The JC Show: 4 साल पहले कुछ सवाल थे, तुमसे हो पाएगा? कौन आएगा? क्या कर पाओगे? खतरों से खेल पाओगे? देश की नब्ज़ को जान पाओगे? रूह को समझ पाओगे? जमीन पर उतर पाओगे? भारत का भरोसा जीत पाओगे?
और हमने सवालों का जवाब देने की बजाय काम करना शुरू किया. 4 साल में कभी कैमरा स्टूडियो में था तो कभी सरहद के करीब. कभी देश की नब्ज़ समझनी थी तो कभी देश की आवाज बनना था. और हर बार एक ही कोशिश थी. खबर सिर्फ दिखानी नहीं है. खबर को समझना है.
4 साल हजारों खबरें, अनगिनत ग्राउंड रिपोर्ट्स, सैकड़ों चेहरे और करोड़ों दर्शकों का भरोसा. कल तक चार लोग पूछ रहे थे तुमसे हो पाएगा. और आज चार लोग नहीं भारत कह रहा है वाह.
क्योंकि चैनल सिर्फ स्टूडियो से नहीं बनता. चैनल बनता है जमीन पर उतरने की जिद से, सच को समझने की कोशिश से और सबसे बढ़कर दर्शकों के भरोसे से.
संकल्प से सिद्धि तक कैसे बदला यह सपना हकीकत की तरफ और आज का जेसी शो सिर्फ 4 साल का जश्न नहीं है. यह उस सफर की कहानी है जिसमें सवाल तो बहुत थे लेकिन जवाब काम ने दिए.
और आज जेसी शो में बात भारत 24 के उन चार सालों की, बात जिन्होंने सवालों को भरोसे में बदला है और इसी पर बातचीत करने के लिए आज का हमारा जेसी शो का स्पेशल एडिशन है. और हमारे साथ मौजूद हैं भारत 24 के सीईओ और एडिटर इन चीफ और फर्स्ट इंडिया के सीएमडी और एडिटर इन चीफ डॉ जगदीश चंद्र.
सवाल- सर आपका बहुत-बहुत स्वागत करती हूं और पहले तो आपको ढेरों बधाइयां देते हुए जेसी शो का आगाज करती हूं और आज जेसी शो की हमने हेडलाइन रखी है- 'संकल्प से सिद्धि आखिर कैसे हकीकत में बदला नेशनल चैनल भारत 24 का यह सपना.' वुड यू लाइक टू एक्सप्लेन इट सर.
डॉ जगदीश चंद्र- संकल्प से सिद्धि का अर्थ है पहले लक्ष्य तय करो, संकल्प करो, उसे प्राप्त करो, सिद्ध करो और भारत 24 का जो चार साल पहले का लक्ष्य था, साधना थी, टारगेट था, उसके उत्सव की आज चौथी वर्षगांठ हम मना रहे हैं. जिसके आप सभी बधाई के पात्र हैं. अब प्रश्न एक है कि आखिर ये नेशनल चैनल का आईडिया आया कैसे?
तो हम तो रीजनल के लोग थे. मनोज भाई हमारे साथ थे 10-15 साल से. तो रीजनल करते-करते फाइनली हम लैंड हुए जयपुर में फर्स्ट इंडिया में जी से और जी हिंदुस्तान चलाते थे. तो आदत पड़ गई थी. एक नशा था नेशनल चैनल चलाने का.
जयपुर पहुंचे फर्स्ट इंडिया में तो रीजनल के तो राजा थे लेकिन नेशनल नहीं था. तो हमारी रेलवेंस जो है राजस्थान तक थी. दिल्ली आते थे तो पहले वाली धमक नहीं दिखाई देती थी. वो मिलने नहीं आता था. सुना सुना महसूस होता था आज कॉफी शॉप में बैठे हुए.
तो फिर मन हुआ कि चलो यार ये नेशनल चैनल को फिर से स्टार्ट किया जाए. जी वाली परंपरा को यहां फिर से जी हिंदुस्तान की परंपरा है. उसको और फिर से आगे बढ़ाया जाए.
तो उमर भाई थे, उन उनको हमने अपना नक्शा समझाया. मनोज भाई से बात हुई, इन्होंने बताया वो चैनल लॉन्च किया. हालांकि मनोज भाई ने कहा था ₹2 लगेंगे, लग गए ₹4 और अभी भी जारी है.
तो कुल मिला के तो ये है कि प्रयोग सफल था और इसके लिए आप सब और हमारी टीम बधाई की पात्र है कि देश का पहला चैनल है जो शुरुआती दौर के पहले चार वर्षों में ही ब्रेक इवन के आसपास 95% पे खड़ा है. इसके लिए आप सबको हार्दिक बधाई.
सवाल- सर इससे जुड़ा एक बड़ा ही दिलचस्प किस्सा है कि जब आपको यह ख्याल आया कि एक नेशनल चैनल लेकर आना है उस वक्त आप श्रीनगर में थे. चैनल के जन्म की सर वो कौन सी घड़ी थी, श्रीनगर में वो कौन सा किस्सा है जब आपके मन में भारत 24 की नींव रखने का विचार आया.
डॉ जगदीश चंद्र का जवाब- श्रीनगर हम जाते रहते हैं. ईटीवी में ईटीवी उर्दू चलाते थे. वहां का फ्लैगशिप चैनल था. तो श्रीनगर में इतने लोग जानते हैं. मतलब जितने लोग जयपुर में जानते हैं आधे लोग वहां जानते हैं. वो सुपरहिट चैनल था ईटीवी का.
तो एक ऐसी यात्रा में जब श्रीनगर गए हुए थे तो डल लेक के सामने ललित होटल है, वहां शाम को बैठे हुए थे. वाटरमेलन जूस पी रहे थे. डल में सामने सूरज जो है छिप रहा था. धीरे-धीरे आखिरी तीन मिनटों में एकदम से डीप हो गया, छिप गया.
हमें धक्का लगा कि जीवन हमारा भी इसी तरह जा रहा है. उसमें शायद 73 ऐसे कुछ थे जो है. तो हमने कहा ये क्या हुआ. तो जीवन तो जा रहा है, तो कोई तमन्ना बाकी तो नहीं रह गई.
हम तो घर में बॉट लगा हुआ है कि अगर सांस खत्म हो जाए और तमन्ना अधूरी रहे तो अधूरी मौत. लेकिन अगर सांस रहे और तमन्ना पूरी हो जाए तो मोक्ष.
तो मन में प्रश्न आया कि अब मोक्ष की ओर चलें. कोशिश करें जो है मोक्ष वालों के अगर ऊपर कोई रेड कारपेट है तो मिलेगा हमें. बाकी ठीक है. वरना सब लोग हैं तो वहां बैठे हुए हैं. जैसे बैठे बाकी होंगे, वैसे हम वहां रहेंगे जो है.
तो सोचा तमन्ना कौन सी बाकी है. बहुत सोचा ध्यान नहीं आई. हमने चलो खत्म करो, चल दिए, सो गए.
रात को सुबह जो है श्रीनगर-दिल्ली की फ्लाइट में बैठे, बिजनेस क्लास में बैठे थे. खिड़की से झांक के देखा, बादल लहरा रहे थे, बादल उमड़ रहे थे, श्रीनगर के पर्वत की झलकी दिखाई दे रही थी. एयर होस्टेस कुछ जूस ला के रख रही थी.
तो बिजनेस क्लास में वैसे आदमी कहा राजा की मुद्रा में होता है, दिमाग भी ज्यादा चलता है आदमी का, तेज चलता है. तो फिर उन्होंने कहा नहीं, एक्सरसाइज करो. कौन सी तमन्ना बाकी है?
फिर ध्यान आया अभी दो तमन्ना बाकी है आइडेंटिफाइड. एक छोटी, एक बड़ी.
