पाकिस्तानी सेना और वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) के बीच की नाराजगी अब खुलकर सामने आ गई है. पिछले समय में, अफगान तालिबान और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) ने पाकिस्तान की सैन्य चौकियों और अन्य संवेदनशील ठिकानों पर सफल हमले किए हैं. ऐसा माना जाता है कि ISI ने इन हमलों की पूर्व सूचना देने में चूक की, जिससे सेना को आश्चर्यचकित अवस्था में सामना करना पड़ा.
तालिबान की ओर से यह दावा किया गया है कि एक ही रात में 58 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए और कई घायल हुए. (कुछ विदेशी मीडिया रिपोर्टों में यह आंकड़ा हवाला दिया गया है कि यह एक “नाइट ऑपरेशन” था)
पाकिस्तानी पक्ष ने इन दावों की सीमा तक जवाबी कार्रवाई की है, और दोनों पक्षों ने युद्धविराम की तरफ रुख किया.
खुफिया विफलताओं के पीछे ISI
खुफिया विफलताओं के पीछे ISI पर सबसे बड़ा दोष लगाया गया है. सेना की शीर्ष स्तर पर यह भावना पनप रही है कि ISI न तो सैन्य ऑपरेशन संबंधी जानकारी समय रहते साझा कर रही है और न ही उसे युद्धभूमि की बदलती स्थितियों का सही आकलन है.
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ISI और सेना के बीच तालमेल की कमी, लीदर्शिप संघर्ष और “इंट्ऱाफाइटिंग” (अंदरूनी कलह) ने खुफिया तंत्र की विश्वसनीयता कमजोर कर दी है. एक समाचार रिपोर्ट में कहा गया है कि “बहुत अधिक सैन्य हस्तक्षेप, समन्वय की कमी और आपसी कलह” इन विफलताओं के कारण माने जाते हैं.
इसके अलावा, ISI की नियुक्तियों और संचालन पर सेना प्रमुख का सीधा हस्तक्षेप अब बढ़ रहा है, अधिकारियों की रिपोर्ट है कि अब कई निर्णय सेना प्रमुख की मंजूरी से हो रहे हैं.
सेना प्रमुख आसिम मुनीर और प्रतिक्रिया
फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने हाल ही में रावलपिंडी के जनरल हेडक्वार्टर (GHQ) में एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई, जिसमें सेना और खुफिया दोनों पक्षों के शीर्ष अधिकारी शामिल थे. इस बैठक में उन्होंने ISI की लगातार खुफिया चूक पर कड़ी नाराजगी जताई और विस्तार से जवाब मांगा कि आखिर क्यों खुफिया विभाग लगातार विफल साबित हो रहा है.
मुनीर ने अधिकारियों को चेतावनी दी कि भविष्य में किसी भी लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि तालिबान के खिलाफ एक स्पष्ट, रणनीतिक रूपरेखा न होने की वजह से ही पाकिस्तान की सैन्य चौकियों को बार-बार हानि उठानी पड़ी.
नियंत्रण और पुनर्संरचना
प्रति सूत्रों, अब मुनीर ISI को स्वतंत्रता देना बंद कर चुके हैं, यानी खुफिया तंत्र की नियुक्ति, कार्यप्रणाली, और अन्य अहम फैसलों में उनका सीधा नियंत्रण है. इससे ISI और अन्य राजनीतिक व सैन्य नेतृत्व के बीच दुर्बलता और तनाव बढ़ गया है.
कुछ रिपोर्टें यह भी कहती हैं कि इस हस्तक्षेप को लेकर ISI में नाराजगी पनप रही है.
आलोचनाएँ और विरोध
मुनीर पर यह आरोप भी लगते रहे हैं कि वे राजनीतिक हस्तक्षेपों में बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं और अपनी महत्ता बढ़ाने के लिए सेना की भूमिका को बढ़ा रहे हैं. कुछ आलोचकों ने कहा कि उनका रुख राष्ट्रवाद और धार्मिकता की भाषा के साथ मेल खाते दिखता है, जिसे वे रणनीतिक और आर्गनाइजेशनल परिवर्तन के लिए उपयोग कर रहे हैं.
एक रिपोर्ट में यह तर्क दिया गया कि Munir की ISI पृष्ठभूमि ने उन्हें खतरनाक बना दिया है, “जिन्होंने आख़िर में ‘Matchbox’ थाम रखी हो, सभी को आग लगाना आती हो” यानी नियंत्रण और संतुलन की कमी हो सकती है.
ISI, TLP और राजनीतिक उपयोग
तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (TLP) और ISI के बीच पहले अच्छे संबंध रहे हैं. ISI ने लोकतांत्रिक सरकारों पर दबाव बनाने में TLP का उपयोग किया था. कुछ विश्लेषकों का कहना है कि ISI ने नवाज शरीफ और इमरान खान दोनों को अप्रत्यक्ष रूप से कमजोर करने में TLP को एक उपकरण की तरह इस्तेमाल किया.
लेकिन अब TLP का रुख ISI के खिलाफ हो गया है, और वह सत्ता प्रतिष्ठान को चुनौती दे रहा है. यह ISI की असमर्थता और राजनीतिक व्यवस्था बदलने की अक्षमता का एक संकेत माना जा रहा है.
राजनीतिक नियंत्रण का जोखिम
ISI पर यह आरोप लगता है कि वह केवल खुफिया एजेंसी नहीं रही, बल्कि एक राजनीतिक मशीनरी बन गई है, सरकारों को उखाड़ने और सत्ता समीकरणों में हस्तक्षेप करने की भूमिका निभा रही है. यह आरोप कई आलोचकों और राजनयिक विश्लेषकों ने लगाए हैं.
यदि ISI को अब सेना प्रमुख नियंत्रित कर रहे हैं, तो यह दुष्चक्र को और बढ़ा सकता है, क्योंकि खुफिया निष्पादन और सैन्य अपेक्षाएँ अक्सर अलग-अलग होती हैं, और यदि नियंत्रण बहुत केंद्रीकृत हो जाए, तो निर्णयनयन में गतिरोध और दोषी स्वीकृति की प्रवृत्ति बढ़ सकती है.
चुनौतियाँ और संभावित परिणाम
सेना और ISI के बीच खुला टकराव पाकिस्तान की सुरक्षा संरचना में विश्वास को कमजोर कर सकता है. अगर खुफिया विफलताएँ बढ़ीं तो उसे न सिर्फ सैन्य मोर्चे पर नुकसान होगा, बल्कि जनता का भरोसा भी प्रभावित होगा.
मुनीर की आलोचना यह है कि तालिबान जैसी मजबूत और अनुभवी सैन्य शक्ति के खिलाफ एक स्पष्ट रणनीति न होने के कारण पाकिस्तान को युद्ध के मैदानों में बार-बार उलझना पड़ रहा है. यदि रणनीति, संसाधन, जानकारी और समन्वय सही न हो, तो विफलताएँ बढ़ती जाएँगी.
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