राजस्थान के रेगिस्तान में अब सिर्फ तेल की खोज की कहानी नहीं लिखी जाएगी, बल्कि यहां से भविष्य की ऊर्जा अर्थव्यवस्था की नई इबारत भी तैयार होगी. बालोतरा जिले के पचपदरा में स्थापित देश की पहली ग्रीनफील्ड इंटीग्रेटेड रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स अब राष्ट्र को समर्पित हो चुका है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटित इस परियोजना को भारत के ऊर्जा क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जा रहा है. करीब 79,450 करोड़ रुपये की लागत से विकसित यह विशाल परियोजना केवल पेट्रोल और डीजल बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पेट्रोकेमिकल उद्योग, रोजगार, निवेश और औद्योगिक विकास के नए रास्ते खुलने की उम्मीद है. यही वजह है कि विशेषज्ञ इसे राजस्थान की अर्थव्यवस्था के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ मान रहे हैं.
क्या होती है ग्रीनफील्ड रिफाइनरी?
ग्रीनफील्ड रिफाइनरी का अर्थ ऐसी रिफाइनरी से है, जिसे किसी नई जगह पर पूरी तरह शून्य से तैयार किया जाए. इसमें पहले से मौजूद किसी औद्योगिक ढांचे का उपयोग नहीं किया जाता, बल्कि पूरी परियोजना आधुनिक तकनीक और नई जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित की जाती है.
पचपदरा की यह रिफाइनरी भी इसी मॉडल पर बनाई गई है. इसका निर्माण वर्ष 2018 में शुरू हुआ था और अब यह व्यावसायिक उत्पादन के लिए तैयार है. यह भारत की पहली ऐसी ग्रीनफील्ड रिफाइनरी है, जिसमें रिफाइनिंग और पेट्रोकेमिकल उत्पादन को एकीकृत किया गया है. साथ ही यह देश की 24वीं तेल रिफाइनरी भी बन गई है.
तकनीक के मामले में क्यों है सबसे आधुनिक?
इस परियोजना की सबसे बड़ी खासियत इसकी अत्याधुनिक तकनीक है. इसकी वार्षिक क्षमता 90 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल को प्रोसेस करने की है, जबकि इसके साथ स्थापित पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स हर साल 2.4 मिलियन मीट्रिक टन पेट्रोकेमिकल उत्पाद तैयार कर सकेगा.
रिफाइनरी का नेल्सन कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स (NCI) 17.0 है, जो इसे दुनिया की आधुनिक रिफाइनरियों की श्रेणी में खड़ा करता है. यह इंडेक्स बताता है कि कोई रिफाइनरी कच्चे तेल को कितनी दक्षता से उच्च मूल्य वाले उत्पादों में बदल सकती है. वहीं इसकी पेट्रोकेमिकल यील्ड 26 प्रतिशत से अधिक है, जिसका मतलब है कि कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा पॉलीप्रोपाइलीन, पॉलिमर और अन्य रासायनिक उत्पादों में परिवर्तित किया जा सकेगा.
विशाल परिसर और आधुनिक सुविधाओं से लैस
करीब 4,400 एकड़ में फैली यह परियोजना लगभग 32 किलोमीटर के क्षेत्र में विकसित की गई है. इसमें कुल 13 प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित हैं, जिनमें नौ रिफाइनिंग यूनिट और चार पेट्रोकेमिकल यूनिट शामिल हैं.
रिफाइनरी को इस तरह डिजाइन किया गया है कि कच्चे तेल से अधिकतम मूल्य प्राप्त किया जा सके. सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए परिसर में तीन आधुनिक फायर स्टेशन बनाए गए हैं. इसके अलावा यह संयंत्र 27 अलग-अलग एपीआई ग्रेड के कच्चे तेल को प्रोसेस करने की क्षमता रखता है. आवश्यकता के अनुसार विभिन्न प्रकार के कच्चे तेल को मिलाकर भी यहां रिफाइनिंग की जा सकेगी.
कच्चा तेल कहां से पहुंचेगा?
इस रिफाइनरी को हर वर्ष लगभग 90 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल की आवश्यकता होगी. इसमें लगभग 15 लाख टन तेल राजस्थान के मंगला ऑयल फील्ड से प्राप्त होगा, जबकि शेष 75 लाख टन कच्चा तेल गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह के माध्यम से आयात किया जाएगा. मुंद्रा से पचपदरा तक विशेष पाइपलाइन नेटवर्क तैयार किया गया है, जिससे बिना किसी बाधा के लगातार कच्चे तेल की आपूर्ति होती रहेगी.
पाइपलाइन में हीटिंग सिस्टम क्यों लगाया गया?
