फ्रांस से इटली तक क्यों सुलग रहा यूरोप? जेन Z नहीं हैं बवाल की असली वजह, जानिए विरोध के पीछे की कहानी

यूरोप के कई देशों में युवा सड़कों पर उतरकर सरकारों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं. फ्रांस, इटली, पुर्तगाल, बेल्जियम, अल्बानिया और स्पेन जैसे देशों में शिक्षा, महंगे मकान, बढ़ते किराए और कम वेतन को लेकर लोगों में नाराजगी है. इन प्रदर्शनों को जेन Z यानी नई पीढ़ी का आंदोलन बताया जा रहा है, लेकिन इसके पीछे की वजहें इससे कहीं ज्यादा बड़ी हैं.

Why is Europe from France to Italy is burning Gen Z story behind the protests
प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

यूरोप के कई देशों में युवा सड़कों पर उतरकर सरकारों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं. फ्रांस, इटली, पुर्तगाल, बेल्जियम, अल्बानिया और स्पेन जैसे देशों में शिक्षा, महंगे मकान, बढ़ते किराए और कम वेतन को लेकर लोगों में नाराजगी है. इन प्रदर्शनों को जेन Z यानी नई पीढ़ी का आंदोलन बताया जा रहा है, लेकिन इसके पीछे की वजहें इससे कहीं ज्यादा बड़ी हैं.

कई देशों में स्कूलों की हालत खराब है, शिक्षकों की कमी है और विश्वविद्यालयों की फीस बढ़ रही है. वहीं, मकानों की कीमतें और किराए लगातार बढ़ने से युवाओं के लिए घर खरीदना या किराए पर लेना मुश्किल हो रहा है. इन समस्याओं के बीच सवाल उठ रहा है कि जब यूरोप के देश लोगों से भारी टैक्स लेते हैं, तो वे शिक्षा और आवास जैसी बुनियादी सुविधाएं बेहतर क्यों नहीं कर पा रहे हैं?

टैक्स लेने के बाद भी सुविधाओं की कमी क्यों?

यूरोप के कई देशों में लोगों की कमाई का बड़ा हिस्सा टैक्स में चला जाता है. दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, फ्रांस और इटली में औसतन करीब 47 फीसदी, बेल्जियम में लगभग 53 फीसदी और स्पेन व पुर्तगाल में करीब 40 फीसदी तक टैक्स का बोझ पड़ता है. हालांकि, वास्तविक दरें कमाई और टैक्स के प्रकार के हिसाब से अलग-अलग होती हैं.

लंबे समय तक यूरोप में टैक्स के बदले लोगों को बेहतर सरकारी सुविधाएं मिलती रही हैं. इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और सामाजिक सुरक्षा शामिल हैं. लेकिन अब युवाओं को लग रहा है कि भारी टैक्स देने के बावजूद उन्हें अच्छी शिक्षा, सस्ते मकान और रोजगार जैसी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं.

इस नाराजगी के पीछे एक बड़ा सवाल यह भी है कि सरकारों के पास इतना पैसा होने के बाद भी स्कूलों, कॉलेजों और आवास की समस्याएं क्यों बनी हुई हैं. इसकी एक अहम वजह यूरोप की बदलती आबादी और सरकारी खर्च का बढ़ता दबाव है.

क्या घटती आबादी भी बढ़ा रही है परेशानी?

यूरोप के कई देशों में जन्म दर लंबे समय से कम बनी हुई है. इसका असर काम करने की उम्र वाले लोगों की संख्या पर पड़ रहा है. जब युवा आबादी कम होती है, तो काम करने और टैक्स देने वाले लोगों की संख्या भी प्रभावित होती है. दूसरी तरफ, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के कारण लोग ज्यादा समय तक जीवित रह रहे हैं और बुजुर्गों की आबादी बढ़ रही है.

इसका सीधा असर सरकारी बजट पर पड़ता है. सरकारों को बुजुर्गों की पेंशन, इलाज और दूसरी सुविधाओं पर ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है. ऐसे में शिक्षा, नए स्कूलों के निर्माण और दूसरी सार्वजनिक सुविधाओं के लिए बजट जुटाना मुश्किल हो सकता है.

यूरोप में शरणार्थियों पर होने वाले खर्च को भी कई राजनीतिक दल बड़ी समस्या बताते हैं. लेकिन पूरी स्थिति को केवल शरणार्थियों से जोड़कर देखना सही नहीं होगा. कम जन्म दर, बढ़ती उम्र की आबादी और पेंशन व स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता खर्च भी इस समस्या के अहम कारण हैं.

