पाकिस्तान का काल बना TTP-तालिबान का गठबंधन, भाग खड़ी हुई मुनिर की सेना, भारत पर क्या होगा असर?

पाकिस्तान एक बार फिर सुरक्षा और कूटनीतिक मोर्चे पर घिरता जा रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह है तालिबान और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के बीच बनता मजबूत गठबंधन.

TTP-Taliban alliance becomes a nightmare for Pakistan
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पाकिस्तान एक बार फिर सुरक्षा और कूटनीतिक मोर्चे पर घिरता जा रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह है तालिबान और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के बीच बनता मजबूत गठबंधन. अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता वापसी के बाद यह समीकरण तेजी से पाकिस्तान के लिए सिरदर्द बन चुका है. जहां पाकिस्तान ने कभी तालिबान को रणनीतिक साझेदार माना था, वहीं आज वही संगठन टीटीपी को संरक्षण देने के आरोपों में घिरा हुआ है.

इस पूरे घटनाक्रम का भारत पर भी रणनीतिक असर पड़ सकता है, खासकर जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पश्चिमी सीमाओं पर सुरक्षा को लेकर. लेकिन इससे पहले समझना जरूरी है कि तालिबान-टीटीपी समीकरण कैसे बना, क्यों यह पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा है और भारत को इस पर कैसी नजर रखनी चाहिए.

2021 में तालिबान की सत्ता में वापसी

अगस्त 2021 में जब अमेरिका ने अफगानिस्तान से सैन्य वापसी की और तालिबान ने काबुल पर नियंत्रण कर लिया, तो पाकिस्तान ने इसे अपनी "रणनीतिक जीत" के रूप में देखा. तत्कालीन इमरान खान सरकार और सेना के कई अधिकारी तालिबान की वापसी से खुश नजर आए. पाकिस्तान को उम्मीद थी कि अफगान तालिबान, भारत विरोधी नीतियों में उसका साथ देगा और अफगानिस्तान को एक “गहराई वाली रणनीतिक गहराई” के रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा.

हालांकि, यह सोच जल्द ही गलत साबित हुई. तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद अफगानिस्तान और पाकिस्तान के संबंध लगातार तनावपूर्ण होते गए. सीमा विवाद, आतंकी गतिविधियों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप और खासकर टीटीपी को लेकर तालिबान की चुप्पी ने पाकिस्तान की रणनीतिक उम्मीदों को धराशायी कर दिया.

क्या है टीटीपी और क्यों है यह खतरनाक?

तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) की स्थापना 2007 में हुई थी. यह संगठन पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा, वजीरिस्तान और अन्य सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय है. इसका घोषित लक्ष्य पाकिस्तान में इस्लामिक शरिया कानून लागू करना है. इस संगठन ने पिछले दो दशकों में पाकिस्तान में कई बड़े आतंकी हमले किए हैं, जिनमें:

  • 2007: बेनजीर भुट्टो की हत्या
  • 2012: मलाला यूसुफजई पर हमला
  • 2014: पेशावर स्कूल हमला – जिसमें 150 से ज्यादा लोग मारे गए, अधिकतर बच्चे थे

पाकिस्तान सरकार ने कई बार दावा किया कि टीटीपी को जड़ से खत्म कर दिया गया है, लेकिन यह संगठन हर बार अफगानिस्तान की सीमा से लगी पहाड़ियों में फिर से संगठित होकर उभर आया.

तालिबान और टीटीपी का गठजोड़

तालिबान और टीटीपी वैचारिक रूप से समान हैं. दोनों संगठनों का लक्ष्य इस्लामी शासन की स्थापना है और दोनों ही कट्टरपंथी सुन्नी विचारधारा से प्रभावित हैं. अफगानिस्तान में सत्ता में आने के बाद तालिबान ने टीटीपी को कार्रवाई से रोकने की पाकिस्तान की अपीलों को लगातार नजरअंदाज किया है.

वर्तमान में कई रिपोर्टों से यह साफ हो चुका है कि टीटीपी के लड़ाके अफगानिस्तान में खुलेआम घूम रहे हैं, उन्हें वहां ट्रेनिंग, हथियार और लॉजिस्टिक सपोर्ट भी मिल रहा है. पाकिस्तान का दावा है कि तालिबान सरकार टीटीपी को संरक्षण दे रही है, लेकिन अफगान तालिबान इसे पाकिस्तान की आंतरिक समस्या बताकर पल्ला झाड़ता रहा है.

डूरंड लाइन: सीमा विवाद की राजनीति

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच 2,640 किलोमीटर लंबी सीमा को डूरंड लाइन कहा जाता है. यह रेखा ब्रिटिश भारत के समय 1893 में खींची गई थी, जिसे अफगानिस्तान ने आज तक आधिकारिक रूप से मान्यता नहीं दी है.

इस रेखा के दोनों ओर बड़ी संख्या में पश्तून आबादी रहती है, जिनकी जातीय, भाषाई और सांस्कृतिक पहचान साझा है. पश्तूनों का हमेशा से आरोप रहा है कि डूरंड लाइन ने उन्हें जबरदस्ती दो देशों में बांट दिया.

तालिबान भी इसी पश्तून समाज से आता है, और उनके नेताओं का मानना है कि डूरंड लाइन की दूसरी तरफ के पश्तून इलाके भी अफगानिस्तान का हिस्सा हैं. पाकिस्तान द्वारा सीमा पर फेंसिंग किए जाने का तालिबान विरोध करता रहा है. इस सीमा विवाद ने पाकिस्तान और तालिबान के रिश्तों में और कड़वाहट ला दी है.

टीटीपी की गुरिल्ला रणनीति का असर

टीटीपी के लड़ाके पाकिस्तानी सेना के खिलाफ गुरिल्ला हमलों का इस्तेमाल कर रहे हैं. ये हमले खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में अधिक होते हैं. हमलावर हमला करने के बाद तुरंत अफगान सीमा पार कर जाते हैं, जिससे उन्हें पकड़ पाना मुश्किल होता है.

पाकिस्तानी सेना को अफगान सीमा पार जाकर कार्रवाई करने में दिक्कत होती है, क्योंकि ऐसा करना अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संकट को जन्म दे सकता है. इसके अलावा पाकिस्तान इस समय राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकट से जूझ रहा है, ऐसे में एक बड़े सैन्य अभियान की लागत वह नहीं उठा सकता.

भारत के लिए क्या हैं रणनीतिक मायने?

भारत इस पूरे घटनाक्रम को बहुत सावधानी से देख रहा है. अफगान तालिबान ने हाल ही में यह स्वीकार किया कि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा है, और आतंकवाद को पाकिस्तान की आंतरिक समस्या बताया.

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