क्या उत्तराखंड पर मंडरा रहा है महाभूकंप का खतरा? वैज्ञानिकों की चेतावनी ने बढ़ाई चिंता

हिमालय हमेशा से अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ भूकंपीय गतिविधियों के कारण भी वैज्ञानिकों की रुचि का केंद्र रहा है. अब उत्तराखंड के नीचे पृथ्वी की आंतरिक संरचना पर किए गए एक विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन ने ऐसे महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं, जो भविष्य में आने वाले बड़े भूकंपों के जोखिम को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकते हैं.

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हिमालय हमेशा से अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ भूकंपीय गतिविधियों के कारण भी वैज्ञानिकों की रुचि का केंद्र रहा है. अब उत्तराखंड के नीचे पृथ्वी की आंतरिक संरचना पर किए गए एक विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन ने ऐसे महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं, जो भविष्य में आने वाले बड़े भूकंपों के जोखिम को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकते हैं. शोध में सामने आया है कि राज्य के नीचे स्थित मेन हिमालयन थ्रस्ट (MHT) में लगातार भूगर्भीय तनाव जमा हो रहा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यही वह सक्रिय क्षेत्र है, जहां भविष्य में मध्यम से लेकर बड़े भूकंप आने की संभावना सबसे अधिक बनी रहती है. हालांकि शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन किसी भूकंप की भविष्यवाणी नहीं करता, बल्कि हिमालय की जटिल भूगर्भीय संरचना और उसके जोखिम को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.

जर्नल ऑफ एशियन अर्थ साइंसेज में प्रकाशित हुआ शोध

यह अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ एशियन अर्थ साइंसेज में प्रकाशित हुआ है. नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (NGRI) के वैज्ञानिक डॉ. प्रांतिक मंडल और उनकी टीम ने उत्तराखंड के नीचे लगभग 180 किलोमीटर की गहराई तक पृथ्वी की आंतरिक संरचना का विश्लेषण किया. इस शोध के लिए वर्ष 2017 से स्थापित 76 ब्रॉडबैंड भूकंप मापन केंद्रों से प्राप्त हजारों भूकंपीय संकेतों का अध्ययन किया गया. इन आंकड़ों में लगभग 700 दूरस्थ यानी टेलीसीस्मिक भूकंपों से प्राप्त डेटा भी शामिल था, जिसकी मदद से वैज्ञानिकों ने हिमालय के नीचे मौजूद संरचनाओं की विस्तृत तस्वीर तैयार की.

8 से 20 किलोमीटर की गहराई पर असामान्य भूगर्भीय क्षेत्र

डॉ. प्रांतिक मंडल के अनुसार अध्ययन में उत्तराखंड के नीचे 8 से 20 किलोमीटर की गहराई पर ऐसा क्षेत्र मिला, जहां चट्टानों के भीतर भूकंपीय तरंगों की गति सामान्य से 10 से 20 प्रतिशत कम दर्ज की गई. वहीं Vp/Vs अनुपात 10 से 15 प्रतिशत अधिक पाया गया. वैज्ञानिक बताते हैं कि सामान्य परिस्थितियों में कठोर चट्टानों के भीतर भूकंपीय तरंगें तेज गति से गुजरती हैं, लेकिन जहां पानी, गर्म द्रव (Fluids) या अपेक्षाकृत कमजोर चट्टानें मौजूद होती हैं, वहां इनकी गति धीमी हो जाती है.

कमजोर हो रही फॉल्ट लाइनें बढ़ा सकती हैं खतरा

शोधकर्ताओं का मानना है कि इस गहराई पर पानी और रूपांतरित चट्टानों से निकले द्रव मौजूद हैं. ये द्रव भूगर्भीय भ्रंश यानी फॉल्ट को कमजोर बनाकर उसकी फिसलन बढ़ा सकते हैं. ऐसी स्थिति में लंबे समय तक भूगर्भीय तनाव लगातार जमा होता रहता है. जब यह तनाव एक सीमा से अधिक हो जाता है और अचानक मुक्त होता है, तब बड़े भूकंप की संभावना बढ़ जाती है. यही कारण है कि वैज्ञानिक इस क्षेत्र को भविष्य के संभावित भूकंपीय जोखिम के लिहाज से बेहद संवेदनशील मान रहे हैं.