छोटी क्या है? अपन हर साल 10 साल से आम खाने मलियाबाद जा रहे हैं. ईटी यूपी के दिनों से हम वहां जाते हैं. खेत में वहां 200 किस्म के आम होते हैं. 10-5 आम खाते हैं, थोड़ा सा वापस आ जाते हैं और उम्र आ रही है तो आम अपने घर में होने चाहिए.
तो ठीक है, हो जाएगा. ये तो चार पेड़ आम के लगा दिए. उनमें ढाई-तीन सौ आम अब आ रहे हैं लगातार. तो पहली तमन्ना पूरी. छोटी तमन्ना पूरी.
बड़ी तमन्ना क्या है? और एक नेशनल चैनल होना चाहिए अपना जो है.
अच्छा ठीक है भाई, करते हैं शुरुआत इसकी. तो शुरुआत करी, उसका परिणाम आज सबके सामने है.
तो ये जो आईडिया था तमन्नाएं पूरी करने का, तो दोनों तमन्नाएं पूरी हो गईं. तो आज मैं तमन्ना शून्य व्यक्ति हूं संसार में. मेरे मन में कोई तमन्ना, कोई इच्छा, कोई शेष नहीं. छोटी-मोटी डिजायर अलग बात है. बाकी जो है तो मैं मोक्ष प्राप्ति का हकदार हूं. लेट्स सी फाइनली क्या होता है.
सवाल- सर, ऐसे बहुत सारे प्रेरक तत्व थे और इस नेशनल चैनल का सपना साकार करने के लिए अगर मैं शुरुआती दौर की बात करूं तो वैचारिक स्तर पर, कंसेप्चुअल लेवल पर किन-किन लोगों का योगदान रहा? और इसमें सबसे पहले मैं जिक्र करना चाहूंगी फर्स्ट इंडिया के डायरेक्टर वीरेंद्र चौधरी जी का.
डॉ जगदीश चंद्र का जवाब- वीरेंद्र चौधरी इज़ अ फ्रेंड, फिलॉसफर एंड गाइड, आउटस्टैंडिंग पर्सन, नॉलेजेबल पर्सन और दूरदृष्टि, विजन है उनका, उनसे मैंने चर्चा की थी.
सवाल- सर वीरेंद्र चौधरी जी के बाद अगला नाम मेरे ज़हन में पवन अरोड़ा जी का आ रहा है, जो कि सीईओ और मैनेजिंग एडिटर हैं फर्स्ट इंडिया के. उनके योगदान को आप कैसे डिस्क्राइब करेंगे?
डॉ जगदीश चंद्र का जवाब- देखिए पवन अरोड़ा तो शुरू से हमारे प्रिंसिपल एडवाइजर हैं, हमारे भाई भी हैं, अद्भुत व्यक्ति हैं. आईएएस में थे तो देश के जो पांच टॉप ऑफिसर्स हैं उनमें गिनती होती थी. उनका रिजल्ट ओरिएंटेशन डिलीवरी वो अद्भुत है. टेलीविजन में आए तो फर्स्ट इंडिया देख रहे हैं. राजस्थान में जो है और कितने नवाचार वहां उन्होंने कर दिए हैं. आप दफ्तर देखिए सारा दफ्तर चेंज हो गया. सारा सिस्टम, इंफ्रास्ट्रक्चर देखिए वहां का. उनसे लगातार विमर्श होता था और वो बात को आगे बढ़ाते हैं. वो प्रोग्रेसिव व्यक्ति हैं. वो बात को आगे बढ़ाते थे और वो जो प्रोसेस था कंसेप्चुअल लेवल पर जो है वैचारिक स्तर पे उसमें पवन अरोड़ा का भी एक रोल था और इसके लिए ही डिर्व्स अ वोट ऑफ़ थैंक्स फ्रॉम आवर साइड.
सवाल- सर एक और नाम बहुत Important है अनीता हाडा जी का, जो कि News Director भारत 24 हैं and definitely we are missing her today.
