
पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा दुनिया की सबसे भव्य धार्मिक यात्राओं में से एक मानी जाती है. हर साल लाखों श्रद्धालु इसमें शामिल होते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की मूर्तियां हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं? इन्हें समय-समय पर बदलने की एक बेहद प्राचीन और रहस्यमयी परंपरा है.

इस पवित्र परंपरा को 'नवकलेवर' कहा जाता है. 'नव' यानी नया और 'कलेवर' यानी शरीर . मान्यता है कि भगवान आत्मा के रूप में शाश्वत हैं, लेकिन समय आने पर नया शरीर धारण करते हैं. यह परंपरा सनातन धर्म के पुनर्जन्म के सिद्धांत का प्रतीक मानी जाती है.

अक्सर कहा जाता है कि मूर्तियां हर 12 साल में बदली जाती हैं, लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता.नवकलेवर तभी होता है जब हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ महीने में अधिकमास (मलमास) पड़ता है. इसलिए यह अनुष्ठान 12, 15 या 19 साल के अंतराल पर भी हो सकता है.

नई मूर्तियों के निर्माण के लिए विशेष नीम (दारु) के पेड़ों का चयन किया जाता है. इन पेड़ों पर शंख, चक्र, गदा और पद्म जैसे शुभ चिह्न, पास में नदी या श्मशान और अन्य धार्मिक संकेत होना जरूरी माना जाता है. इन नियमों का पालन सदियों से किया जा रहा है.
दैतापति सेवक और मंदिर के पुजारी विशेष पूजा के बाद इन पवित्र पेड़ों की खोज में निकलते हैं. इसे 'बनजागा यात्रा' कहा जाता है. पेड़ मिलने के बाद वैदिक मंत्रों और विशेष अनुष्ठानों के बीच उन्हें काटा जाता है और गुप्त स्थान पर नई मूर्तियां बनाई जाती हैं.

नवकलेवर की सबसे रहस्यमयी रस्म 'ब्रह्म परिवर्तन' होती है. आधी रात को मंदिर के सभी दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं. पूरी प्रक्रिया अंधेरे में होती है और केवल चुनिंदा दैतापति सेवकों को ही इसमें शामिल होने की अनुमति होती है. माना जाता है कि पुरानी मूर्तियों का दिव्य ब्रह्म तत्व नई मूर्तियों में स्थापित किया जाता है.

ब्रह्म परिवर्तन के बाद पुरानी मूर्तियों को मंदिर परिसर के कोइली वैकुंठ में पूरे विधि-विधान से समाधि दी जाती है. इसके बाद नई मूर्तियों का विशेष श्रृंगार, पूजा और अभिषेक किया जाता है. तभी श्रद्धालुओं को भगवान के नए स्वरूप के दर्शन का सौभाग्य मिलता है.

नवकलेवर केवल मूर्तियां बदलने की परंपरा नहीं, बल्कि जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म के सनातन दर्शन का जीवंत प्रतीक है. यही कारण है कि इस दुर्लभ अनुष्ठान को देखने और भगवान के नए स्वरूप के दर्शन के लिए देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं.