मिडिल ईस्ट संकट में टूटी खाड़ी देशों की कमर! तेल और सुरक्षा के मोर्चे पर दिखा गहरा असर

जैसे ही मध्य-पूर्व में कुछ समय के लिए शांति के संकेत मिले, गोल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) के देशों के लिए ईरान संकट का ये चरण न केवल मुश्किलें लेकर आया, बल्कि उनके  सपनों और समृद्धि की जमीनी सच्चाई को भी उजागर कर दिया.

The Real Loser in the Iran Crisis middile east tensions
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जैसे ही मध्य-पूर्व में कुछ समय के लिए शांति के संकेत मिले, गोल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) के देशों के लिए ईरान संकट का ये चरण न केवल मुश्किलें लेकर आया, बल्कि उनके  सपनों और समृद्धि की जमीनी सच्चाई को भी उजागर कर दिया. भले ही युद्ध में कोई भौतिक हार नहीं हुई हो, लेकिन इस संकट ने जो कमजोरियां दिखाईं, वे ईंट-ईंट जोड़कर खड़ी की गई समृद्धि से कहीं अधिक खतरनाक हैं.

तेल की ताकत और सुरक्षा की झूठी दीवार

दशकों तक, इन देशों ने अपनी अथाह तेल संपत्ति, महंगे रक्षात्मक उपकरण और वैश्विक ताकतवर साझेदारियों के दम पर खुद को अजेय माना. लेकिन इस बार संकट ने इस सुरक्षा कवच को चीरते हुए यह दिखा दिया कि इन देशों का अधिकांश भौतिक विकास तीन नाजुक स्तंभों पर खड़ा है – बाहरी सुरक्षा, वैश्विक व्यापार मार्गों का खुला रहना, और उन आयातित खाद्य पदार्थों पर निर्भरता, जो इन देशों के निवासियों की 90% कैलोरी की आपूर्ति करते हैं.

होर्मुज़ जलडमरूमध्य संकट और इसका असर

जब होर्मुज़ जलडमरूमध्य में संकट गहरा हुआ, तो तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं. दुबई का जबल अली पोर्ट, जो हर साल $200 बिलियन का व्यापार संभालता था, बंद हो गया. व्यापारी परेशान हो गए, राशन के लिए लोग लाइन में खड़े हो गए, और रियाद, दोहा और मनामा के सुपरमार्केट शेल्फ़ खाली होने लगे. सऊदी अरब, जो 80% गेहूं बाहर से मंगवाता है, उस समय संकट में था. और तो और, पीने के पानी के संयंत्र भी संकट का सामना कर रहे थे, जिससे पानी की आपूर्ति प्रभावित हुई.

विदेशी साझेदारियां और रक्षा खर्च

गोल्फ देशों ने रूस, चीन और अमेरिका के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया था. अरबों डॉलर की निवेशों की योजनाओं ने गोल्फ देशों के भीतर समृद्धि के सपने बुने थे. लेकिन जब संकट आया, तो चीन और रूस ने तेहरान के पक्ष में खड़ा होकर गोल्फ देशों को घेर लिया. कतर, यूएई, सऊदी अरब जैसे देशों ने इन दोनों देशों में करोड़ों डॉलर का निवेश किया था, लेकिन इस संकट के वक्त इन देशों से कोई मदद नहीं आई.

गोल्फ देशों की डिप्लोमैसी और सैन्य खर्च

गोल्फ देशों का वार्षिक रक्षा बजट $100 बिलियन से अधिक था, लेकिन संकट के वक्त ये सुरक्षा उपाय नाकाफी साबित हुए. सऊदी अरब और यूएई के पास F-35 और पैट्रियट मिसाइल सिस्टम जैसे अत्याधुनिक हथियार थे, लेकिन इनकी वास्तविक स्थिति यह थी कि अमेरिका की सैन्य मदद के बिना इनका बचाव असंभव था.

ईरान ने साबित की अपनी ताकत

ईरान ने संकट का पूरी तरह से फायदा उठाया. होर्मुज़ में अपनी नियंत्रण क्षमता को एक रणनीतिक लाभ के रूप में परिवर्तित कर लिया, और चीन, रूस और ओमान के साथ आर्थिक साझेदारी करने में सफल रहा. इसने यह भी सुनिश्चित किया कि उसका "नेविगेशन टैक्स" हर साल $50 से 100 बिलियन के बीच कमाई का रास्ता खोलेगा.

गोल्फ देशों का अगला कदम

सच ये है कि गोल्फ देशों की समृद्धि अब सवालों के घेरे में आ गई है. क्या गोल्फ देशों का $400 बिलियन का भंडार, उच्चतम गुणवत्ता वाली बुनियादी ढांचे, और वैश्विक कनेक्टिविटी संकट के वक्त कुछ काम आएंगे? इस बार, संकट ने इन देशों को यह सिखाया है कि सशक्त सुरक्षा व्यवस्था, खाद्य आपूर्ति की सुरक्षा और वास्तविक रणनीतिक साझेदारियों को बनाए रखना बहुत जरूरी है.

लेखक- मोहम्मद आरिफ खान, मिडिल ईस्ट मामलों के विशेषज्ञ

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