Political Popcorn: कहीं कॉफी से पक रही चुनावी खिचड़ी, तो कहीं स्टिंग से मची रार! सियासत के 5 चटपटे किस्से

Political Popcorn: कॉफी डिप्लोमेसी से लेकर कोर्टरूम की कहानी तक, कांग्रेस में स्टिंग विवाद और राहुल गांधी की रैली को लेकर सियासी हलचल तेज है. वहीं, विपक्षी रैली में शामिल होने के मुद्दे पर CJP के भीतर भी मतभेद सामने आए हैं.

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Political Popcorn

1.कॉफी की चुस्की और समाजवादी जोश !

वार रूम में कैफीन का तड़का, चुनावी रणनीति हुई कड़क !

समाजवादी पार्टी के दफ्तर में बने चुनावी वार रूम की हवा इन दिनों कुछ ज्यादा ही महक रही है, जिसका सेहरा फिरोजाबाद सांसद अक्षय यादव के सिर बंध रहा है. उन्होंने कार्यकर्ताओं की सुस्ती भगाने के लिए तरह-तरह की वैरायटी वाली कॉफी का ऐसा बंदोबस्त किया है कि हर कोई पूरे जोश में नजर आ रहा है. अलबत्ता यूपी विधान परिषद और आने वाले विधानसभा चुनावों की बिसात पर मोहरे सजाते हुए यह 'कॉफी डिप्लोमेसी' चर्चा का विषय बनी हुई है. राजनीतिक प्रेक्षक चुटकी लेते हुए कह रहे हैं कि चुनावी चक्रव्यूह भेदने के लिए जब नीतियां कम पड़ने लगें तो तेज कैफीन का सहारा वाकई काम आता है. सचमुच जब नेताजी खुद अपने हाथों से दूसरों के कप में गर्म ब्रू परोस रहे हों तो कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ना लाजिमी है. अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि कप में उफनता यह झाग मतदान के दिन वोटों में तब्दील होगा या सिर्फ वार रूम की मेजों तक ही सिमट कर रह जाएगा?

2.अदालत के अखाड़े से पर्दे के उजाले तक !

सरकारी वकील की कहानी, सिनेमाई पर्दे पर भारी भरकम जुबानी !

26/11 मुंबई आतंकी हमले के ट्रायल में कसाब को फंदे तक पहुंचाने वाले प्रख्यात विशेष लोक अभियोजक और भाजपा के राज्यसभा सांसद उज्ज्वल निकम अब बड़े पर्दे के नायक बन चुके हैं. उनकी अदालती जद्दोजहद पर बनी फिल्म 'प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम' की दिल्ली के ओडियन सिनेमा में खास स्क्रीनिंग रखी गई, जिसे उनके वकील और भाजपा प्रवक्ता बेटे अनिकेत निकम ने आयोजित किया. सचमुच पर्दे पर राजकुमार राव जब निकम साहब के किरदार में उतरे तो हर किसी की निगाहें स्क्रीन पर टिक गईं. अलबत्ता चर्चा तो यह भी गर्म है कि संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में सांसदों के लिए भी एक स्पेशल शो की तैयारी चल रही है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे कानूनी साख और सियासी रसूख के बेहतरीन कॉकटेल के तौर पर देख रहे हैं. ऐसे में यक्ष प्रश्न यही उठता है कि क्या सदन के माननीय इस कानूनी दांव-पेंच वाली थ्रिलर से कुछ अदालती अनुशासन का सबक सीख पाएंगे?

3.स्टिंग की सुई और कर्नाटक की रार !

जब अपनों के ही जाल में उलझने लगे सरकार के सूरमा !

