Sawan: पहले सोमवार पर शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय भूलकर भी न करें ये गलतियां, नहीं तो अधूरी रह सकती है पूजा

Sawan Pehla Somwar 2026: सावन के पहले सोमवार पर भगवान शिव का जलाभिषेक करने की तैयारी कर रहे हैं तो सही समय, दिशा और पूजा-विधि का पालन करना बेहद जरूरी है.

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Sawan Pehla Somwar 2026: सावन का पहला सोमवार भगवान शिव के भक्तों के लिए बेहद खास माना जाता है. मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करने और व्रत-पूजन करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है. देशभर के शिव मंदिरों में पहले सोमवार को सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं. हालांकि धार्मिक ग्रंथों के अनुसार केवल शिवलिंग पर जल चढ़ा देना ही पर्याप्त नहीं है. यदि जलाभिषेक सही समय, उचित दिशा और शास्त्रों में बताए गए नियमों के अनुसार किया जाए, तभी पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है. आइए जानते हैं कि सावन के पहले सोमवार पर भगवान शिव का जलाभिषेक किस समय और किस विधि से करना चाहिए.

पहले सोमवार पर किस समय करें भगवान शिव का जलाभिषेक?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन के पहले सोमवार को ब्रह्म मुहूर्त से लेकर सुबह लगभग 10 बजे तक का समय जलाभिषेक के लिए सबसे शुभ माना गया है. इस दौरान वातावरण शांत, पवित्र और सात्विक रहता है, जिससे पूजा का आध्यात्मिक महत्व कई गुना बढ़ जाता है. यदि किसी कारण सुबह जलाभिषेक नहीं कर पाते हैं, तो प्रदोष काल में भी भगवान शिव को जल अर्पित किया जा सकता है. सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले और सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक का समय प्रदोष काल कहलाता है. मान्यता है कि इस समय किए गए जलाभिषेक से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होकर भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं.

जल चढ़ाते समय दिशा का रखें विशेष ध्यान

पहले सोमवार की पूजा में सही दिशा का ध्यान रखना भी बेहद जरूरी माना गया है. शास्त्रों के अनुसार श्रद्धालु को दक्षिण दिशा में खड़े होकर उत्तर दिशा की ओर मुख करके शिवलिंग पर जल अर्पित करना चाहिए. उत्तर दिशा को भगवान शिव और माता पार्वती का पवित्र स्थान माना गया है. धार्मिक मान्यता यह भी कहती है कि पूर्व या उत्तर दिशा में खड़े होकर जल नहीं चढ़ाना चाहिए. इसलिए पूजा के दौरान दिशा का सही पालन करने से जलाभिषेक अधिक शुभ और फलदायी माना जाता है.

किस पात्र से करें भगवान शिव का अभिषेक?

भगवान शिव को जल अर्पित करने के लिए तांबे का पात्र सबसे श्रेष्ठ माना गया है. यदि तांबे का लौटा उपलब्ध न हो तो चांदी या पीतल के पात्र का भी उपयोग किया जा सकता है. शास्त्रों के अनुसार तांबे के बर्तन में दूध भरकर शिवलिंग पर अर्पित नहीं करना चाहिए. तांबे का पात्र केवल शुद्ध जल के लिए उपयुक्त माना गया है. यदि दूध से अभिषेक करना हो, तो उसके लिए अलग पात्र का उपयोग करना अधिक उचित माना जाता है.

पहले सोमवार पर जलाभिषेक करने की सही विधि

सावन के पहले सोमवार पर जलाभिषेक करते समय जल की धारा पतली और लगातार बनी रहनी चाहिए. सबसे पहले जल जलाधारी के दाहिने भाग पर अर्पित करें, जिसे भगवान गणेश का स्थान माना जाता है. इसके बाद जलाधारी के बाएं भाग पर जल चढ़ाएं, जिसे भगवान कार्तिकेय का स्थान माना जाता है. फिर जलाधारी के मध्य भाग पर जल अर्पित करें, जिसे माता अशोक सुंदरी का स्थान बताया गया है. इसके बाद जलाधारी के गोलाकार हिस्से पर जल चढ़ाएं, जिसे माता पार्वती के हस्तकमल का प्रतीक माना जाता है. अंत में पूरे श्रद्धाभाव के साथ मुख्य शिवलिंग पर धीरे-धीरे जल अर्पित करें.

'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का करें जाप

जलाभिषेक के दौरान पूरे समय 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है. पूजा समाप्त होने के बाद बचा हुआ जल किसी बहते हुए जल स्रोत या पौधों में अर्पित करना चाहिए.

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन के पहले सोमवार पर विधि-विधान से किया गया जलाभिषेक भगवान शिव को प्रसन्न करता है और भक्त के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है.

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