरकार इस वक्त किसी भी सांसद की नाराजगी झेलने की स्थिति में नहीं दिखती. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि शरद पवार की पार्टी में हलचल से लेकर क्षेत्रीय दलों को साधने की यह पूरी कवायद संविधान संशोधन को सुरक्षित पार लगाने की पूर्व-तैयारी है. सचमुच, जब विधायी मजबूरी और सहयोगी दलों की भारी-भरकम महत्वाकांक्षाएं आमने-सामने टकराती हैं, तो कुर्सियां बांटना तलवार की धार पर चलने जैसा जोखिम बन जाता है!

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