पाकिस्तान की सियासत में फिर आई तख्तापलट की आहट, फील्ड मार्शल के बाद अब राष्ट्रपति बनेंगे मुनीर?

पाकिस्तान की राजनीति एक बार फिर अशांत दौर में प्रवेश करती दिख रही है. हालिया घटनाक्रमों और सेना की बढ़ती सक्रियता को देखते हुए तख्तापलट की अटकलें एक बार फिर हवा पकड़ रही हैं.

There is a possibility of coup again in Pakistans politics
प्रतीकात्मक तस्वीर/Photo- Internet

इस्लामाबाद: पाकिस्तान की राजनीति एक बार फिर अशांत दौर में प्रवेश करती दिख रही है. हालिया घटनाक्रमों और सेना की बढ़ती सक्रियता को देखते हुए तख्तापलट की अटकलें एक बार फिर हवा पकड़ रही हैं. चर्चा इस बात की भी है कि सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर न सिर्फ देश की सबसे ताकतवर कुर्सी यानी राष्ट्रपति पद की ओर देख रहे हैं, बल्कि सेना की भूमिका को स्थायी तौर पर नीतिगत फैसलों में स्थापित करना चाहते हैं.

फील्ड मार्शल बनने के बाद बढ़ी मुनीर की ताकत

जनरल असीम मुनीर को हाल ही में 'फील्ड मार्शल' की उपाधि दी गई—पाकिस्तान के इतिहास में यह सम्मान अब तक केवल अयूब खान को मिला था. यह कदम भारत द्वारा किए गए 'ऑपरेशन सिंदूर' के तुरंत बाद सामने आया, जिसमें पाकिस्तान को रणनीतिक झटका लगा था. इसके बावजूद मुनीर को प्रोन्नत करना इस बात का संकेत है कि सेना के भीतर उनकी पकड़ मजबूत है और उन्हें पूरी राजनीतिक व्यवस्था पर नियंत्रण की ओर बढ़ने का हरी झंडी मिल गई है.

सेना बनाम सरकार: तनाव चरम पर

पाकिस्तानी मीडिया की मानें तो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की भूमिका अब धीरे-धीरे कमजोर हो रही है. जनरल मुनीर विदेश नीति से लेकर रक्षा बजट और सुरक्षा रणनीति तक खुद ही तय कर रहे हैं. सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की कुछ हालिया नियुक्तियों और निर्णयों से सेना असहज हुई है, जिससे आपसी टकराव बढ़ गया है.

राष्ट्रपति जरदारी और सेना के रिश्तों में खटास क्यों?

मार्च 2024 में दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद जरदारी ने संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल कर सेना से जुड़ी कुछ नियुक्तियों पर सवाल उठाया. इसके साथ ही कुछ प्रमुख रक्षा फैसलों पर ‘हां’ कहने में हिचक ने सेना को नाराज कर दिया. खासकर सेना से संबंधित विदेश नीति और टॉप-लेवल पोस्टिंग पर राष्ट्रपति की अनिच्छा सेना के लिए असहज स्थिति बन गई.

बिलावल भुट्टो के बयान से और गरमाया माहौल

सियासी गलियारों में इस तनाव को और हवा मिली जब पीपीपी प्रमुख बिलावल भुट्टो जरदारी (राष्ट्रपति जरदारी के बेटे) ने हाल ही में भारत को हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे वांछित आतंकियों को सौंपने की बात कही. इस बयान ने उन जिहादी नेटवर्क को नाराज कर दिया, जिन्हें लंबे समय से पाकिस्तानी सेना का समर्थन माना जाता है. इससे सेना के भीतर भी बिलावल और जरदारी को लेकर असहजता और गुस्सा बढ़ा है.

क्या पाकिस्तान एक और तख्तापलट की ओर बढ़ रहा?

पाकिस्तान में सैन्य दखल का इतिहास नया नहीं है.

  • 1958: अयूब खान ने सत्ता संभाली
  • 1977: जनरल ज़िया-उल-हक ने भुट्टो सरकार गिराई
  • 1999: परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ को हटाया

इन तख्तापलटों के बाद या तो मार्शल लॉ लगाया गया या सैन्य समर्थित सरकारें बनीं. इस समय भी हालात कुछ उसी ओर इशारा कर रहे हैं.

मुनीर के अगले कदम पर सबकी नजरें

जनरल मुनीर का कद अब केवल सेना प्रमुख के रूप में नहीं बल्कि एक संभावित राष्ट्राध्यक्ष के रूप में देखा जा रहा है. अमेरिका और चीन जैसे बाहरी ताकतों से उनकी मुलाकातें, विदेश नीति में सीधी दखल और घरेलू राजनीति में बढ़ती पकड़—ये सभी संकेत बताते हैं कि पाकिस्तान में सत्ता का केंद्र धीरे-धीरे रावलपिंडी शिफ्ट हो रहा है.

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