नई दिल्ली: 11वीं शताब्दी में चोल राजा राजेंद्र ने एक बड़ी बात समझ ली थी, अगर किसी राज्य को अपनी संपत्ति और व्यापार सुरक्षित रखना है, तो उसे समुद्री व्यापार मार्गों पर नियंत्रण रखना होगा. इसी सोच के साथ उन्होंने 1025 ईस्वी में एक विशाल नौसेना भेजकर श्रीविजय साम्राज्य को हराया था. उनका उद्देश्य जमीन जीतना नहीं था, बल्कि व्यापारिक जहाजों के लिए समुद्री रास्तों को सुरक्षित रखना था. आज भी यह सीख उतनी ही महत्वपूर्ण है. जो देश अपने व्यापार और अर्थव्यवस्था के लिए समुद्र पर निर्भर होता है, उसे समुद्र की सुरक्षा के लिए मजबूत ताकत भी चाहिए. समुद्री शक्ति किसी भी मजबूत अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ढाल होती है.
हिंद महासागर में बढ़ता दबाव
आज हिंद महासागर में नई चुनौतियां तेजी से बढ़ रही हैं. चीन लगातार अपनी नौसैनिक ताकत बढ़ा रहा है और भारत के आसपास कई बंदरगाहों और सैन्य सुविधाओं का निर्माण कर रहा है. उदाहरण के तौर पर, जिबूती में चीन ने एक ऐसा सैन्य बेस बनाया है, जहां से वह नौसैनिक गतिविधियों और समुद्री यातायात पर नजर रख सकता है. श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह पर भी चीनी जासूसी जहाज देखे गए हैं. वहीं म्यांमार के कोको द्वीप पर रडार स्टेशन और रनवे अपग्रेड जैसी गतिविधियां भारत के अंडमान द्वीपों के काफी करीब हो रही हैं.
इन हालातों को देखते हुए कुछ लोग कहते हैं कि भारत को सिर्फ पनडुब्बियों पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि वे सस्ती होती हैं और एयरक्राफ्ट कैरियर बहुत महंगे लक्ष्य बन जाते हैं. लेकिन यह सोच पूरी तरह सही नहीं है. पनडुब्बियां छिपकर हमला करने के लिए बेहतरीन होती हैं. वे दुश्मन के जहाजों को डुबो सकती हैं, लेकिन समुद्र पर नियंत्रण नहीं कर सकतीं. वे व्यापारिक जहाजों को हवाई हमलों से नहीं बचा सकतीं और न ही दुश्मन देशों को खुला संदेश दे सकती हैं.
इसके उलट एयरक्राफ्ट कैरियर समुद्र में चलते-फिरते एयरबेस की तरह होते हैं. इनके साथ कई युद्धपोत और लड़ाकू विमान सुरक्षा में रहते हैं. ये समुद्र और आसमान दोनों पर नियंत्रण रखने की ताकत देते हैं. अगर एयरक्राफ्ट कैरियर नहीं होंगे, तो समुद्री क्षेत्र और आसमान दोनों असुरक्षित हो जाएंगे.
भारत को क्यों चाहिए तीन एयरक्राफ्ट कैरियर?
भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए कम से कम तीन एयरक्राफ्ट कैरियर जरूरी हैं. इसका कारण बहुत सीधा है. किसी भी समय एक कैरियर बड़े मरम्मत कार्य में रहता है और दूसरा प्रशिक्षण के लिए इस्तेमाल होता है. ऐसे में सिर्फ एक ही कैरियर युद्ध के लिए तैयार रहता है. भारत की दो बड़ी समुद्री सीमाएं हैं, पूर्वी तट और पश्चिमी तट. सिर्फ एक सक्रिय कैरियर पूरे देश की सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता.
फिलहाल भारतीय नौसेना के पास दो एयरक्राफ्ट कैरियर हैं. लेकिन समय तेजी से निकल रहा है. पुराना कैरियर आईएनएस विक्रमादित्य सोवियत दौर का जहाज है, जिसे 2013 में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था. माना जा रहा है कि यह 2030 के दशक के मध्य या आखिर तक रिटायर हो सकता है.
दूसरी तरफ नया एयरक्राफ्ट कैरियर बनाना बहुत लंबा काम होता है. भारत के अपने आईएनएस विक्रांत को बनने और नौसेना में शामिल होने में लगभग 17 साल लगे थे.
अगर तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर का ऑर्डर अभी नहीं दिया गया, तो विक्रमादित्य के रिटायर होने से पहले नया जहाज तैयार नहीं हो पाएगा. इससे भारत की समुद्री सुरक्षा में बड़ा खालीपन आ सकता है, खासकर उस समय जब चीन की नौसेना लगातार मजबूत हो रही है. इसलिए अब और इंतजार करना देश के लिए खतरे से खाली नहीं होगा.
एयरक्राफ्ट कैरियर उद्योग की ताकत
एक और गलत धारणा यह है कि एयरक्राफ्ट कैरियर बनाना देश की आर्थिक ताकत पर बोझ होता है. जबकि सच यह है कि देश में बड़े युद्धपोत बनाना स्थानीय उद्योग और रोजगार को बहुत मजबूती देता है. इस पर खर्च किया गया पैसा गायब नहीं होता, बल्कि भारतीय मजदूरों, फैक्ट्रियों और छोटे व्यवसायों तक पहुंचता है. यह पूरी अर्थव्यवस्था को गति देता है.
आईएनएस विक्रांत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. इसके निर्माण से कोचीन शिपयार्ड में 2,000 से ज्यादा लोगों को सीधे रोजगार मिला. वहीं पूरे देश में लगभग 12,500 लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिला.
इसके अलावा 500 से ज्यादा कंपनियों और करीब 100 छोटे उद्योगों ने इस परियोजना के लिए सामान और तकनीक उपलब्ध कराई. इसी परियोजना के दौरान भारतीय वैज्ञानिकों और स्टील कंपनियों ने मिलकर युद्धपोतों में इस्तेमाल होने वाला विशेष स्टील भी देश में तैयार किया, जिससे विदेशों पर निर्भरता कम हुई. इस तरह की परियोजनाएं देश में तकनीक, उद्योग और रोजगार का एक मजबूत चक्र तैयार करती हैं.
रक्षा उत्पादन में भारत की बढ़ती ताकत
सरकार के अनुसार भारत का रक्षा उत्पादन अब 1.51 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो चुका है और देश 80 से अधिक देशों को रक्षा सामग्री निर्यात कर रहा है. ऐसे में एयरक्राफ्ट कैरियर बनाना सिर्फ एक हथियार खरीदना नहीं है, बल्कि यह देश की औद्योगिक और तकनीकी ताकत में निवेश है.
भारत इस समय एक बड़े मोड़ पर खड़ा है. हिंद महासागर में चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं और आईएनएस विक्रमादित्य के रिटायर होने का समय भी करीब आता जा रहा है. साथ ही देश के पास यह साबित उदाहरण भी है कि एयरक्राफ्ट कैरियर निर्माण से रोजगार, नई तकनीक और उद्योग को कितना फायदा होता है. इसलिए भारत को अब बिना देरी किए अपने तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर का निर्माण शुरू करना चाहिए. यही देश की समुद्री सुरक्षा, आर्थिक मजबूती और भविष्य की रणनीतिक ताकत को सुनिश्चित करने का सबसे मजबूत रास्ता है.
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