डॉ जगदीश चंद्र का जवाब- She is intelligent, Brilliant, जिसे कहना चाहिए, All in one, उन्हें कोई जिम्मेदारी सौंप दो, वो जिम्मेदारी को कर देंगी. एडिटर बना दो उन्हें बिजनेस हेड बना दो उन्हें और मैं कहूंगा कल को उनको रेलवे बोर्ड का चेयरमैन बना तब उसको भी चला देंगी अद्भुत जो है और वो भी छाया हैं हमारी, 15-20 साल से हमारे साथ हैं. आज हम उनको मिस कर रहे हैं ऑफ कोर्स आपने ठीक कहा.
सवाल- सर हमारे CBO and strategy advisor मनोज जग्यासी जी का योगदान Conceptual level पर चैनल के लिए कैसा रहा?
डॉ जगदीश चंद्र का जवाब- इनके पद नाम की आवश्यकता नहीं है, नाम ही बहुत है मनोज जग्यासी. The country's best business & strategy advisor in the television sector. हम भी 15-17 साल से Etv के दिनों से साथ हैं और मैंने सपना देखा तो इनसे बात हुई थी, उमर भाई इन्होंने आगे बढ़ाया, और मैंने कहा ना ₹2 खर्च होंगे और ₹4 लगे, उसमें ये भी एक पार्टी थे हमारे, और जो Success है, आज इसके इस Idea को जो conceive किया उसमें इनका एक Major role रहा है. इनके साथ हमारा रिश्ता बहुत पुराना है और सबसे बड़ी बात ये है कि इनके कोई Sales में या Business में कोई Target नहीं होते हमारी Working में आपस में. Etv के time में ऐसा होता था कि साल के अंत में पूछते मनोज भाई क्या figure, मनोज भाई कहते, ये हो गया, अच्छा ठीक है जो आ गया वो भी ठीक है, नहीं आया वो भी ठीक है, चलो आगे बढ़ो. तो रिश्ता हमारा कुछ अलग तरह का इनके साथ है और खुशी है कि हमारे साथ चल रहे हैं, देखिए अब दुनिया में योग्य व्यक्ति को प्रलोभन देने के लिए बहुत व्यक्ति आते हैं. तो इन चार सालों में बहुत से लोग इनके द्वार पे भी आए, आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा, तो ये कहते हैं, नहीं भैया हम ये दोस्ती निभाएंगे, हमारा जीवन मरण का साथ है, हम तो वहीं रहेंगे.
सवाल- सर अब थोड़ा आपके 18 साल लंबे टेलीविजन करियर की तरफ रुख करते हैं. आप एक सफल आईएएस ऑफिसर रहे हैं, लेकिन एक दिन अचानक आपने 30 साल की सेवाकाल के बाद 1 सितंबर 2008 को प्रतिष्ठित भारतीय प्रशासनिक सेवा से वीआरएस लेकर मीडिया इंडस्ट्री में आने का फैसला क्यों किया?
