El Nino Effect: अमेरिका के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर (CPC) ने बताया है कि प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति बनी हुई है और आने वाले महीनों में इसके और मजबूत होने की संभावना है. एजेंसी के अनुसार, 2026-27 की सर्दियों तक इसका प्रभाव जारी रह सकता है. पिछले महीने भी अल नीनो की स्थिति दर्ज की गई थी, जिससे वैश्विक मौसम पैटर्न पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है.
अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो तब विकसित होती है जब प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है. इस दौरान व्यापारिक हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, जिससे वैश्विक मौसम प्रणाली प्रभावित होती है. इसके परिणामस्वरूप कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा होती है, जबकि कई इलाकों में सूखे और गर्मी की स्थिति पैदा हो सकती है.
भारत के मॉनसून पर कैसे पड़ता है असर?
अल नीनो का भारत के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर सीधा प्रभाव माना जाता है. इसके सक्रिय होने पर मॉनसूनी हवाएं कमजोर पड़ सकती हैं, जिससे देश में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना बढ़ जाती है.
सामान्य परिस्थितियों में हिंद महासागर से आने वाली नमी से भरपूर हवाएं भारत में अच्छी वर्षा कराती हैं. लेकिन अल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर का बढ़ा हुआ तापमान इन हवाओं के प्रवाह को प्रभावित कर सकता है, जिससे मॉनसून कमजोर पड़ जाता है. इससे सूखे जैसी परिस्थितियां और तापमान में असामान्य वृद्धि देखने को मिल सकती है.
कृषि क्षेत्र के लिए बढ़ सकती है चुनौती
मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि अल नीनो का असर दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया की कृषि पर पड़ सकता है. कम वर्षा की स्थिति में चावल, कपास, सोयाबीन और अन्य प्रमुख फसलों की पैदावार प्रभावित होने की आशंका रहती है.
भारत में कुल वार्षिक वर्षा का बड़ा हिस्सा मॉनसून से प्राप्त होता है, इसलिए बारिश में कमी का सीधा असर कृषि उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. इसके साथ ही रबी सीजन की फसलों पर भी प्रभाव देखने को मिल सकता है.
एशिया के अन्य देशों में भी चिंता
इंडोनेशिया में किसान संभावित लंबे सूखे को देखते हुए सामान्य समय से पहले बुवाई की तैयारी कर रहे हैं. वहीं मलेशिया में भी कृषि उत्पादन पर असर की आशंका जताई गई है. विशेषज्ञों के अनुसार, अल नीनो के कारण कई देशों में फसल उत्पादन में गिरावट दर्ज की जा सकती है.
अमेरिका में भी दिख सकता है प्रभाव
विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो का असर अटलांटिक महासागर में बनने वाले तूफानों की गतिविधि पर भी पड़ता है. आमतौर पर अल नीनो के दौरान अमेरिका में हरिकेन सीजन अपेक्षाकृत कमजोर रहता है. हालांकि मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि कम सक्रिय सीजन में भी कोई शक्तिशाली तूफान विकसित हो सकता है, इसलिए सतर्कता जरूरी बनी रहती है.
बढ़ी मौसम विशेषज्ञों की चिंता
अल नीनो के मजबूत होने की संभावना ने दुनिया के कई देशों में मौसम और कृषि विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है. भारत समेत कई देशों की नजर अब आगामी मॉनसून और वर्षा के पैटर्न पर टिकी हुई है, क्योंकि इसका असर खाद्य उत्पादन, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.
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