कर्नाटक कांग्रेस में इन दिनों बाहर से ज्यादा अंदरूनी हवाएं आंधी बनी हुई हैं. पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से जुड़े कथित स्टिंग ऑपरेशन के फेर में पार्टी की ही प्रवक्ता कृपा अल्वा पर क्राइम ब्रांच का शिकंजा कस गया है. सिद्धारमैया के बेटे यतींद्र का दावा है कि प Puttur सीट से विधानसभा टिकट की चाहत में यह पूरा ताना-बाना बुना गया था. अलबत्ता विपक्ष के नेता एचडी कुमारस्वामी चुटकी लेते हुए कह रहे हैं कि डीके शिवकुमार और आलाकमान पहले से जानते थे कि पर्दे के पीछे कौन सी खिचड़ी पक रही है. राजनीतिक प्रेक्षक इस उठापटक को कांग्रेस की पुरानी गुटबाजी का ताजातरीन एपिसोड करार दे रहे हैं. सचमुच जब अपने ही घर के चिराग से दालान में धुआं उठने लगे तो बचाव करना टेढ़ी खीर हो जाता है. अब सत्ता के गलियारों में यक्ष प्रश्न यही गूंज रहा है कि यह स्टिंग केवल टिकट की निजी जंग थी या फिर कुर्सी की पुरानी रंजिश का कोई नया अध्याय?

4.सोनिया की 'धीमी आंच' पर राहुल की 'तेज धूप' !

त्योहार का ब्रेक बनाम चुनावी जंग की आग !
 
दिल्ली के सियासी गलियारों में इन दिनों यह चर्चा जोरों पर है कि क्या सोनिया गांधी ने सचमुच राहुल को दिवाली से पहले दिल्ली में रैली न करने की सलाह दी थी, क्योंकि 13 अक्टूबर की चाय पार्टी में त्योहारी मौसम के मद्देनजर प्रदर्शन टालने पर सहमति बनी थी,लेकिन राहुल गांधी ने तमाम ठहराव और नसीहतों को दरकिनार करते हुए 1 नवंबर को रामलीला मैदान में रैली करने की ठान ली. विरोधी खेमा इसे संगठन और नीतियों की 'बोरिंग राजनीति' से भागकर 'थ्रिल' खोजने वाली राहुल की सियासी हठ बता रहा है, अलबत्ता राहुल समर्थकों का तर्क है कि यदि एक महीने का ब्रेक लिया गया तो सरकार न्यूज साइकिल बदल देगी और मतदाता सूची की गड़बड़ियों पर बना सियासी दबाव ठंडा पड़ जाएगा. सचमुच 10, जनपथ की सधी हुई समझदारी और राहुल के बेचैन आक्रामक मिजाज के बीच की इस रार को देख राजनीतिक प्रेक्षक इसे एक बड़ा सियासी दांव मान रहे हैं, लेकिन यक्ष प्रश्न यही बना हुआ है कि त्योहारों के खुमार में डूबी जनता के बीच राहुल की यह हठ विपक्ष को मजबूती देगी या यह महज एक शोर बनकर रह जाएगी !

5.मंच की भूख या साख की फिक्र?

1 नवंबर की रैली पर CJP में दोफाड़ ..अपनी ढपली, अपना राग!

​1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में सजने जा रही विपक्षी महारैली की चौखट पर दस्तक देने से पहले ही संगठन के भीतर विचारों का ऐसा घमासान छिड़ा है कि दोफाड़ की नौबत आ गई है. अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक केजरीवाल समर्थक माने जाने वाले आशुतोष रांका ने साफ दो टूक शब्दों में विपक्ष के इस जमघट से किनारा करने की नसीहत दे डाली है,उनका सीधा तर्क है कि सियासी दलों के पुराने तंबुओं तले खड़े होने से संगठन की निष्पक्ष छवि पर कालिख पुत सकती है. अलबत्ता दूसरी तरफ खड़े सौरभ दास और अभिजीत की टोली का मानना बिल्कुल जुदा है उनका सोचना है कि सरकार की नीतियों के खिलाफ अगर बड़ा शोर मचाना है तो विपक्ष के मजबूत मंच को हाथ से जाने देना सियासी नासमझी होगी. सचमुच जब गैर-राजनीतिक होने का दावा करने वाले संगठनों की महत्वाकांक्षाएं मंचों की चकाचौंध से टकराती हैं तो ऐसे ही अंतर्विरोध बाहर छलकते हैं. राजनीतिक प्रेक्षक इसे संगठन का पहला बड़ा वैचारिक इम्तिहान मान रहे हैं लेकिन यक्ष प्रश्न यही बना हुआ है कि 1 नवंबर को रामलीला मैदान में इनकी शिरकत विपक्ष की ताकत बनेगी या अपनी ही 'अलग पहचान' के ताबूत में आखिरी कील साबित होगी?

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