खैबर पख्तूनख्वा (पाकिस्तान): पाकिस्तान के अशांत खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के बाजौर जिले में सुरक्षा हालात एक बार फिर नाज़ुक हो गए हैं. तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने के प्रयास में पाकिस्तानी सेना ने ‘ऑपरेशन सरबाकफ’ नाम से एक व्यापक सैन्य अभियान शुरू किया है, जिसने इलाके की सामाजिक, मानवीय और राजनीतिक स्थिति को अस्थिर कर दिया है.
यह ऑपरेशन मुख्य रूप से लोई मामुंड और वार मामुंड तहसीलों में चलाया जा रहा है. इन क्षेत्रों को लंबे समय से TTP का गढ़ माना जाता रहा है. सुरक्षा बलों के अनुसार, इस अभियान का उद्देश्य इन इलाकों को आतंकियों के प्रभाव से मुक्त कराना और स्थानीय जनता में विश्वास बहाल करना है.
29 जुलाई को हुई थी ऑपरेशन की शुरुआत
हालांकि यह पहला अवसर नहीं है जब बाजौर में इस प्रकार की सैन्य कार्रवाई हो रही है. अतीत में भी यहां सेना और चरमपंथी तत्वों के बीच कई झड़पें हो चुकी हैं, मगर इस बार की कार्रवाई अधिक संगठित और व्यापक स्तर पर की जा रही है. इस ऑपरेशन की शुरुआत 29 जुलाई को हुई थी, लेकिन स्थानीय जनजातीय जिरगों की मध्यस्थता के कारण इसे अस्थायी रूप से रोक दिया गया था. 2 अगस्त को जब शांति वार्ता विफल हो गई, तब सेना ने दुबारा और अधिक ताकत के साथ कार्रवाई शुरू की.
27 इलाकों में लगा कर्फ्यू
सेना द्वारा कार्रवाई तेज करने के साथ ही प्रशासन ने 27 इलाकों में 12 से 72 घंटे तक का कर्फ्यू लागू कर दिया है. इसका असर आम लोगों पर भारी पड़ा है. अब तक 55,000 से अधिक लोग अपने घरों को छोड़कर विस्थापित हो चुके हैं, जबकि अनुमानतः 4 लाख से अधिक लोग कर्फ्यूग्रस्त क्षेत्रों में फंसे हुए हैं. अनेक परिवार खुले मैदानों, अस्थायी टेंटों और सरकारी भवनों में रातें बिताने को मजबूर हैं.
मानवीय संकट की तस्वीर
स्थानीय नेताओं और मानवीय संगठनों ने इस ऑपरेशन के मानवीय पक्ष पर गंभीर सवाल उठाए हैं. अवामी नेशनल पार्टी के विधायक निसार बाज ने खैबर पख्तूनख्वा विधानसभा में आरोप लगाया कि सेना की कार्रवाई के दौरान आम नागरिकों को निशाना बनाया जा रहा है. उन्होंने आरोप लगाया कि सेना लोगों को शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर रही है, और लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने की अनुमति नहीं दी जा रही.
स्थानीय लोगों के अनुसार, इलाके में भोजन, पानी, दवाओं और परिवहन के साधनों की भारी कमी है. बच्चों और बुजुर्गों की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक बनी हुई है. राहत के नाम पर की जा रही व्यवस्थाएं नाकाफी साबित हो रही हैं.
सरकारी राहत प्रयास: दावे बनाम ज़मीनी हकीकत
सरकार का दावा है कि वह प्रभावित नागरिकों को हर संभव मदद पहुंचाने की कोशिश कर रही है. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के सलाहकार मुबारक ख़ान जैब ने जानकारी दी कि इलाके के 107 स्कूलों को अस्थायी राहत शिविरों में तब्दील किया गया है, और विस्थापितों को भोजन व चिकित्सा सहायता मुहैया कराई जा रही है.
हालांकि, ज़मीनी स्तर से आ रही रिपोर्टों से सरकार के दावों की पोल खुलती नजर आती है. स्थानीय कार्यकर्ताओं और मीडियाकर्मियों के अनुसार, कई राहत शिविरों में न तो पर्याप्त भोजन है, न पीने का साफ पानी और न ही चिकित्सा सुविधाएं. कुछ जगहों पर लोगों को शरण तक नहीं मिल पा रही है.
बाजौर: एक लंबे संघर्ष की कहानी
बाजौर पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा से सटा एक संवेदनशील जिला है, जो भौगोलिक और सामरिक दृष्टि से बेहद अहम है. TTP जैसे कट्टरपंथी संगठनों ने यहां पिछले कई वर्षों से अपना आधार बनाया हुआ है. पाकिस्तान सरकार ने समय-समय पर सैन्य कार्रवाइयों के ज़रिए हालात को नियंत्रित करने का प्रयास किया है, मगर चरमपंथ की जड़ें अब भी गहरी बनी हुई हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक इस क्षेत्र में राजनीतिक संवाद, आर्थिक विकास और स्थानीय लोगों की भागीदारी पर जोर नहीं दिया जाएगा, तब तक केवल सैन्य अभियानों के माध्यम से स्थायी समाधान संभव नहीं है.
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