Political Popcorn: टाइगर श्रॉफ पर फायरिंग से गरमाई सियासत! अमित शाह तक पहुंची बॉलीवुड की सुरक्षा की गुहार

Political Popcorn: बॉलीवुड की सुरक्षा से लेकर जम्मू-कश्मीर की ‘दरबार मूव’ परंपरा तक, डीके शिवकुमार के स्टिंग वाले बयान और दिल्ली पुलिस की चौकसी तक, जानिए सियासत के गलियारों में मचे घमासान की 5 बड़ी खबरें.

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1.एक्शन हीरो पर गोली और सियासी 'हनीमून' का अंत!

टाइगर श्रॉफ फायरिंग कांड से हिला बॉलीवुड !

​बांद्रा और जुहू के महलों से निकलकर बॉलीवुड की सुरक्षा का मुद्दा अब सीधे देश के गृह मंत्रालय की चौखट पर पहुंच चुका है. अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर हुई कथित गोलीबारी की घटना के बाद फिल्म जगत की दो सबसे बड़ी संस्थाओं ऑल इंडियन सिने वर्कर्स एसोसिएशन और फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉइज ने सीधे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को खत लिखकर केंद्र से फौरन दखल देने और फिल्मी हस्तियों को पुख्ता सुरक्षा मुहैया कराने की मांग कर दी है. अलबत्ता इस चिट्ठी ने महाराष्ट्र में कानून-व्यवस्था को लेकर विपक्ष को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर तीखे हमले बोलने का नया सियासी गोला-बारूद दे दिया है, जहां आलोचक सीधे सरकार की विफलता का ढोल पीट रहे हैं. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि भाजपा और बॉलीवुड के बीच पिछले कुछ वर्षों से चला आ रहा 'हनीमून पीरियड' अब तनाव के दौर में प्रवेश कर चुका है और चर्चा यहां तक है कि फडणवीस को हालात की सफाई देने जल्द दिल्ली तलब किया जा सकता है. सचमुच जब पर्दे के एक्शन हीरो ही असल जिंदगी में खौफ के साये में आ जाएं, तो सत्ता की पुलिसिंग पर सवाल उठना स्वाभाविक है. अब मुंबई से लेकर रायसीना हिल्स तक यक्ष प्रश्न यही तैर रहा है कि क्या केंद्र का दखल इस गैंगवार के डर को खत्म कर पाएगा और बॉलीवुड-सियासत के रिश्ते में यह अविश्वास खत्म हो जाएगा ?

2.सर्द हवाएं, सियासी फाइलें और 150 साल पुरानी रवायत!

श्रीनगर से जम्मू कूच की तैयारी में जुटा सरकारी अमला.. 200 करोड़ की बचत पर भारी पड़ी 'दरबार मूव' की परंपरा !

​कश्मीर घाटी में हल्की ठंड की दस्तक के साथ ही जम्मू-कश्मीर सरकार का पूरा प्रशासनिक कुनबा अपनी ऐतिहासिक 'दरबार मूव' की सालाना कवायद के तहत श्रीनगर से जम्मू के मैदानी इलाकों में शिफ्ट होने की तैयारियों में जुट गया है. सामान्य प्रशासन विभाग के आदेश के मुताबिक मुख्यमंत्री सचिवालय समेत कुल 41 प्रमुख दफ्तर 'पूरी तरह' और 50 अन्य विभाग 'कैंप मोड' में 30-31 अक्टूबर को श्रीनगर में कामकाज समेटकर 2 नवंबर से जम्मू में फाइलों का ताला खोलेंगे. अलबत्ता सरकारी खजाने के करीब 200 करोड़ रुपये बचाने के नाम पर पांच साल पहले जिस 150 साल पुरानी डोगरा रवायत को बंद किया गया था उसकी पिछले साल हुई वापसी ने नौकरशाही और सियासी गलियारों में बहस को दोबारा जिंदा कर दिया है. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि जम्मू और कश्मीर दोनों संभागों के बीच क्षेत्रीय और भावनात्मक संतुलन बनाए रखने के लिए सरकार को वित्तीय खर्च के मुकाबले राजनीतिक फायदे को प्राथमिकता देनी पड़ी. सचमुच जहां सियासत के तार संभागों की अस्मिता से जुड़े हों, वहां बही-खाते के नफे-नुकसान अक्सर दोयम दर्जे पर धकेल दिए जाते हैं. अब जम्मू के तवी किनारे यक्ष प्रश्न यही गूंज रहा है कि क्या दफ्तरों का यह सालाना फेरबदल जमीनी हुकूमत को जनता के करीब लाएगा या यह सिर्फ करोड़ों का प्रशासनिक तामझाम बनकर रह जाएगा?

