Pitru Paksha 2026: पितृपक्ष को सनातन परंपरा में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का महत्वपूर्ण समय माना जाता है. इस दौरान परिवार के लोग पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन और दान-पुण्य जैसे कर्म करते हैं. लेकिन जिन परिवारों में पुत्र नहीं होता, वहां अक्सर यह सवाल सामने आता है कि पितरों का श्राद्ध और पिंडदान आखिर कौन करेगा? क्या बेटी भी अपने पिता या परिवार के किसी अन्य सदस्य के लिए यह धार्मिक कर्म कर सकती है? इस विषय में अलग-अलग परंपराओं में अलग मान्यताएं मिलती हैं.
माता सीता की पिंडदान कथा क्यों होती है याद?
महिलाओं द्वारा पिंडदान की चर्चा होने पर गया की माता सीता से जुड़ी प्रसिद्ध धार्मिक कथा का उल्लेख किया जाता है. मान्यता है कि फल्गु नदी के किनारे माता सीता ने अपने ससुर राजा दशरथ के लिए पिंडदान किया था. प्रचलित कथा के अनुसार, भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण गया पहुंचे थे और वहां राजा दशरथ के निमित्त श्राद्ध कर्म किया जाना था. इसी दौरान श्रीराम और लक्ष्मण सामग्री लेने चले गए. मान्यता है कि राजा दशरथ ने माता सीता से पिंड की इच्छा प्रकट की, जिसके बाद उन्होंने फल्गु नदी की रेत से पिंड बनाकर अर्पित किया. गया में स्थित सीता कुंड को इसी कथा से जोड़ा जाता है.
क्या बेटी कर सकती है श्राद्ध और पिंडदान?
श्राद्ध कर्म की विधि सभी परिवारों, संप्रदायों और क्षेत्रों में एक जैसी नहीं होती. सामान्य धार्मिक परंपरा में पुत्र को श्राद्ध का प्रमुख कर्ता माना जाता है, लेकिन पुत्र न होने या योग्य पुरुष उत्तराधिकारी उपलब्ध न होने की स्थिति में महिला द्वारा श्राद्ध कर्म किए जाने की परंपराओं का भी उल्लेख मिलता है. कुछ परिवारों में विवाहित बेटी अपने माता-पिता के लिए श्राद्ध या पिंडदान की जिम्मेदारी निभाती है. वहीं कुछ परंपराओं में पत्नी, बहू या परिवार के अन्य सदस्य को यह दायित्व सौंपने की व्यवस्था भी बताई गई है. इसलिए ऐसी स्थिति में अपने कुल और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार विद्वान आचार्य से विधि की जानकारी लेना उचित माना जाता है.
श्राद्ध और पिंडदान में क्या अंतर है?
श्राद्ध एक व्यापक धार्मिक कर्म है, जिसका उद्देश्य पितरों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करना माना जाता है. इसमें तर्पण, पिंड अर्पण, भोजन और दान-पुण्य जैसे कर्म शामिल हो सकते हैं. वहीं पिंडदान में पिंड के रूप में पितरों को अर्पण किया जाता है. पितृपक्ष के दौरान परिवार अपनी परंपरा के अनुसार संबंधित तिथि पर अपने पूर्वजों का श्राद्ध करता है और उनके निमित्त तर्पण-पिंडदान करता है.
पितृपक्ष 2026 कब से शुरू होगा?
साल 2026 में भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा का श्राद्ध 26 सितंबर, शनिवार को होगा. इसके बाद आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से 27 सितंबर को पितृपक्ष के क्रमिक श्राद्ध शुरू होंगे. द्रिक पंचांग के अनुसार प्रतिपदा से अमावस्या तक अलग-अलग तिथियों पर पितरों के लिए श्राद्ध कर्म किए जाएंगे. पितृपक्ष का समापन 10 अक्टूबर, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा.
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. भारत 24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.
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