राजस्थान आने वाला अधिकांश कच्चा तेल वैक्सयुक्त यानी मोम जैसी प्रकृति का होता है. सामान्य तापमान में यह जम सकता है, जिससे पाइपलाइन में प्रवाह बाधित होने का खतरा रहता है. इसी समस्या से बचने के लिए मुंद्रा से पचपदरा तक विशेष हीटेड पाइपलाइन तैयार की गई है. इसमें थर्मल इंसुलेशन और विभिन्न स्थानों पर हीटिंग स्टेशन लगाए गए हैं, ताकि पूरे सफर के दौरान तेल का तापमान नियंत्रित रहे और उसका प्रवाह सुचारु बना रहे.
तैयार पेट्रोल और डीजल कहां भेजा जाएगा?
रिफाइनरी में तैयार होने वाले पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधन उत्पादों को एचपीसीएल की पाइपलाइन के माध्यम से गुजरात के पालनपुर तक भेजा जाएगा. वहां से देश के विभिन्न हिस्सों में इनका वितरण किया जाएगा. इस व्यवस्था से पश्चिमी भारत में ईंधन आपूर्ति प्रणाली और अधिक मजबूत होने की उम्मीद है.
देश और राजस्थान को क्या मिलेगा फायदा?
इस परियोजना का प्रभाव केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा. अनुमान है कि यह रिफाइनरी भारत की कुल ईंधन जरूरत का लगभग 9 से 10 प्रतिशत हिस्सा पूरा करने में सक्षम होगी. इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी.
साथ ही पेट्रोकेमिकल क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी. पॉलीप्रोपाइलीन, पॉलिमर और अन्य वैल्यू एडेड उत्पादों का घरेलू उत्पादन बढ़ने से आयात घटेगा और देश के प्लास्टिक तथा केमिकल उद्योगों को नई गति मिलेगी.
राजस्थान के औद्योगिक विकास को मिलेगी नई दिशा
विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना पश्चिमी राजस्थान के औद्योगिक नक्शे को पूरी तरह बदल सकती है. अब राजस्थान केवल कच्चा तेल निकालने वाला राज्य नहीं रहेगा, बल्कि तेल को प्रोसेस कर उच्च मूल्य वाले उत्पाद तैयार करने वाला औद्योगिक केंद्र भी बनेगा. रिफाइनरी के आसपास पेट्रोकेमिकल पार्क, प्लास्टिक उद्योग, लॉजिस्टिक्स हब, एमएसएमई यूनिट और अन्य सहायक उद्योग विकसित होने की संभावना है. इससे पूरे क्षेत्र में निवेश और आर्थिक गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल सकती है.
रोजगार के नए अवसर खुलेंगे
इस परियोजना के निर्माण के दौरान करीब एक लाख लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिला. अब रिफाइनरी के संचालन के साथ इंजीनियरिंग, तकनीकी सेवाओं, संचालन, रखरखाव और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में स्थायी रोजगार के अवसर बढ़ेंगे. इसके अलावा परिवहन, होटल, खानपान, शिक्षा, निर्माण, सप्लाई चेन और स्थानीय व्यापार जैसे क्षेत्रों में भी रोजगार का व्यापक विस्तार होने की संभावना है. विशेषज्ञ इसे पश्चिमी राजस्थान के लिए एक नए इंडस्ट्रियल एम्प्लॉयमेंट हब की शुरुआत मान रहे हैं.
उद्घाटन में क्यों हुई थी देरी?
इस परियोजना का उद्घाटन पहले 21 अप्रैल को प्रस्तावित था. हालांकि उद्घाटन से ठीक एक दिन पहले सीडीयू-वीडीयू यूनिट में तकनीकी खराबी के कारण लीकेज हुआ, जिससे आग लग गई. सुरक्षा कारणों को देखते हुए प्रधानमंत्री का कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया और सभी तकनीकी जांच पूरी होने के बाद अब इसका उद्घाटन किया गया.
लीलाना से पचपदरा क्यों पहुंची परियोजना?
शुरुआत में इस रिफाइनरी को बालोतरा के बायतु क्षेत्र के लीलाना गांव में स्थापित करने की योजना थी. लेकिन परियोजना की घोषणा के बाद वहां जमीन की कीमतें तेजी से बढ़ गईं. कई प्रभावशाली लोगों और भूमाफिया ने बड़ी मात्रा में जमीन खरीद ली. बाद में किसानों ने भूमि अधिग्रहण का विरोध किया और कई स्थानों पर अत्यधिक मुआवजे की मांग रखी.
इन परिस्थितियों को देखते हुए तत्कालीन राज्य सरकार ने परियोजना का स्थान बदलकर पचपदरा कर दिया, जहां पर्याप्त सरकारी जमीन उपलब्ध थी. इसी फैसले ने वर्षों से अटकी इस महत्वाकांक्षी परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ किया.
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