इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेपन सिस्टम, एयरशिप, हाई एनर्जी लेजर... जानें भारतीय सेना के भविष्य के हथियारों की ताकत

आधुनिक युद्ध की परिभाषा हर दिन बदल रही है. बीते समय में हमने देखा कि कैसे बिना सीमा पार किए, भारत ने दुश्मन के इलाके में गहराई तक जाकर टारगेट को निशाना बनाया.

The strength of the future weapons of the Indian Army
प्रतिकात्मक तस्वीर/ ANI

नई दिल्ली: आधुनिक युद्ध की परिभाषा हर दिन बदल रही है. बीते समय में हमने देखा कि कैसे बिना सीमा पार किए, भारत ने दुश्मन के इलाके में गहराई तक जाकर टारगेट को निशाना बनाया. चाहे बालाकोट स्ट्राइक हो या हाल का ऑपरेशन सिंदूर, ये सभी मिशन इस बात के प्रमाण हैं कि आज वायुसेना (IAF) की भूमिका पारंपरिक युद्ध से कहीं आगे बढ़ चुकी है. अब युद्ध सिर्फ मैदान में नहीं, बल्कि आसमान और अंतरिक्ष में लड़े जाते हैं.

भारत सरकार और रक्षा मंत्रालय भी इस बदलती स्थिति को भलीभांति समझ चुके हैं और आने वाले 15 वर्षों के लिए एक विशाल रणनीतिक योजना बनाई गई है, जिसमें भारतीय वायुसेना को आधुनिकतम तकनीकों और हथियारों से लैस किया जाएगा.

स्ट्रैटोस्फेरिक एयरशिप: आसमान में निगरानी का नया युग

रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय वायुसेना को कम से कम 20 स्ट्रैटोस्फेरिक एयरशिप की आवश्यकता है. ये विशेष प्रकार के हवाई प्लेटफॉर्म होंगे जो पृथ्वी की सतह से करीब 18 से 22 किलोमीटर ऊंचाई पर उड़ान भर सकते हैं. ये एयरशिप लगातार एक ही स्थान पर रहकर दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रख सकते हैं और रियल-टाइम इंटेलिजेंस, सर्विलांस और संचार की सुविधा प्रदान करेंगे. ये एयरशिप युद्ध के दौरान कमांड और कंट्रोल सेंटर की भूमिका निभा सकते हैं.

सैटेलाइट आधारित मल्टीबैंड रेडियो फ्रिक्वेंसी सिस्टम

IAF को अंतरिक्ष आधारित अत्याधुनिक कम्युनिकेशन और सिग्नल इंटरसेप्शन के लिए कम से कम 5 मल्टीबैंड रेडियो फ्रिक्वेंसी सेंसर सैटेलाइट की जरूरत है. ये सैटेलाइट्स इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर में बेहद उपयोगी होंगे और दुश्मन की रेडियो, रडार और कम्युनिकेशन गतिविधियों को ट्रैक व इंटरसेप्ट करने की क्षमता रखेंगे.

हाई एंड्योरेंस ड्रोन: 24 घंटे आसमान में निगरानी

भारतीय वायुसेना को 350 से अधिक ऐसे ड्रोन चाहिए जो 30,000 फीट या उससे अधिक की ऊंचाई पर लगातार 24 घंटे तक उड़ान भरने में सक्षम हों. ये ड्रोन दुश्मन की सीमाओं के अंदर गहराई तक जाकर निगरानी करने, टारगेट लोकेशन साझा करने और आवश्यकतानुसार हमला करने की क्षमता से लैस होंगे.

स्यूडो सैटेलाइट और हाई एल्टीट्यूड एयर प्लेटफॉर्म

IAF की योजना में 75 से अधिक हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट्स भी शामिल हैं. ये मानवरहित प्लेटफॉर्म अंतरिक्ष और वायुमंडल की सीमा पर ऑपरेट करते हैं और पारंपरिक सैटेलाइट्स के मुकाबले कम लागत में अधिक फ्लेक्सिबिलिटी प्रदान करते हैं. ये निगरानी, संचार और सटीक हमलों में सहायक सिद्ध हो सकते हैं.

HALE और VTOL एयरक्राफ्ट की बढ़ती मांग

रक्षा मंत्रालय की रणनीति में 100 से अधिक HALE (High Altitude Long Endurance) और VTOL (Vertical Take-Off and Landing) एयरक्राफ्ट भी शामिल हैं. HALE विमान अधिक ऊंचाई पर लंबी अवधि तक उड़ सकते हैं जबकि VTOL एयरक्राफ्ट सीमित स्थानों से भी उड़ान भर सकते हैं, जो पर्वतीय और सीमावर्ती इलाकों में बेहद उपयोगी होंगे.

हाई एनर्जी लेजर और डायरेक्टेड एनर्जी वेपन

भविष्य के युद्धों में पारंपरिक गोलियों और मिसाइलों से ज्यादा प्रभावशाली हथियार होंगे हाई एनर्जी लेजर और डायरेक्टेड एनर्जी वेपन (DEW). ये हथियार बिना किसी गोला-बारूद के प्रकाश या ऊर्जा की किरणों से दुश्मन के सिस्टम को निष्क्रिय कर सकते हैं. भारत को आने वाले समय में 20 से अधिक ऐसे हथियार सिस्टम की जरूरत होगी.

यूसीएवी: बिना पायलट के स्टील्थ हमलावर

आधुनिक युद्ध प्रणाली में UCAV (Unmanned Combat Aerial Vehicle) बेहद अहम भूमिका निभाने वाले हैं. ये बिना पायलट के उड़ने वाले विमान न केवल निगरानी कर सकते हैं, बल्कि हथियारों से लैस होकर दुश्मन पर हमला भी कर सकते हैं. IAF को कम से कम 150 से ज्यादा स्टील्थ-capable UCAV की आवश्यकता है, जो दुश्मन के रडार में आए बिना अंदर तक हमला कर सकें.

इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेपन सिस्टम और एंटी-स्वार्म तकनीक

भविष्य में ड्रोन्स का इस्तेमाल बहुत अधिक बढ़ेगा और दुश्मन द्वारा स्वार्म ड्रोन अटैक की आशंका बनी रहेगी. ऐसे में भारत को एंटी-स्वार्म ड्रोन सिस्टम की जरूरत होगी जो एक साथ कई ड्रोन को निष्क्रिय कर सके. साथ ही हाई पावर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेपन सिस्टम भी दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को जाम करने या नष्ट करने में उपयोगी साबित होंगे.

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