Frequent Nightmares: आज के तेज-तर्रार जीवन में कई लोग रात में डरावने सपने या नाइटमेयर्स (Nightmares) का सामना करते हैं. सामान्य तौर पर इसे सिर्फ मानसिक परेशानी माना जाता है, लेकिन हाल ही में हुए एक अध्ययन ने इसे स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरे के रूप में दिखाया है. शोध के अनुसार, जिन वयस्कों को हफ्ते में एक बार या उससे अधिक बार नाइटमेयर्स आते हैं, उनमें 70 साल की उम्र से पहले मौत का खतरा तीन गुना अधिक होता है. यह जानकारी यूरोपियन एकेडमी ऑफ न्यूरोलॉजी (EAN) कांग्रेस 2025 में पेश की गई.
यह अध्ययन यूके के डिमेंशिया रिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉ. अबिदेमी ओतैकू ने किया. इसमें 26 से 74 साल की उम्र के 4,196 वयस्कों को शामिल किया गया, जो चार अलग-अलग पॉपुलेशन-बेस्ड कोहोर्ट स्टडीज का हिस्सा थे. शोधकर्ताओं ने 18 साल तक इन प्रतिभागियों का फॉलो-अप किया. प्रतिभागियों ने स्वयं बताया कि उन्हें कितनी बार डरावने सपने आते हैं.
मुख्य निष्कर्ष यह रहा कि हफ्ते में एक या उससे अधिक बार नाइटमेयर्स का अनुभव करने वाले लोगों में 70 साल से पहले मौत का खतरा उन लोगों की तुलना में तीन गुना अधिक था, जिन्हें कभी-कभी या कभी नाइटमेयर्स आते हैं. इस फॉलो-अप अवधि में कुल 227 प्रतिभागियों की समय से पहले मौत हुई.
बायोलॉजिकल एजिंग और नाइटमेयर्स
शोध में यह भी पाया गया कि बार-बार नाइटमेयर्स वाले लोग तेज़ी से बायोलॉजिकल रूप से बूढ़े होते हैं. इसे टेलोमियर लंबाई और एपिजेनेटिक क्लॉक्स जैसे जैविक मापदंडों से आंका गया. टेलोमियर कोशिकाओं की उम्र का संकेत देते हैं और एपिजेनेटिक क्लॉक्स डीएनए मेथिलेशन से उम्र का पता लगाते हैं. अध्ययन में तीन क्लॉक्स का इस्तेमाल किया गया: डुनेडिनPACE, ग्रिमएज और फेनोएज. शोध से यह सामने आया कि तेज़ बायोलॉजिकल एजिंग समय से पहले मौत के जोखिम का 39-40 प्रतिशत तक हिस्सा समझाती है.
शोध में यह भी दिखा कि बच्चों में लगातार नाइटमेयर्स तेज़ एजिंग के संकेत दिखा सकते हैं. अध्ययन के अनुसार, नाइटमेयर्स स्मोकिंग, मोटापा, खराब डाइट या कम शारीरिक गतिविधि की तुलना में भी मौत के खतरे का मजबूत संकेतक हैं. यह अध्ययन पहला है जो बार-बार आने वाले डरावने सपनों को तेज़ एजिंग और समय से पहले मौत से जोड़ता है, भले ही अन्य स्वास्थ्य समस्याएं मौजूद हों.
नाइटमेयर्स शरीर पर कैसे असर डालते हैं
वैज्ञानिक बताते हैं कि नाइटमेयर्स सिर्फ मानसिक अनुभव नहीं होते, बल्कि वे शरीर पर गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं. बार-बार डरावने सपने देखने से फाइट-ऑर-फ्लाइट प्रतिक्रिया सक्रिय होती है, जिससे हृदय गति बढ़ती है और तनाव हार्मोन जैसे कोर्टिसोल का स्तर बढ़ता है. लगातार ऐसा होने से शरीर पर दबाव बढ़ता है और कोशिकाओं की उम्र जल्दी बढ़ती है.
साथ ही, नाइटमेयर्स नींद की गुणवत्ता को भी प्रभावित करते हैं. ये सपने रेम स्लीप को बाधित करते हैं, जिससे शरीर की कोशिकाओं की मरम्मत और नवीनीकरण प्रभावित होता है. इससे टेलोमियर छोटी होती हैं और डीएनए में एपिजेनेटिक बदलाव आते हैं, जिससे शरीर की बायोलॉजिकल उम्र कैलेंडर उम्र से अधिक हो सकती है.
तेज़ एजिंग के कारण हृदय रोग, कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है. अध्ययन में यह बात कॉक्स रिग्रेशन मॉडल से साबित हुई. इसके अलावा, एक अन्य शोध में यह पाया गया कि बार-बार नाइटमेयर्स सुसाइड रिस्क से भी जुड़े हो सकते हैं. जर्नल ऑफ क्लिनिकल साइकियाट्री में प्रकाशित स्टडी में मानसिक रोगियों में डरावने सपने सुसाइडल क्राइसिस से लगभग चार महीने पहले शुरू होते पाए गए.
नाइटमेयर्स से बचाव और इलाज
शोधकर्ताओं का कहना है कि नाइटमेयर्स को एक रोकने योग्य स्वास्थ्य समस्या माना जा सकता है. इसका समाधान संभव है और सही उपायों से इसके नकारात्मक असर को कम किया जा सकता है.
डॉक्टर नींद की समस्याओं, मानसिक स्वास्थ्य और तनाव का आकलन कर सकते हैं. इलाज के लिए कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी फॉर इंसोम्निया (CBT-I) या इमेज रिहर्सल थेरेपी (IRT) जैसी तकनीकें अपनाई जा सकती हैं, जिनमें डरावने सपनों को धीरे-धीरे बदलने का अभ्यास कराया जाता है.
लाइफस्टाइल सुधार भी मददगार साबित होता है. नियमित व्यायाम, अच्छी नींद की आदतें, तनाव कम करने वाली गतिविधियाँ जैसे मेडिटेशन या योग नाइटमेयर्स की आवृत्ति को घटा सकते हैं.
आगे की रिसर्च की जरूरत
शोधकर्ता यह जानना चाहते हैं कि अगर नाइटमेयर्स का इलाज किया जाए, तो क्या बायोलॉजिकल एजिंग धीमी हो सकती है और जीवनकाल बढ़ाया जा सकता है. विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि यदि किसी को लगातार डरावने सपने आते हैं, तो इसे हल्के में न लें. नाइटमेयर्स सिर्फ सपना नहीं, बल्कि स्वास्थ्य का एक गंभीर संकेत हो सकते हैं.
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