150 साल पुरानी तबाही की कहानी! क्या है अल नीनो? जो निगल गई थी दुनिया की 4% आबादी

What is el nino: दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन को लेकर पहले से ही चिंताएं बढ़ी हुई हैं, लेकिन अब एक और प्राकृतिक घटना वैज्ञानिकों और सरकारों की चिंता का कारण बन गई है. अमेरिका के राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) ने आधिकारिक तौर पर अल नीनो के सक्रिय होने की पुष्टि कर दी है.

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What is el nino: दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन को लेकर पहले से ही चिंताएं बढ़ी हुई हैं, लेकिन अब एक और प्राकृतिक घटना वैज्ञानिकों और सरकारों की चिंता का कारण बन गई है. अमेरिका के राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) ने आधिकारिक तौर पर अल नीनो के सक्रिय होने की पुष्टि कर दी है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना आने वाले महीनों में और मजबूत हो सकती है तथा 2026-27 की सर्दियों तक इसका प्रभाव बना रह सकता है. ऐसे में भारत समेत कई देशों में मौसम का संतुलन बिगड़ने और कृषि, जल संसाधनों तथा जनजीवन पर व्यापक असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.

आखिर क्या है अल नीनो?

अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है, जो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्री सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि के कारण उत्पन्न होती है. जब समुद्र का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, तो इसका प्रभाव केवल महासागर तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी दुनिया के मौसम तंत्र को प्रभावित करता है. इसकी वजह से कहीं अत्यधिक वर्षा और बाढ़ की स्थिति बनती है तो कहीं सूखा, गर्म हवाएं और जल संकट जैसी समस्याएं पैदा हो जाती हैं. यही कारण है कि वैज्ञानिक इसे वैश्विक मौसम प्रणाली का महत्वपूर्ण कारक मानते हैं.

समुद्र में कैसे शुरू होती है यह प्रक्रिया?

सामान्य परिस्थितियों में भूमध्य रेखा के आसपास चलने वाली व्यापारिक हवाएं गर्म पानी को प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से से पश्चिमी हिस्से की ओर धकेलती हैं. इससे एशिया और ऑस्ट्रेलिया के आसपास अधिक नमी और वर्षा का वातावरण बनता है. लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, तो गर्म पानी वापस दक्षिण अमेरिका के तटीय क्षेत्रों की ओर जमा होने लगता है. परिणामस्वरूप समुद्र की सतह का तापमान तेजी से बढ़ता है और यही स्थिति अल नीनो के रूप में विकसित होती है. यह बदलाव समुद्री और वायुमंडलीय संतुलन को प्रभावित कर वैश्विक मौसम में बड़े परिवर्तन ला देता है.

भारत के मानसून पर क्यों पड़ता है असर?

भारत की कृषि और जल व्यवस्था काफी हद तक दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर करती है. अल नीनो के दौरान वायुमंडलीय परिस्थितियों में ऐसे बदलाव होते हैं जो मानसूनी हवाओं की ताकत को कमजोर कर सकते हैं. इसके कारण देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की जाती है. जब बारिश कम होती है तो खेती प्रभावित होती है, जलाशयों का स्तर घटता है और सूखे जैसी स्थिति पैदा होने लगती है. यही वजह है कि भारत में अल नीनो को हमेशा चिंता की नजर से देखा जाता है.

गर्मी और सूखे का खतरा क्यों बढ़ जाता है?

अल नीनो केवल बारिश को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि तापमान में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी कर सकता है. सामान्य मानसून के दौरान नमी वाली हवाएं वातावरण को संतुलित रखती हैं, लेकिन अल नीनो की स्थिति में भारत और इंडोनेशिया के ऊपर वायुमंडलीय दबाव बढ़ जाता है. इससे बादलों के निर्माण की प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है और वर्षा में कमी आती है. नतीजतन कई क्षेत्रों में लंबे समय तक गर्म और शुष्क मौसम बना रहता है, जिससे हीटवेव और जल संकट जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं.

इतिहास में भी दिखा चुका है विनाशकारी असर

अल नीनो का इतिहास काफी भयावह रहा है. 1876 से 1878 के बीच आए शक्तिशाली अल नीनो को आधुनिक इतिहास की सबसे विनाशकारी जलवायु घटनाओं में गिना जाता है. विभिन्न अध्ययनों के अनुसार उस दौर में सूखा, अकाल और मौसम संबंधी आपदाओं के कारण दुनिया के कई हिस्सों में करोड़ों लोगों की जान गई थी. यही कारण है कि जब भी अल नीनो के सक्रिय होने की खबर सामने आती है, तो वैज्ञानिक, सरकारें और मौसम एजेंसियां सतर्क हो जाती हैं. आने वाले महीनों में इसकी तीव्रता पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी, क्योंकि इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था से लेकर खाद्य सुरक्षा तक पर पड़ सकता है.

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