कलाकार- पुलकित सम्राट, वरुण शर्मा, शालिनी पांडे, पीयूष मिश्रा, चंकी पांडे, अमित सियाल, मनु ऋषि चड्डा, सुमित गुलाटी
निर्देशक- विपुल विज
निर्माता- उमेश कुमार बंसल, सूरज सिंह, वर्षा कुकरेजा, प्रगति देशमुख
रेटिंग: 3.5/5
फिल्म ‘राहु केतु’ दर्शकों को हल्की-फुल्की कॉमेडी और फ्रेश कॉन्सेप्ट के साथ एक अलग तरह का सिनेमाई अनुभव देती है. फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्टार कास्ट की टाइमिंग, विज़ुअल ट्रीट और म्यूज़िक है.
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म की कहानी हिमाचल प्रदेश के एक छोटे और शांत कस्बे में सेट है. यहां लेखक चूरू लाल शर्मा (मनु ऋषि चड्डा) अपनी नाकाम ज़िंदगी और अधूरी कहानियों से जूझ रहा है. तभी उसकी ज़िंदगी में आते हैं रहस्यमयी फूफाजी (पीयूष मिश्रा), जिनके पास मौजूद एक जादुई किताब पूरे घटनाक्रम को बदल देती है. इसी किताब से जन्म लेते हैं राहु और केतु, जिनकी मौजूदगी से कस्बे में अफवाहें, डर और हास्य का अजीब मेल देखने को मिलता है. लोग इन्हें अपशकुन मानते हैं, लेकिन दर्शकों के लिए यही किरदार फिल्म का सबसे बड़ा एंटरटेनमेंट फैक्टर बन जाते हैं. इसी बीच मीनू (शालिनी पांडे) और सनकी अपराधी मोर्देखाई (चंकी पांडे) की एंट्री कहानी को और रोचक बना देती है.
स्टार कास्ट: कॉमिक टाइमिंग ही सबसे बड़ी ताकत
वरुण शर्मा और पुलकित सम्राट की जोड़ी फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी है.वरुण शर्मा अपनी नेचुरल कॉमेडी और एक्सप्रेशन्स से हर सीन में जान डालते हैं, वहीं पुलकित सम्राट का कूल और चार्मिंग अंदाज़ कहानी को बैलेंस देता है.दोनों के बीच की केमिस्ट्री बनावटी नहीं लगती, बल्कि दोस्ताना और सहज महसूस होती है.वरुण शर्मा और पुलकित सम्राट की जोड़ी फिल्म की जान है.दोनों की कॉमिक टाइमिंग, बॉडी लैंग्वेज और डायलॉग डिलीवरी फिल्म को लगातार एंटरटेनिंग बनाए रखती है. सपोर्टिंग कास्ट ने भी फिल्म को मजबूती दी है- हर कैरेक्टर को स्क्रीन स्पेस और पहचान दी गई है, जिससे फिल्म ओवरक्राउडेड नहीं लगती.
सिनेमाटोग्राफी: आंखों को सुकून देने वाला विज़ुअल ट्रीट
फिल्म की सिनेमाटोग्राफी इसकी एक बड़ी यूएसपी है. ब्राइट कलर टोन, क्लीन फ्रेम्स और सॉफ्ट लाइटिंग फिल्म को फ्रेश लुक देती है.कॉमिक सीन में कैमरा मूवमेंट एनर्जी बनाए रखता है, जबकि इमोशनल या सिचुएशनल सीन में विज़ुअल्स को ओवरड्रामैटिक नहीं किया गया.लोकेशंस को भी स्मार्ट तरीके से इस्तेमाल किया गया है, जिससे फिल्म नेचुरल और ग्रैंड दोनों लगती है.
डायरेक्शन: कंट्रोल्ड, क्लीन और ऑडियंस-फ्रेंडली
डायरेक्टर की सबसे बड़ी सफलता यही है कि उन्होंने कॉमेडी को जबरदस्ती नहीं खींचा.पंचलाइन, सिचुएशन और रिएक्शन तीनों में बैलेंस साफ दिखता है. फिल्म की पेसिंग ठीक है, न बहुत तेज़, न बहुत स्लो.डायरेक्शन में यह समझ नजर आती है कि फिल्म को फैमिली और यूथ दोनों वर्गों के लिए एंटरटेनिंग बनाना है.डायरेक्टर ने कॉमेडी को ओवर-द-टॉप बनाए बिना बैलेंस में रखा है. कहानी की गति, कैरेक्टर्स की एंट्री और पंचलाइन की प्लेसमेंट सब कुछ सधा हुआ नज़र आता है.डायरेक्शन में साफ दिखता है कि फिल्म को मास ऑडियंस को ध्यान में रखकर बनाया गया है.
म्यूज़िक: कहानी के साथ चलता साउंड
‘राहु केतु’ का म्यूज़िक फिल्म का सपोर्ट सिस्टम है. गाने सिचुएशन के हिसाब से आते हैं और कहानी को रोकते नहीं. बैकग्राउंड स्कोर कॉमिक सीन में एनर्जी भरता है और इमोशनल मोमेंट्स में बिना ज़्यादा शोर किए असर छोड़ता है. म्यूज़िक ओवरपावर नहीं करता, बल्कि फिल्म के फ्लो को स्मूद बनाए रखता है. ‘राहु केतु’ का म्यूज़िक कहानी के फ्लो के साथ फिट बैठता है. गाने सिचुएशनल हैं और बैकग्राउंड स्कोर कॉमिक सीन में एनर्जी भरता है .
डायलॉग्स और स्क्रीनप्ले
फिल्म के डायलॉग्स सिंपल, पंची और आज की ऑडियंस से जुड़े हुए हैं.कॉमेडी ज़्यादातर सिचुएशनल है, जो लंबे समय तक याद रहती है.स्क्रीनप्ले टाइट है, जिससे फिल्म कहीं भी भटकती नहीं.
कुल मिलाकर ‘राहु केतु’ उन दर्शकों के लिए है जो सिर्फ़ हंसना चाहते हैं, रिलैक्स करना चाहते हैं और दो–ढाई घंटे का हल्का-फुल्का एंटरटेनमेंट एन्जॉय करना चाहते हैं.यह फिल्म खुद को सीरियस नहीं लेती और शायद यही इसकी सबसे बड़ी जीत है.‘राहु केतु’ एक ऐसी फिल्म है जो दिमाग पर ज़ोर नहीं डालती, बल्कि हल्का-फुल्का एंटरटेनमेंट देती है.मज़ेदार परफॉर्मेंस, अच्छी विज़ुअल्स और कैची म्यूज़िक के साथ यह फिल्म फैमिली और फ्रेंड्स के साथ देखने लायक है.