बुजुर्गों की पेंशन पर खर्च हो रहा बड़ा बजट

फ्रांस इसका एक उदाहरण है. वहां सरकार को शिक्षा, स्वास्थ्य और पेंशन जैसे क्षेत्रों के बीच खर्च का संतुलन बनाए रखना पड़ रहा है. शिक्षा के बजट का बड़ा हिस्सा शिक्षकों और दूसरे कर्मचारियों के वेतन व पेंशन जैसे खर्चों में जा सकता है. ऐसे में नए शिक्षकों की भर्ती, स्कूलों की मरम्मत और बेहतर सुविधाओं के लिए पर्याप्त पैसा जुटाना चुनौती बन जाता है.

इसके अलावा, फ्रांस में पेंशन पर होने वाला खर्च भी सरकार के लिए बड़ा मुद्दा रहा है. जब बजट का बड़ा हिस्सा बुजुर्गों की पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च होता है, तो दूसरी जरूरतों के लिए संसाधन सीमित हो सकते हैं.

यही वजह है कि यूरोप के कई देशों में सरकारों के सामने मुश्किल स्थिति है. एक तरफ बुजुर्गों को पेंशन और इलाज की सुविधाएं देनी हैं, तो दूसरी तरफ युवाओं को रोजगार, शिक्षा और सस्ते आवास की जरूरत है.

रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने पर फ्रांस में हुआ था विरोध

फ्रांस में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार ने पेंशन व्यवस्था पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए रिटायरमेंट की उम्र 62 साल से बढ़ाकर 64 साल करने का फैसला किया था. इस कदम के खिलाफ देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे.

लोगों का कहना था कि उन्हें ज्यादा उम्र तक काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए. दूसरी तरफ, सरकार का तर्क था कि लोगों की उम्र बढ़ने और पेंशन पर खर्च बढ़ने के कारण व्यवस्था को बनाए रखने के लिए बदलाव जरूरी हैं.

यह मामला दिखाता है कि यूरोप की सरकारों के लिए पेंशन व्यवस्था में बदलाव करना कितना मुश्किल है. अगर रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाई जाती है, तो लोगों में नाराजगी बढ़ती है. लेकिन ऐसा नहीं करने पर पेंशन के खर्च का दबाव बना रहता है.

जेन Z के मुकाबले बुजुर्ग वोटरों का प्रभाव ज्यादा?

यूरोप में युवाओं की समस्याओं के बावजूद सरकारों पर उनका दबाव कितना असर डालता है, यह चुनावी आंकड़ों से भी समझा जा सकता है. फ्रांस में बुजुर्ग मतदाताओं की संख्या बड़ी है और वे चुनावों में अहम भूमिका निभाते हैं. वहीं, युवा मतदाताओं की हिस्सेदारी तुलनात्मक रूप से कम है.

दिए गए आंकड़ों के अनुसार, फ्रांस में करीब 30 फीसदी मतदाता 65 साल से अधिक उम्र के हैं, जबकि 30 साल से कम उम्र के मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 17 फीसदी है. 25 साल से कम उम्र के मतदाताओं का हिस्सा करीब 11 फीसदी बताया गया है.

इस स्थिति में राजनीतिक दलों के लिए बुजुर्ग मतदाताओं की चिंताओं को नजरअंदाज करना मुश्किल होता है. पेंशन और स्वास्थ्य सेवाएं उनके लिए अहम मुद्दे हैं. दूसरी तरफ, युवाओं की मांगों में शिक्षा, रोजगार और आवास प्रमुख हैं. अगर युवा बड़ी संख्या में मतदान नहीं करते, तो उनकी मांगों को चुनावी राजनीति में उतनी प्राथमिकता मिलना मुश्किल हो सकता है.

हालांकि, केवल उम्र के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि सरकारें बुजुर्गों को ही प्राथमिकता देती हैं. चुनाव में कई दूसरे मुद्दे भी असर डालते हैं.

विरोध प्रदर्शनों के पीछे क्या है असली वजह?

यूरोप में हो रहे प्रदर्शनों को सिर्फ जेन Z का गुस्सा या बुजुर्गों की बढ़ती आबादी का नतीजा मानना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता. महंगे मकान, बढ़ते किराए, शिक्षा की खराब स्थिति और रोजगार से जुड़ी परेशानियां युवाओं की नाराजगी बढ़ा रही हैं. वहीं, कम जन्म दर और बुजुर्गों पर बढ़ता सरकारी खर्च इन समस्याओं को और जटिल बना रहे हैं.

यूरोप की सरकारों के सामने चुनौती यह है कि वे पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च जारी रखते हुए युवाओं के लिए शिक्षा, रोजगार और आवास की सुविधाएं भी बेहतर करें. अगर इन जरूरतों के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो आने वाले समय में युवाओं और सरकारों के बीच टकराव और बढ़ सकता है.