डॉ जगदीश चंद्र का जवाब- ये तो वैसे तो जन्मपत्री है, बेसिकली, लेकिन घटना यह हुई कि मैं शाम को घर बैठा हुआ था, मेरे घर के सामने एक आईएसएफ अफसर रिटायर हो गए थे दो महीने पहले, वो आए मिलने के लिए, बोले सर ये पड़ोसी जो है ना पहले नमस्ते करता था अब ये ब्लैंक देखता है मेरे पे नमस्ते नहीं करता, तो बड़ा बुरा लगता है, आप समझाओ इसको, हमने कहा बैठो भाई चाय पियो, बुलाया पड़ोसी को, पड़ोसी कोई आरटीआई किस्म का खांटी आदमी था. उसने कहा सर आपने मुझे क्यों बुलाया? हमने कहा, हम अपने आप को गली का थानेदार समझते हैं. तेरे को बुला लिया भाई, चाय पियो यार ऐसी क्या बात है, कहता है आप बताइए मैंने कहा नमस्ते क्यों नहीं करते इनको, असली बात बताऊं मैंने कहा बताओ, सर रिटायर आदमी को नमस्ते करने का मन नहीं करता और 2 साल बाद जब आप रिटायर होंगे तो आपको मैं नमस्ते नहीं करूंगा मैं अभी कह देता हूं, उस समय 58 वर्ष का था ट्रांसपोर्ट कमीश्नर लगा हुआ था तो मैं हिल गया उसकी बात से. उसके जाते मैंने गाड़ी उठाई और ड्राइवर से कहा चलो अभी सीएम रेजिडेंस, वसुंधरा राजे जी थीं मुख्यमंत्री, रात के साढ़े 8 और 9 बजे उन्होंने कहा इतना लेट, ऐसी Urgency है? हमने कहा एक किस्सा हुआ, उन्होंने कहा Foolish ये क्या है? किस्सा हुआ ठीक है, मैंने कहा नौकरी छोड़ना चाहता हूं, तो क्या करोगे? मैंने कहा मैं ऐसी नौकरी करूंगा, कभी जीवन भर रिटायर ही नहीं होऊं जिससे, कहा
Don't talk rubbish और कल बात करेंगे. तो खैर फिर वो बात खत्म हो गई वहां. उनके प्रधान सचिव थे सुनील अरोड़ा जो बाद में चीफ इलेक्शन कमिश्नर थे. उनको हमने मनाया किसी तरह से कि मैडम को समझाओ हम जाना चाहते हैं. He succeded finally, हमारा VRS मंजूर हुआ और फिर हम निकले वहां से. फिर सवाल था कि Mandate क्या हो? हम जीवन भर रिटायर तो नहीं होना चाहते, करेंगे क्या? किसी विद्वान आदमी ने कहा कि आपका Mandate होना चाहिए, A reasonable recognition with being reasonably busy. इस category में क्या आता है? इस category में आता है, आप स्कूल खोल लो, मेडिकल कॉलेज खोल लो, IAS इंस्टीट्यूट खोल लो, लेकिन इसमें क्या है कि आप Busy तो हो जाएंगे, लेकिन Recognition नहीं है, India में Recognition केवल दो जगह पर है- या तो सरकार में या मीडिया में, सरकार आप कर चुके हैं इसलिए मीडिया में आ जाइए, फिर मीडिया कौन सा? Print या Electronic, फिर दिमाग लगाया तो फिर पता लगा Etv on sale है, Etv राजस्थान आ रहा था. फिर हम गए वहां हैदराबाद और अपनी नौकरी के लिए दावा ठोका हमने, चेयरमैन के सामने, He Surprised, How a IAS officer can run the channel, not possible. हमने कहा सर परीक्षा लीजिए हमारी, कहा First have lunch with me. हम Transport commissioner थे, मान सम्मान था, उन्होंने Lunch खिलाया अच्छे से, मैंने कहा मौका तो दीजिए सर, तो उन्होंने कहा ठीक है मैं एक परीक्षा आयोजित करता हूं. HR, business head and editorial editor जो हैं, आप उनको satisfy कर देना, मतलब उनको आप हरा देना तो आप आ जाना, उसका दूसरा भाव ये था, दो घंटे इंटरव्यू हुआ, तकदीर थी, हरा दिया मैंने, तो मेरा selection हो गया, तो उन्होंने कहा कि हमारे पास पैसे थे नहीं, देने के लिए, Salary क्या होगा? मैंने कहा ₹1, तो उन्होंने कहा वो कैसे, हमने कहा It is sin to draw salary from loss making undertaking, तो बड़ा प्रभावित हुए उन्होंने कहा कि Now my compony is in safe hands और हमारा letter issue हो गया जयपुर आ गए शाम की फ्लाइट में बैठ कर, 2 चैनल थे उस समय, फिर Reliance आ गया सब बढ़ गया. फिर हमने 18 चैनल खोले पीछे मुड़ कर देखा नहीं इस तरह की जो शुरुआत थी इसकी वो शुरुआत इस तरह से हुई और इस तरह मीडिया में Entry हुई.