रेयर अर्थ में खत्म होगा चीन का दबदबा! वाशिंगटन में बन रहा प्लान, अमेरिका ने भारत को दिया खास ऑफर

आज की दुनिया में तकनीक ही ताकत है, और इस ताकत की बुनियाद है रेयर अर्थ एलिमेंट्स और क्रिटिकल मिनरल्स.

Rare earth minerals America gave special offer to India
प्रतिकात्मक तस्वीर/ Bharat 24

आज की दुनिया में तकनीक ही ताकत है, और इस ताकत की बुनियाद है रेयर अर्थ एलिमेंट्स और क्रिटिकल मिनरल्स. स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक व्हीकल, सेमीकंडक्टर, मिसाइल सिस्टम और फाइटर जेट हर आधुनिक तकनीक इन्हीं खनिजों पर निर्भर करती है. अब इसी रणनीतिक संसाधन को लेकर वैश्विक राजनीति में बड़ा बदलाव आकार ले रहा है.

अमेरिका ने चीन के दबदबे को तोड़ने के लिए एक निर्णायक कदम उठाया है. इसी कड़ी में भारत को एक विशेष रणनीतिक आमंत्रण भेजा गया है, जिससे संकेत मिलते हैं कि आने वाले समय में रेयर अर्थ के खेल में चीन की एकतरफा पकड़ कमजोर हो सकती है.

G7 की अहम बैठक में भारत को खास बुलावा

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेमेंट ने पुष्टि की है कि वॉशिंगटन में होने वाली G7 देशों के वित्त मंत्रियों की अहम बैठक में भारत और ऑस्ट्रेलिया को विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है. यह बैठक सोमवार को आयोजित होगी और इसका केंद्रीय मुद्दा होगा- क्रिटिकल मिनरल्स की वैश्विक सप्लाई चेन को सुरक्षित बनाना और किसी एक देश पर निर्भरता खत्म करना.

इस बैठक की मेजबानी खुद अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेमेंट कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि पिछले साल G7 शिखर सम्मेलन के बाद से ही वे इस विषय पर अलग और ठोस रणनीति बनाने के पक्ष में थे. दिसंबर में इस पर वर्चुअल चर्चा जरूर हुई थी, लेकिन अब आमने-सामने की बैठक को ज्यादा निर्णायक माना जा रहा है.

भारत की भूमिका क्यों है अहम?

बेमेंट ने स्पष्ट किया कि भारत को जानबूझकर इस चर्चा में शामिल किया गया है. हालांकि अभी यह तय नहीं है कि भारत ने इस निमंत्रण को औपचारिक रूप से स्वीकार किया है या नहीं, लेकिन संदेश साफ है- अब पश्चिमी देश चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए भारत जैसे भरोसेमंद साझेदारों की ओर देख रहे हैं.

G7 समूह जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, फ्रांस, जर्मनी, इटली और कनाडा शामिल हैं, अब तक रेयर अर्थ और अहम खनिजों के लिए बड़े पैमाने पर चीन पर निर्भर रहा है. लेकिन मौजूदा भू-राजनीतिक हालात ने इस निर्भरता को एक बड़ा जोखिम बना दिया है.

रेयर अर्थ पर चीन का लगभग एकाधिकार

इस पूरी रणनीति के केंद्र में है चीन का रेयर अर्थ और क्रिटिकल मिनरल्स पर लगभग पूर्ण नियंत्रण. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के आंकड़े इस खतरे को साफ दिखाते हैं- कॉपर, लिथियम, कोबाल्ट, ग्रेफाइट और रेयर अर्थ की रिफाइनिंग में चीन की हिस्सेदारी 47% से लेकर 87% तक है.

ये खनिज सिर्फ ग्रीन एनर्जी या बैटरियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि

  • सेमीकंडक्टर
  • सैन्य उपकरण
  • सैटेलाइट सिस्टम
  • एडवांस्ड हथियार तकनीक

जैसी रणनीतिक जरूरतों के लिए भी अनिवार्य हैं.

चीन की पाबंदियों ने बढ़ाई पश्चिम की चिंता

पश्चिमी देशों की चिंता उस समय और बढ़ गई जब चीन ने हाल ही में जापान को रेयर अर्थ और मैग्नेट के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए. इतना ही नहीं, जापानी सेना के लिए इस्तेमाल होने वाली ड्यूल-यूज टेक्नोलॉजी के निर्यात पर भी रोक लगा दी गई.

इससे अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को यह डर सताने लगा है कि भविष्य में अगर चीन ने सप्लाई रोकी, तो

  • उनकी अर्थव्यवस्था
  • रक्षा उत्पादन
  • तकनीकी विकास

तीनों पर गंभीर असर पड़ सकता है.

ऑस्ट्रेलिया पहले ही उठा चुका है बड़ा कदम

इस रणनीतिक बदलाव में ऑस्ट्रेलिया पहले ही अमेरिका के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा है. पिछले साल अक्टूबर में ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बीच एक बड़ा समझौता हुआ था, जिसका उद्देश्य चीन के प्रभुत्व को कमजोर करना था.

इस समझौते के तहत:

  • 8.5 अरब डॉलर की परियोजनाओं पर काम चल रहा है
  • ऑस्ट्रेलिया अपने यहां रणनीतिक खनिज भंडार (Strategic Reserves) तैयार कर रहा है
  • रेयर अर्थ और लिथियम जैसी अहम धातुओं की निर्बाध सप्लाई सुनिश्चित की जा रही है

कैनबरा से मिली जानकारी के मुताबिक, इस पहल में अब यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे देश भी रुचि दिखा रहे हैं.

भारत के लिए बड़ा मौका

विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर भारत इस रणनीतिक गठबंधन का हिस्सा बनता है, तो यह

  • भारत की माइनिंग और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को बढ़ा सकता है
  • वैश्विक सप्लाई चेन में भारत को केंद्रीय भूमिका दिला सकता है
  • और चीन के दबदबे को चुनौती देने में निर्णायक साबित हो सकता है

रेयर अर्थ की यह लड़ाई अब केवल खनिजों की नहीं, बल्कि भविष्य की तकनीक, सुरक्षा और वैश्विक नेतृत्व की लड़ाई बन चुकी है.

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