तेहरान का जल संकट, बारिश न हुई तो दिसंबर तक खाली कराना पड़ सकता है पूरा शहर

कभी सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक माना जाने वाला ईरान की राजधानी तेहरान आज अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से जूझ रही है. प्राचीन इतिहास और आधुनिकता के संगम वाला यह शहर अब पानी के लिए तड़प रहा है.

Tehran water shortage 2025 severe water shortage supply
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कभी सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक माना जाने वाला ईरान की राजधानी तेहरान आज अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से जूझ रही है. प्राचीन इतिहास और आधुनिकता के संगम वाला यह शहर अब पानी के लिए तड़प रहा है.

सरकारी चेतावनी साफ है  “अगर नवंबर तक बारिश नहीं हुई, तो पानी का राशनिंग शुरू होगा, और दिसंबर तक सूखा बना रहा, तो तेहरान को खाली कराना पड़ेगा.”यह सुनकर भले ही यह किसी काल्पनिक कहानी जैसा लगे, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज़्यादा भयावह है.

तेहरान का पानी खत्म होने की कगार पर

तेहरान का अमीर कबीर बांध सूखने की कगार पर है. पिछले साल जहां जलाशय पूरे शहर को पानी दे रहा था, इस बार उसमें सिर्फ एक-छठा हिस्सा बचा है.आधे से ज़्यादा प्रांतों में महीनों से बारिश नहीं हुई है. सरकारी इंजीनियरों के मुताबिक, अगले दो हफ्तों में पीने के पानी की सप्लाई भी बंद हो सकती है. अब सरकार रात के समय नलों को बंद करने की योजना पर विचार कर रही है ताकि दिन में थोड़ा पानी बचाया जा सके. लेकिन असलियत यह है कि अब बांध और भूमिगत जलाशय दोनों सूख चुके हैं.

राष्ट्रपति की चेतावनी और जनता की बेचैनी

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने चेतावनी दी है कि अगर आने वाले हफ्तों में बारिश नहीं हुई, तो पानी का सख्त बंटवारा करना पड़ेगा.उन्होंने कहा कि अगर नवंबर के अंत तक हालात नहीं सुधरे, तो हमें राशनिंग करनी होगी. और अगर दिसंबर तक भी बारिश न आई, तो तेहरान छोड़ना पड़ सकता है. यह बयान केवल एक प्रशासनिक चेतावनी नहीं, बल्कि एक गहरी पर्यावरणीय त्रासदी की स्वीकारोक्ति है.

सूखे की असली जड़ें: इंसानी लापरवाही और जलवायु संकट

ईरान सरकार ने इस जल संकट का ठीकरा जलवायु परिवर्तन पर फोड़ा है. निश्चित रूप से बदलते मौसम ने हालात बिगाड़े हैं. जहां कभी बर्फ और बारिश से भरपूर पहाड़ हुआ करते थे, वहां अब 50 डिग्री सेल्सियस तक तापमान पहुंच रहा है.तेहरान क्षेत्र में 100% वर्षा की कमी दर्ज की गई है. लेकिन यह केवल आधी सच्चाई है. असली वजह इंसानी गलतियाँ हैं — दशकों की गलत नीतियाँ, अनियोजित विकास और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन.

1. खेती और जल उपयोग की गलत नीति

ईरान का लगभग 90 प्रतिशत पानी खेती में खर्च होता है.किसान चावल और गेहूं जैसी पानी-खपत वाली फसलें उगाते हैं, जबकि जमीन बंजर होती जा रही है.नदियों पर बांध बनाकर प्राकृतिक जल प्रवाह को रोक दिया गया, जिससे दलदल और झीलें नष्ट हो गईं.कभी जीवन देने वाली ज़ायंदेह रुद नदी अब साल में कुछ ही महीनों तक बहती है.

2. भूजल का अंधाधुंध दोहन

तेहरान के नीचे कभी समृद्ध जलस्तर था, लेकिन शहर ने उसे तेल की तरह निकालकर खत्म कर दिया.बिना योजना के कुएं खोदे गए, हर मोहल्ले में नई इमारतें बनीं, लेकिन जल पुनर्भरण (रिचार्ज) की कोई व्यवस्था नहीं की गई.नतीजा  भूजल स्तर अब उस गहराई तक गिर गया है जहां से पानी निकालना तकनीकी और आर्थिक दोनों दृष्टि से असंभव हो चुका है.

3. सरकारी इनकार और असफल नीतियाँ

वर्षों तक सरकार ने इस संकट को नजरअंदाज किया.नई जल परियोजनाओं की घोषणा तो हुई, लेकिन किसी ने दीर्घकालिक जल प्रबंधन की दिशा में कदम नहीं उठाया.कृषि और शहरी योजनाएं बिना अध्ययन के बनीं, जिससे अब पूरा देश सिस्टमेटिक ड्रायनेस (Systemic Drought) का शिकार हो गया है.विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान की स्थिति “आत्मघाती जल प्रबंधन” का परिणाम है.

सरकार की हताश कोशिशें

अब हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि ईरान अपने पड़ोसियों से पानी मांगने की स्थिति में पहुंच गया है.अफगानिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे देशों से जल आपूर्ति की बातचीत चल रही है, लेकिन यह एक कूटनीतिक मजबूरी है, न कि समाधान.तेहरान में रात के समय नल बंद किए जा रहे हैं और कई इलाकों में पहले से पानी की कटौती की जा चुकी है.फिर भी, बिना बारिश के यह सभी कदम रेगिस्तान में बूंद भर जैसे हैं.

एक शहर जो जंगों से बचा, अब प्यास से हार रहा है

तेहरान ने सदियों तक आक्रमण, क्रांति और प्रतिबंधों का सामना किया.लेकिन अब यह शहर एक ऐसी लड़ाई लड़ रहा है जिसमें दुश्मन दिखाई नहीं देता  प्यास.अगर हालात ऐसे ही रहे, तो इतिहासकार लिखेंगे कि “तेहरान जंगों से नहीं, सूखे से हार गया.यह शहर जिसने हमेशा बाहरी ताकतों के आगे झुकने से इनकार किया, अब प्रकृति की नाराज़गी के आगे बेबस दिख रहा है.

क्या अभी भी बच सकती है तेहरान की प्यास?

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अभी भी उम्मीद बाकी है. अगर सरकार जल पुनर्चक्रण, आधुनिक सिंचाई तकनीक और वर्षा जल संचयन जैसे कदम तुरंत उठाए, तो स्थिति सुधर सकती है.इसके साथ ही ज़रूरी है कि ईरान अपने नागरिकों में “वॉटर कॉन्शियसनेस” यानी पानी के प्रति जिम्मेदारी की भावना जगाए. लेकिन इससे पहले आसमान को भी अपना हिस्सा निभाना होगा. क्योंकि अगर दिसंबर तक बादल नहीं बरसे, तो तेहरान का नाम शायद सिर्फ इतिहास की किताबों में रह जाएगा.

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