चांद पर जंग कैसे लग गई? वैज्ञानिकों को चौंकाने वाला खुलासा, धरती से जुड़ता है रहस्य

Moon Rusty Earth: चंद्रमा को अब तक हम एक बेजान, ठंडी और सूखी दुनिया मानते आए हैं, जहां न हवा है, न पानी, न जीवन. लेकिन हाल ही में हुई एक चौंकाने वाली खोज ने वैज्ञानिकों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है: चांद पर "जंग" लग रही है, बिल्कुल वैसी ही जैसे लोहे पर पृथ्वी पर लगती है.

rust form on the Moon Scientists have discovered a surprising mystery that connects it to Earth
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Moon Rusty Earth: चंद्रमा को अब तक हम एक बेजान, ठंडी और सूखी दुनिया मानते आए हैं, जहां न हवा है, न पानी, न जीवन. लेकिन हाल ही में हुई एक चौंकाने वाली खोज ने वैज्ञानिकों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है: चांद पर "जंग" लग रही है, बिल्कुल वैसी ही जैसे लोहे पर पृथ्वी पर लगती है. सबसे हैरानी की बात यह है कि जंग बनने के लिए जिस पानी और ऑक्सीजन की ज़रूरत होती है, वह चंद्रमा पर लगभग नहीं के बराबर है. फिर भी वहां हेमेटाइट नाम का जंग जैसा खनिज फैल रहा है.

यह खोज सिर्फ नासा या अमेरिकी वैज्ञानिकों की नहीं है बल्कि इसका गहरा संबंध भारत के चंद्रयान-1 मिशन से भी है, जिसने वर्षों पहले चांद पर मौजूद पानी के अणुओं और अन्य संकेतों को रिकॉर्ड किया था. आइए, जानते हैं इस रहस्यमयी खोज की पूरी कहानी और यह कैसे धरती से जुड़ती है.

क्या है हेमेटाइट और क्यों है यह खास?

हेमेटाइट एक प्रकार का आयरन ऑक्साइड (Fe₂O₃) है, जो तब बनता है जब लोहा, ऑक्सीजन और पानी के संपर्क में आता है. पृथ्वी पर इसे हम आम भाषा में "जंग" के रूप में जानते हैं. लेकिन, चांद पर तो न वातावरण है, न पानी की धाराएं, और न ही फ्री ऑक्सीजन. फिर ये जंग आखिर कैसे बन रही है?

चंद्रयान-1 ने दिए थे शुरुआती संकेत

साल 2008 में लॉन्च हुआ भारत का चंद्रयान-1 मिशन, चंद्रमा की सतह की मैपिंग और उसकी संरचना को समझने के लिए एक ऐतिहासिक मिशन रहा.
इसी मिशन के तहत लगे नासा के उपकरण Moon Mineralogy Mapper (M3) ने चांद की सतह से खास स्पेक्ट्रल डेटा जुटाया. 2020 में इसी डेटा के विश्लेषण से यह पता चला कि ध्रुवीय क्षेत्रों में हेमेटाइट मौजूद है. यह खोज अपने आप में चौंकाने वाली थी, क्योंकि यह संकेत देती थी कि चांद पर कहीं न कहीं पानी और ऑक्सीजन की उपस्थिति रही होगी.

धरती से जुड़ा है चांद पर जंग का राज?

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस ऑक्सीजन का एकमात्र व्यावहारिक स्रोत पृथ्वी ही हो सकती है. चंद्रमा, हर 28 दिन में एक बार पृथ्वी की चुंबकीय पूंछ (Magnetotail) से होकर गुजरता है. इस दौरान पृथ्वी के वातावरण में मौजूद ऑक्सीजन आयन अंतरिक्ष में फैलते हैं और चंद्रमा की सतह तक पहुंच सकते हैं.

जब ये आयन चंद्रमा के लौह-समृद्ध चट्टानों से टकराते हैं, और वहां मौजूद बर्फ से थोड़ी नमी मिलती है, तो हेमेटाइट बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. यानी, पृथ्वी की ऑक्सीजन चंद्रमा की सतह पर "जंग" की वजह बन रही है.

कैसे किया गया इसका परीक्षण?

शोधकर्ताओं ने इस विचार की पुष्टि के लिए प्रयोगशाला में एक्सपेरिमेंट किया. उन्होंने चंद्रमा जैसे खनिजों के क्रिस्टलों पर तेज गति से ऑक्सीजन और हाइड्रोजन आयन छोड़े. परिणामस्वरूप कुछ क्रिस्टलों में हेमेटाइट बनने के संकेत मिले. हालांकि, जब हाइड्रोजन आयन ने हेमेटाइट से टक्कर की, तो वह फिर से लोहा बनने लगा, यानी ये एक डायनामिक प्रोसेस है.

पानी का क्या स्रोत हो सकता है?

चंद्रमा की सतह पर स्थायी जल नहीं है, लेकिन ध्रुवों पर बर्फ के रूप में पानी की उपस्थिति मानी जाती है. वैज्ञानिक मानते हैं कि हेमेटाइट का निर्माण मुख्य रूप से उन्हीं ध्रुवीय क्षेत्रों में हुआ होगा जहां बर्फ और ऑक्सीजन दोनों मौजूद रहे होंगे. इसके बाद किसी अज्ञात भू-वैज्ञानिक या अंतरिक्षीय प्रक्रिया के चलते यह खनिज अन्य क्षेत्रों में फैल गया होगा.

भारत की भूमिका, चंद्रयान से नासा तक

यह खोज भारत के पहले चंद्र मिशन चंद्रयान-1 की डेटा पर आधारित है. नासा और हवाई यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने भारत के इस डेटा को अध्ययन के लिए प्रयोग किया. इससे यह साबित हुआ कि भारत के चंद्रयान मिशन ने चंद्र अनुसंधान में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है.

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