भारत और रूस की साझेदारी में विकसित ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की मांग लगातार बढ़ रही है. फिलीपींस के बाद अब थाईलैंड भी इस मिसाइल को खरीदने में रुचि दिखा रहा है. माना जा रहा है कि थाईलैंड अपनी समुद्री सुरक्षा मजबूत करने और सेना को आधुनिक बनाने के लिए ब्रह्मोस को अपने रक्षा बेड़े में शामिल करना चाहता है.
अगर यह सौदा होता है तो यह भारत के रक्षा निर्यात के लिए एक और बड़ी उपलब्धि होगी और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की रणनीतिक मौजूदगी भी मजबूत होगी.
थाईलैंड क्यों दिखा रहा है दिलचस्पी?
थाईलैंड लंबे समय से ऐसी रक्षा नीति अपनाता रहा है जिसमें वह किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहता. बदलते अंतरराष्ट्रीय माहौल और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए वह अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने पर जोर दे रहा है.
हालांकि थाईलैंड के चीन के साथ अच्छे व्यापारिक और आर्थिक संबंध हैं और उसने पहले भी वहां से रक्षा उपकरण खरीदे हैं, लेकिन अब वह भारत जैसे भरोसेमंद साझेदारों के साथ भी रक्षा सहयोग बढ़ाना चाहता है.
ब्रह्मोस से कैसे बढ़ेगी थाईलैंड की ताकत?
अगर थाईलैंड ब्रह्मोस मिसाइल खरीदता है तो उसकी नौसेना की ताकत में बड़ा इजाफा होगा. यह मिसाइल समुद्र में दुश्मन के युद्धपोतों को तेज और सटीक तरीके से निशाना बनाने में सक्षम है.
इसके अलावा थाईलैंड अपनी समुद्री सीमाओं और महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा भी पहले से बेहतर तरीके से कर सकेगा.
क्यों खास है ब्रह्मोस मिसाइल?
ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिनी जाती है. इसकी रफ्तार ध्वनि की गति से करीब तीन गुना तक पहुंच सकती है, जिससे दुश्मन के पास जवाब देने का बहुत कम समय बचता है.
यह मिसाइल अपने लक्ष्य पर बेहद सटीक हमला करती है और दुश्मन के युद्धपोतों, सैन्य ठिकानों और अन्य अहम लक्ष्यों को भारी नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखती है.
कई प्लेटफॉर्म से दागी जा सकती है मिसाइल
ब्रह्मोस की सबसे बड़ी खासियत इसकी बहुउपयोगी क्षमता है. इसे जमीन, युद्धपोत, पनडुब्बी और लड़ाकू विमानों से भी लॉन्च किया जा सकता है.
यही वजह है कि कई देशों की सेनाएं इसे अपनी रक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनाना चाहती हैं.
भारत के लिए क्यों है अहम?
फिलीपींस के साथ सफल रक्षा समझौते के बाद अगर थाईलैंड भी ब्रह्मोस खरीदने का फैसला करता है तो यह भारत के रक्षा निर्यात को नई मजबूती देगा.
इससे भारत और थाईलैंड के बीच रक्षा सहयोग भी और मजबूत होगा. साथ ही यह दिखाएगा कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के कई देश अपनी सुरक्षा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए भारत के रक्षा उपकरणों पर भरोसा जता रहे हैं.
हालांकि फिलहाल दोनों देशों के बीच बातचीत शुरुआती दौर में है और अंतिम फैसला अभी होना बाकी है. लेकिन थाईलैंड की बढ़ती दिलचस्पी भारत के रक्षा उद्योग के लिए एक सकारात्मक संकेत मानी जा रही है.
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