3.पर्दे के पीछे का 'पितामह' और स्टिंग का डर!

​डीके शिवकुमार को सताया सीक्रेट कैमरों का खौफ !

​कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने अपने मंत्रियों को संभावित स्टिंग ऑपरेशनों को लेकर सतर्क रहने की नसीहत देकर राज्य की राजनीति में खलबली मचा दी है. उन्होंने दावा किया कि सत्ता संभालते ही उन्हें भी ऐसे ही एक स्टिंग का निशाना बनाने की कोशिश की गई थी और वे बखूबी जानते हैं कि इसके पीछे इसे फाइनेंस करने वाला 'पितामह' कौन है. इस बयान पर पलटवार करते हुए केंद्रीय मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने फौरन मोर्चा खोला और सवाल दागा कि अगर सीएम खुद निशाने पर थे तो वे जनता के सामने सच उजागर क्यों नहीं करते? अलबत्ता, बिना नाम लिए 'पितामह' का शिगूफा छोड़कर डीके ने पार्टी के अंदर और बाहर दोनों तरफ सनसनी फैला दी है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे कर्नाटक कांग्रेस के अंदरूनी सत्ता संघर्ष से जोड़कर देख रहे हैं. सचमुच जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे सिपहसालार ही कैमरों से डरने लगें तो दाल में कुछ काला होना लाजिमी है. अब बेंगलुरु के गलियारों में यक्ष प्रश्न यही है कि क्या इस रहस्यमयी 'पितामह' का पर्दाफाश होगा ?

4.त्योहार पर 'ब्रेक' का मरहम !

कमिश्नर का सख्त फरमान..पकने से पहले फोड़ो हर प्लानिंग!

​दिल्ली पुलिस के गलियारों में इन दिनों राहत और भारी मुस्तैदी का एक साथ अजीबोगरीब कॉकटेल देखने को मिल रहा है. पिछले 10-12 दिनों से सड़कों पर पसीना बहा रहे पुलिस महकमे ने उस वक्त चैन की हल्की सांस ली जब कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं ने दिवाली तक अपने धरने-प्रदर्शनों पर ब्रेक लगाने का ऐलान कर दिया. खाकी वर्दी में दबी जुबान में यह तंज तैर रहा है कि 'नेताजी लोग तो परिवार संग दीये जलाएंगे,लेकिन हमें तो सड़कों पर ही ड्यूटी बजानी है.' अलबत्ता पुलिस अफसरों के माथे की यह शिकन अभी मिटी भी नहीं थी कि फ्रांस में भड़के उग्र छात्र आंदोलन की गूंज ने दिल्ली पुलिस मुख्यालय को फुल अलर्ट मोड में डाल दिया. पुलिस कमिश्नर ने स्पेशल सेल और खुफिया एजेंसियों को साफ निर्देश जारी कर दिए हैं कि सोशल मीडिया, छात्र संगठनों और संदिग्ध नेताओं की हर हरकत की निगरानी की जाए ताकि कोई भी खिचड़ी पकने से पहले ही उसकी पूरी कुंडली साहब की मेज पर मौजूद हो. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि त्योहारी सीजन में राजधानी की सुरक्षा चाक-चौबंद रखना पुलिस के लिए दोहरी अग्निपरीक्षा है, जहां विदेशी तर्ज पर भड़कने वाले किसी भी संभावित आंदोलन को अंकुरित होने से पहले ही कुचलने का दबाव है. सचमुच जब वर्दी वालों को त्योहार पर भी राहत की गारंटी न मिले तो चैन की सांस भी आधी-अधूरी ही साबित होती है. अब पुलिस महकमे के भीतर यक्ष प्रश्न यही गूंज रहा है कि दिवाली बीतते ही क्या CJP फिर से सड़कों पर उतरकर खाकी की बची-खुची नींद उड़ाएगी या पुलिस की यह अग्रिम चक्रव्यूह-रचना आंदोलनकारियों के इरादों को पहले ही ठंडा कर देगी?

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