UAE-Saudi Arabia Conflict: पश्चिम एशिया में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़े तनाव ने खाड़ी देशों के भीतर भी बड़े मतभेद पैदा कर दिए. रिपोर्ट्स के मुताबिक, 28 फरवरी को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की, उसके बाद मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने खाड़ी क्षेत्र के कई नेताओं से लगातार संपर्क किया.
बताया गया कि यूएई ने कोशिश की कि सभी खाड़ी देश मिलकर ईरान के खिलाफ एक साझा रणनीति अपनाएं और जवाबी कार्रवाई करें. इस सिलसिले में यूएई नेतृत्व ने खास तौर पर मोहम्मद बिन सलमान से बातचीत की और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर संयुक्त कदम उठाने की अपील की.
हालांकि, ज्यादातर खाड़ी देशों ने सीधे सैन्य टकराव से दूरी बनाए रखना बेहतर समझा. यही वजह रही कि यूएई की कोशिशों के बावजूद खाड़ी देशों का कोई संयुक्त सैन्य मोर्चा तैयार नहीं हो सका. यह दावा अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में किया गया है.
खाड़ी देशों को एकजुट करना चाहता था यूएई
रिपोर्ट्स के अनुसार, यूएई का मानना था कि अगर पूरे खाड़ी क्षेत्र के देश एक साथ खड़े होते हैं, तो ईरान पर दबाव बनाया जा सकता है और आगे के हमलों को रोका जा सकता है.
उस समय ईरान ने अमेरिका और इजरायल की कार्रवाई के जवाब में खाड़ी क्षेत्र की ओर सैकड़ों ड्रोन और मिसाइल दागे थे. बताया गया कि इन हमलों में बंदरगाह, एयरपोर्ट, होटल और रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया गया.
स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही प्रभावित हुई, जिसके कारण कई देशों को तेल और गैस उत्पादन घटाना पड़ा. इसका सीधा असर खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था पर भी देखने को मिला.
GCC की याद दिलाकर समर्थन जुटाने की कोशिश
यूएई नेतृत्व ने अन्य खाड़ी देशों को यह समझाने की कोशिश की कि यह केवल किसी एक देश का मामला नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र की सुरक्षा का मुद्दा है.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूएई ने यह भी याद दिलाया कि 1981 में गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल यानी GCC का गठन भी क्षेत्रीय सुरक्षा और ईरान से जुड़े खतरों को ध्यान में रखकर किया गया था. लेकिन इस पूरे मामले में सऊदी अरब का रुख अपेक्षाकृत अलग दिखाई दिया.
सऊदी अरब नहीं चाहता था तनाव बढ़े
रिपोर्ट्स के अनुसार, सऊदी नेतृत्व का मानना था कि सीधे सैन्य कदम हालात को और ज्यादा खराब कर सकते हैं. इसी वजह से उसने आक्रामक कार्रवाई के बजाय सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने और नुकसान कम करने पर ज्यादा ध्यान दिया.
बताया गया कि सऊदी अरब को यह आशंका थी कि यूएई की आक्रामक रणनीति क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकती है. इसलिए उसने खुलकर सैन्य जवाबी कार्रवाई का समर्थन नहीं किया.
इस मुद्दे ने दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद मतभेदों को और गहरा कर दिया. रिपोर्ट्स में कहा गया कि यमन और सूडान जैसे मामलों को लेकर भी यूएई और सऊदी अरब के बीच पहले से कई मतभेद चल रहे थे.
यूएई ने अकेले किए सीमित हमले
रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि मार्च और अप्रैल के दौरान यूएई ने ईरान के खिलाफ कुछ सीमित सैन्य कार्रवाई अकेले की थी. हालांकि इन कार्रवाइयों को लेकर आधिकारिक स्तर पर ज्यादा जानकारी सामने नहीं आई, लेकिन माना जा रहा है कि इससे खाड़ी देशों के भीतर राजनीतिक तनाव और बढ़ गया.
OPEC छोड़ने के फैसले से बढ़ी चर्चा
बाद में यूएई ने एक बड़ा फैसला लेते हुए ओपेक से बाहर निकलने का ऐलान कर दिया. रिपोर्ट्स में माना जा रहा है कि ईरान युद्ध और खाड़ी देशों के भीतर बढ़ते मतभेद इस फैसले की बड़ी वजहों में शामिल थे. इस कदम ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और पश्चिम एशिया की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी.
यूएई बना सबसे बड़ा निशाना
रिपोर्ट्स के मुताबिक, युद्ध के दौरान यूएई को सबसे ज्यादा हमलों का सामना करना पड़ा. दावा किया गया कि ईरान ने यूएई की ओर करीब 3,000 ड्रोन और मिसाइल दागे.
हालांकि इनमें से ज्यादातर हमलों को एयर डिफेंस सिस्टम ने बीच में ही रोक दिया. इसके बावजूद कई रणनीतिक इलाकों में तनाव बना रहा. हाल ही में ईरान की ओर से यूएई के फुजैराह तेल बंदरगाह पर हमले की खबरों ने भी चिंता बढ़ा दी.
इजरायल और यूएई ने मिलकर किया काम
इस पूरे संघर्ष के दौरान यूएई और इजरायल के बीच सुरक्षा सहयोग बढ़ता दिखाई दिया. रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों देशों ने खुफिया जानकारी साझा की और मिसाइल हमलों को रोकने के लिए मिलकर काम किया. बताया गया कि इजरायल ने यूएई को एयर डिफेंस सपोर्ट और सुरक्षा सहयोग भी उपलब्ध कराया.
दूसरी ओर कतर, कुवैत, बहरीन और ओमान ने सीधे युद्ध में शामिल होने से बचने की कोशिश की. कतर ने अपने गैस प्लांट पर हमले के बाद जवाबी कार्रवाई पर विचार जरूर किया, लेकिन बाद में तनाव कम करने की नीति अपनाई.
अमेरिका चाहता था खाड़ी देशों का समर्थन
रिपोर्ट्स के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन चाहता था कि सऊदी अरब और कतर जैसे देश भी ईरान के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई में शामिल हों. लेकिन इन देशों को डर था कि अगर वे सीधे युद्ध में उतरे, तो ईरान उनके यहां मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकता है. इसी वजह से उन्होंने खुली सैन्य भागीदारी से दूरी बनाए रखना ज्यादा सुरक्षित समझा.
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