सेंट्रल हिमालयन सिस्मिक गैप में आता है उत्तराखंड

अध्ययन में बताया गया है कि उत्तराखंड सेंट्रल हिमालयन सिस्मिक गैप का हिस्सा है. यह वह भूभाग माना जाता है जहां लंबे समय से कोई अत्यधिक तीव्रता वाला भूकंप नहीं आया है, लेकिन भूगर्भीय तनाव लगातार जमा हो रहा है. शोध में यह भी पाया गया कि जिन इलाकों में पहले 6.5 या उससे अधिक तीव्रता के भूकंप दर्ज किए जा चुके हैं, उनके नीचे मेन हिमालयन थ्रस्ट में तनाव जमा होने के स्पष्ट संकेत दिखाई देते हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह की जानकारी भविष्य में भूकंपीय जोखिम का अधिक सटीक आकलन करने में उपयोगी साबित होगी.

क्या है मेन हिमालयन थ्रस्ट (MHT)?

सरल शब्दों में समझें तो हिमालय के नीचे एक विशाल भूगर्भीय फिसलन सतह मौजूद है, जिसे मेन हिमालयन थ्रस्ट (MHT) कहा जाता है. भारतीय प्लेट लगातार यूरेशियन प्लेट के नीचे धंसती जा रही है. इस प्रक्रिया के दौरान करोड़ों टन चट्टानों पर लगातार दबाव बनता रहता है. जब यह दबाव अचानक टूटता या मुक्त होता है, तब भूकंप आता है. वर्ष 1803 का गढ़वाल भूकंप, 1991 का उत्तरकाशी भूकंप और 1999 का चमोली भूकंप भी इसी भूगर्भीय व्यवस्था से जुड़े माने जाते हैं.

30 से 55 किलोमीटर की गहराई पर मोहो सीमा

शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने पृथ्वी की ऊपरी ठोस परत यानी क्रस्ट और उसके नीचे स्थित मेंटल के बीच की सीमा, जिसे मोहो (Moho) कहा जाता है, की भी पहचान की. अध्ययन के अनुसार उत्तराखंड के नीचे यह सीमा लगभग 30 से 55 किलोमीटर की गहराई पर स्थित है. इसका अर्थ है कि हिमालय के नीचे पृथ्वी की ऊपरी परत सामान्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक मोटी है. यही अतिरिक्त मोटाई हिमालय जैसे विशाल पर्वतों को संरचनात्मक मजबूती प्रदान करती है.

130 से 180 किलोमीटर नीचे लिथोस्फीयर–एस्थेनोस्फीयर सीमा

अध्ययन में वैज्ञानिकों ने लिथोस्फीयर–एस्थेनोस्फीयर बाउंड्री (LAB) की भी पहचान की. यह सीमा उत्तराखंड के नीचे लगभग 130 से 180 किलोमीटर की गहराई पर स्थित पाई गई. लिथोस्फीयर पृथ्वी की कठोर बाहरी परत होती है, जबकि उसके नीचे अपेक्षाकृत नरम और गर्म एस्थेनोस्फीयर मौजूद होती है, जिस पर टेक्टोनिक प्लेटें धीरे-धीरे खिसकती रहती हैं. इस खोज से हिमालय के नीचे प्लेटों की संरचना और उनकी गति को समझने में नई वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त हुई है.

‘डबल मोहो’ संरचना ने भी बढ़ाई वैज्ञानिकों की दिलचस्पी

शोधकर्ताओं ने कुछ स्थानों पर ‘डबल मोहो’ जैसी जटिल भूगर्भीय संरचना के संकेत भी दर्ज किए हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि करोड़ों वर्ष पहले भारतीय और यूरेशियन प्लेटों की टक्कर के दौरान पृथ्वी की परतें जटिल तरीके से मुड़ीं और एक-दूसरे के ऊपर चढ़ीं, जिसके कारण ऐसी संरचना विकसित हुई होगी. हालांकि इस निष्कर्ष की पुष्टि के लिए अभी और विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता बताई गई है.

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