1. बॉम्बे से स्वीडन तक सियासी विरासत का इंटरनेशनल विस्तार !
विखे पाटिल परिवार की बेटी नीला स्वीडिश संसद में निर्वाचित..महाराष्ट्र के सियासी घरानों में चर्चा!
महाराष्ट्र के कद्दावर मंत्री राधाकृष्ण विखे पाटिल की भतीजी नीला विखे पाटिल के स्वीडन की संसद में चुने जाने की खबर ने भारतीय राजनीति के गलियारों में खासा कौतूहल पैदा कर दिया. राज्य के सत्ता और विपक्ष दोनों ही खेमों के नेताओं ने इसे भारतीय मूल की नई पीढ़ी की वैश्विक कामयाबी बताते हुए बधाई संदेश भेजे. राजनीतिक प्रेक्षक चुटकी ले रहे हैं कि महाराष्ट्र के सियासी घरानों की संगठनात्मक क्षमता अब सात समंदर पार भी रंग ला रही है. अलबत्ता अंतरराष्ट्रीय संसद में इस मुकाम तक पहुंचना उनकी अपनी काबिलियत का सबूत है. सचमुच घरेलू राजनीति की खींचतान के बीच यह खबर सभी दलों के लिए राहत और गर्व का विषय बनी, हालांकि यह यक्ष प्रश्न अब भी मुस्कुराता हुआ बना है कि क्या कभी स्वीडिश संसद में भी महाराष्ट्र जैसी गठबंधन की उठापटक देखने को मिलेगी!
2. कैमरे का एंगल और 'साउथ ब्लॉक' की अदावत!
अंतरराष्ट्रीय जलसे की वायरल क्लिप्स के बाद दो ताकतवर मंत्रालयों में मूक संवाद !
रायसीना हिल्स के गलियारों में इन दिनों एक बड़े बहुपक्षीय शिखर सम्मेलन के डिक्लेरेशन से ज्यादा उस ‘अदृश्य जंग’ की फुसफुसाहट है, जो कैमरे के पीछे लड़ी गई. अमूमन ऐसे महासम्मेलनों में कौन सा फ्रेम टीवी स्क्रीन पर चमकेगा और कौन सा कोण सोशल मीडिया की नजरों से छिपा रहेगा, इसका दारोमदार प्रचार तंत्र के मंझे हुए सिपाहियों पर होता है. अलबत्ता इस दफा कूटनीति के संजीदा दफ्तर ने प्रचार के माहिरों को किनारे कर फ्रेमिंग का सारा रिमोट कंट्रोल अपने ही हाथों में समेटे रखा. नतीजा यह हुआ कि कभी किसी राष्ट्राध्यक्ष का हाथ थामे खींचने के पलों का फ्रेम कट गया, तो कभी किसी बस की पिछली सीट पर बैठे शीर्ष सिपहसालारों की सादगी कैमरे में कैद होकर वायरल ट्रेंड बन गई.
राजनीतिक प्रेक्षक चुटकी ले रहे हैं कि जब कूटनीतिज्ञ खुद को डायरेक्टर समझने लगें, तो पर्दे पर ‘रॉ फुटेज’ बनना तय है. सचमुच पहले ही दिन जब एक चर्चित महिला कलमकार ने मेहमानों को बांटे गए गिफ्ट किट की एक-एक चीज की 'अनबॉक्सिंग' कर रील बना डाली, तभी समझ आ गया था कि परदेदारी की डोर हाथ से फिसल चुकी है !
3.कर्नाटक में भाषाओं की रस्साकशी !
'तुलु' के बाद अब 'उर्दू' की मांग.. नई भाषाई सियासत !
कर्नाटक कैबिनेट ने जैसे ही तटीय जिलों उडुपी और दक्षिण कन्नड़ में 'तुलु' को अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा का दर्जा दिया, राज्य की सियासत में भाषाई अस्मिता की नई फाइल खुल गई. सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया ने तुरंत सरकार से मांग कर दी कि इसी तर्ज पर उर्दू को भी आधिकारिक दर्जा दिया जाए. राजनीतिक प्रेक्षक इस कदम को आगामी स्थानीय चुनावों से पहले ध्रुवीकरण और भाषाई गोलबंदी की बिसात के रूप में देख रहे हैं. अलबत्ता सत्ता पक्ष संतुलन साधने में लगा है ताकि कोई नया क्षेत्रीय विवाद न भड़के. सचमुच यह यक्ष प्रश्न बन चुका है कि संस्कृति और भाषा के संवेदनशील फैसलों को दलगत राजनीति के चश्मे से अलग कैसे रखा जाए ?
4.दक्खन की पतंग और साझा छत की दरारें !
विपक्षी कुनबे में 'हैदराबादी दस्तक' पर तकरार..हिंदी पट्टी के क्षत्रपों ने बंद किए दरवाजे !
विपक्षी खेमे की साझा छत के नीचे पनाह लेने की 'दक्खनी बैरिस्टर' की दबी-छिपी ख्वाहिश ने लखनऊ से पटना तक खतरे के सायरन बजा दिए हैं, जहां समाजवाद के युवा वारिस और लालटेन के सिपहसालार पुराने जख्मों और बहीखातों की दुहाई देकर लाल-पीली आंखें दिखा रहे हैं,राजनीतिक प्रेक्षक इसे सीधे-सीधे यूपी-बिहार के मैदानों में वोट बैंक की चौहद्दी बचाने की घबराहट बता रहे हैं कि कल तक जो पतंग उनका आसमान काट रही थी, वह आज अचानक हमदर्द कैसे हो गई. अलबत्ता सियासत के बंद कमरों में कुछ तपे हुए बुजुर्ग रणनीतिकार बिखरे तिनकों को समेटने के लिए पर्दे के पीछे से मध्यस्थता की सिलाई मशीन चलाने में जुटे हैं, क्योंकि सचमुच चुनावी गणित में हर एक वोट की कीमत होती है. ऐसे में पूरे सियासी गलियारे में अब यह यक्ष प्रश्न गूंज रहा है कि क्या सिद्धांतों की दुहाई देकर बैरिस्टर साहब की नो-एंट्री का बोर्ड लगा रहेगा या फिर 2024-26 की चुनावी तपिश इन सारे गिले-शिकवों को 'गठबंधन की मजबूरी' की चाशनी में घोलकर नया गुल खिलाएगी?
5.युवराज के जलसे में 'नकल' पर बवाल !
पार्टी के बुजुर्गों ने जताई नाराजगी..आयोजकों की नीयत पर उठे सवाल ?
मालवा की धरा पर सजे विपक्षी मंच से देश के सर्वोच्च पद की हास्य-नकल उतारी गई, लेकिन सियासी महफिल में ठहाकों की जगह असहज सन्नाटा पसर गया, राजनीतिक प्रेक्षक इसे सीधे-सीधे चुनावी गंभीरता को गैर-जरूरी विवाद में झोंकने की चूक बता रहे हैं, जहां पार्टी के तपे हुए बुजुर्ग नेताओं ने ही बंद कमरों में माथा पकड़ते हुए इसे 'संस्कारों के खिलाफ' करार दे दिया है. अलबत्ता सत्ता पक्ष के तीखे हमलों के बीच पार्टी के ही रणनीतिकार अब आयोजकों की समझ पर सवाल दाग रहे हैं कि गंभीर मुद्दों की आवाज बनने आए मंच को आखिर कॉमेडी का अखाड़ा क्यों बनने दिया गया. सचमुच, जब तीर कमान से निकल चुका हो तो सफाई पेश करना आसान नहीं होता, ऐसे में अब संगठन के गलियारों में यह यक्ष प्रश्न गूंज रहा है कि क्या यह महज एक कलाकार की अनियंत्रित जुबान थी या फिर युवराज के मंच का इस्तेमाल कर पार्टी को बैकफुट पर धकेलने वाले आयोजकों पर कोई अनुशासनात्मक गाज भी गिरेगी?
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